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तमाशा-ए-दैर-ओ-हरम देखते हैं तुझे हर बहाने से हम देखते हैं हमारी तरफ़ अब वो कम देखते हैं वो नज़रें नहीं जिन को हम देखते हैं ज़माने के क्या क्या सितम देखते हैं हमीं जानते हैं जो हम देखते हैं

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यही अपनी कहानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले वो लड़की जाँ हमारी थी, मियाँ पहले बहुत पहले वहम मुझ को ये भाता है,अभी मेरी दिवानी है मगर मेरी दिवानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले रक़ीब आ कर बताते हैं यहाँ तिल है, वहाँ तिल है हमें ये जानकारी थी मियाँ पहले, बहुत पहले अदब से माँग कर माफ़ी भरी महफ़िल ये कहता हूँ वो लड़की ख़ानदानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले

Anand Raj Singh

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उसी जगह पर जहाँ कई रास्ते मिलेंगे पलट के आए तो सब सेे पहले तुझे मिलेंगे अगर कभी तेरे नाम पर जंग हो गई तो हम ऐसे बुज़दिल भी पहली सफ़ में खड़े मिलेंगे तुझे ये सड़कें मेरे तवस्सुत से जानती हैं तुझे हमेशा ये सब इशारे खुले मिलेंगे

Tehzeeb Hafi

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ये ग़म क्या दिल की आदत है नहीं तो किसी से कुछ शिकायत है नहीं तो है वो इक ख़्वाब-ए-बे-ताबीर उस को भुला देने की निय्यत है नहीं तो किसी के बिन किसी की याद के बिन जिए जाने की हिम्मत है नहीं तो किसी सूरत भी दिल लगता नहीं हाँ तो कुछ दिन से ये हालत है नहीं तो तेरे इस हाल पर है सब को हैरत तुझे भी इस पे हैरत है नहीं तो हम-आहंगी नहीं दुनिया से तेरी तुझे इस पर नदामत है नहीं तो हुआ जो कुछ यही मक़्सूम था क्या यही सारी हिकायत है नहीं तो अज़िय्यत-नाक उम्मीदों से तुझ को अमाँ पाने की हसरत है नहीं तो तू रहता है ख़याल-ओ-ख़्वाब में गुम तो इस की वज्ह फ़ुर्सत है नहीं तो सबब जो इस जुदाई का बना है वो मुझ सेे ख़ूब-सूरत है नहीं तो

Jaun Elia

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तेरी मुश्किल न बढ़ाऊँगा चला जाऊँगा अश्क आँखों में छुपाऊँगा चला जाऊँगा अपनी दहलीज़ पे कुछ देर पड़ा रहने दे जैसे ही होश में आऊँगा चला जाऊँगा ख़्वाब लेने कोई आए कि न आए कोई मैं तो आवाज़ लगाऊँगा चला जाऊँगा चंद यादें मुझे बच्चों की तरह प्यारी हैं उन को सीने से लगाऊँगा चला जाऊँगा मुद्दतों बा'द मैं आया हूँ पुराने घर में ख़ुद को जी भर के रुलाऊँगा चला जाऊँगा इस जज़ीरे में ज़ियादा नहीं रहना अब तो आजकल नाव बनाऊँगा चला जाऊँगा मौसम-ए-गुल की तरह लौट के आऊँगा 'हसन' हर तरफ़ फूल खिलाऊँगा चला जाऊँगा

Hasan Abbasi

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वो बे-वफ़ा है तो क्या मत कहो बुरा उस को कि जो हुआ सो हुआ ख़ुश रखे ख़ुदा उस को नज़र न आए तो उस की तलाश में रहना कहीं मिले तो पलट कर न देखना उस को वो सादा-ख़ू था ज़माने के ख़म समझता क्या हवा के साथ चला ले उड़ी हवा उस को वो अपने बारे में कितना है ख़ुश-गुमाँ देखो जब उस को मैं भी न देखूँ तो देखना उस को अभी से जाना भी क्या उस की कम-ख़याली पर अभी तो और बहुत होगा सोचना उस को उसे ये धुन कि मुझे कम से कम उदास रखे मिरी दु'आ कि ख़ुदा दे ये हौसला उस को पनाह ढूँढ़ रही है शब-ए-गिरफ़्ता-दिलाँ कोई बताओ मिरे घर का रास्ता उस को ग़ज़ल में तज़्किरा उस का न कर 'नसीर' कि अब भुला चुका वो तुझे तू भी भूल जा उस को

Naseer Turabi

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राह पर उन को लगा लाए तो हैं बातों में और खुल जाएँगे दो चार मुलाक़ातों में ये भी तुम जानते हो चंद मुलाक़ातों में आज़माया है तुम्हें हम ने कई बातों में ग़ैर के सर की बलाएँ जो नहीं लें ज़ालिम क्या मिरे क़त्ल को भी जान नहीं हाथों में अब्र-ए-रहमत ही बरसता नज़र आया ज़ाहिद ख़ाक उड़ती कभी देखी न ख़राबातों में यारब उस चाँद के टुकड़े को कहाँ से लाऊँ रौशनी जिस की हो इन तारों भरी रातों में तुम्हीं इंसाफ़ से ऐ हज़रत नासेह कह दो लुत्फ़ उन बातों में आता है कि इन बातों में दौड़ कर दस्त-ए-दुआ' साथ दुआ के जाते हाए पैदा न हुए पाँव मिरे हाथों में जल्वा-ए-यार से जब बज़्म में ग़श आया है तो रक़ीबों ने सँभाला है मुझे हाथों में ऐसी तक़रीर सुनी थी न कभी शोख़-ओ-शरीर तेरी आँखों के भी फ़ित्ने हैं तिरी बातों में हम से इनकार हुआ ग़ैर से इक़रार हुआ फ़ैसला ख़ूब किया आप ने दो बातों में हफ़्त अफ़्लाक हैं लेकिन नहीं खुलता ये हिजाब कौन सा दुश्मन-ए-उश्शाक़ हैं इन सातों में और सुनते अभी रिंदों से जनाब-ए-वाइज़ चल दिए आप तो दो-चार सलावातों में हम ने देखा उन्हीं लोगों को तिरा दम भरते जिन की शोहरत थी ये हरगिज़ नहीं इन बातों में भेजे देता है उन्हें इश्क़ मता-ए-दिल-ओ-जाँ एक सरकार लुटी जाती है सौग़ातों में दिल कुछ आगाह तो हो शेवा-ए-अय्यारी से इस लिए आप हम आते हैं तिरी घातों में वस्ल कैसा वो किसी तरह बहलते ही न थे शाम से सुब्ह हुई उन की मुदारातों में वो गए दिन जो रहे याद बुतों की ऐ 'दाग़' रात भर अब तो गुज़रती है मुनाजातों में

Dagh Dehlvi

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ख़ातिर से या लिहाज़ से मैं मान तो गया झूटी क़सम से आप का ईमान तो गया दिल ले के मुफ़्त कहते हैं कुछ काम का नहीं उल्टी शिकायतें हुईं एहसान तो गया डरता हूँ देख कर दिल-ए-बे-आरज़ू को मैं सुनसान घर ये क्यूँँ न हो मेहमान तो गया क्या आए राहत आई जो कुंज-ए-मज़ार में वो वलवला वो शौक़ वो अरमान तो गया देखा है बुत-कदे में जो ऐ शैख़ कुछ न पूछ ईमान की तो ये है कि ईमान तो गया इफ़्शा-ए-राज़-ए-इश्क़ में गो ज़िल्लतें हुईं लेकिन उसे जता तो दिया जान तो गया गो नामा-बर से ख़ुश न हुआ पर हज़ार शुक्र मुझ को वो मेरे नाम से पहचान तो गया बज़्म-ए-अदू में सूरत-ए-परवाना दिल मिरा गो रश्क से जला तिरे क़ुर्बान तो गया होश ओ हवा से ओ ताब ओ तवाँ 'दाग़' जा चुके अब हम भी जाने वाले हैं सामान तो गया

Dagh Dehlvi

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रंज की जब गुफ़्तुगू होने लगी आप से तुम तुम से तू होने लगी चाहिए पैग़ाम-बर दोनों तरफ़ लुत्फ़ क्या जब दू-ब-दू होने लगी मेरी रुस्वाई की नौबत आ गई उन की शोहरत कू-ब-कू होने लगी है तिरी तस्वीर कितनी बे-हिजाब हर किसी के रू-ब-रू होने लगी ग़ैर के होते भला ऐ शाम-ए-वस्ल क्यूँँ हमारे रू-ब-रू होने लगी ना-उम्मीदी बढ़ गई है इस क़दर आरज़ू की आरज़ू होने लगी अब के मिल कर देखिए क्या रंग हो फिर हमारी जुस्तुजू होने लगी 'दाग़' इतराए हुए फिरते हैं आज शायद उन की आबरू होने लगी

Dagh Dehlvi

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कौन सा ताइर-ए-गुम-गश्ता उसे याद आया देखता भालता हर शाख़ को सय्याद आया मेरे क़ाबू में न पहरों दिल-ए-नाशाद आया वो मिरा भूलने वाला जो मुझे याद आया कोई भूला हुआ अंदाज़-ए-सितम याद आया कि तबस्सुम तुझे ज़ालिम दम-ए-बेदाद आया लाए हैं लोग जनाज़े की तरह महशर में किस मुसीबत से तिरा कुश्ता-ए-बेदाद आया जज़्ब-ए-वहशत तिरे क़ुर्बान तिरा क्या कहना खिंच के रग रग में मिरे नश्तर-ए-फ़स्साद आया उस के जल्वे को ग़रज़ कौन-ओ-मकाँ से क्या था दाद लेने के लिए हुस्न-ए-ख़ुदा-दाद आया बस्तियों से यही आवाज़ चली आती है जो किया तू ने वो आगे तिरे फ़रहाद आया दिल-ए-वीराँ से रक़ीबों ने मुरादें पाईं काम किस किस के मिरा ख़िर्मन-ए-बर्बाद आया इश्क़ के आते ही मुँह पर मिरे फूली है बसंत हो गया ज़र्द ये शागिर्द जब उस्ताद आया हो गया फ़र्ज़ मुझे शौक़ का दफ़्तर लिखना जब मिरे हाथ कोई ख़ामा-ए-फ़ौलाद आया ईद है क़त्ल मिरा अहल-ए-तमाशा के लिए सब गले मिलने लगे जब कि वो जल्लाद आया चैन करते हैं वहाँ रंज उठाने वाले काम उक़्बा में हमारा दिल-ए-नाशाद आया दी शब-ए-वस्ल मोअज़्ज़िन ने अज़ाँ पिछली रात हाए कम-बख़्त को किस वक़्त ख़ुदा याद आया मेरे नाले ने सुनाई है खरी किस किस को मुँह फ़रिश्तों पे ये गुस्ताख़ ये आज़ाद आया ग़म-ए-जावेद ने दी मुझ को मुबारकबादी जब सुना ये कि उन्हें शेवा-ए-बेदाद आया मैं तमन्ना-ए-शहादत का मज़ा भूल गया आज इस शौक़ से अरमान से जल्लाद आया शादियाना जो दिया नाला ओ शेवन ने दिया जब मुलाक़ात को नाशाद की नाशाद आया लीजिए सुनिए अब अफ़्साना-ए-फ़ुर्क़त मुझ से आप ने याद दिलाया तो मुझे याद आया आप की बज़्म में सब कुछ है मगर 'दाग़' नहीं हम को वो ख़ाना-ख़राब आज बहुत याद आया

Dagh Dehlvi

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दिल को क्या हो गया ख़ुदा जाने क्यूँँ है ऐसा उदास क्या जाने अपने ग़म में भी उस को सरफ़ा है न खिला जाने वो न खा जाने इस तजाहुल का क्या ठिकाना है जान कर जो न मुद्दआ' जाने कह दिया मैं ने राज़-ए-दिल अपना उस को तुम जानो या ख़ुदा जाने क्या ग़रज़ क्यूँँ इधर तवज्जोह हो हाल-ए-दिल आप की बला जाने जानते जानते ही जानेगा मुझ में क्या है अभी वो क्या जाने क्या हम उस बद-गुमाँ से बात करें जो सताइश को भी गिला जाने तुम न पाओगे सादा-दिल मुझ सा जो तग़ाफ़ुल को भी हया जाने है अबस जुर्म-ए-इश्क़ पर इल्ज़ाम जब ख़ता-वार भी ख़ता जाने नहीं कोताह दामन-ए-उम्मीद आगे अब दस्त-ए-ना-रसा जाने जो हो अच्छा हज़ार अच्छों का वाइ'ज़ उस बुत को तू बुरा जाने की मिरी क़द्र मिस्ल-ए-शाह-ए-दकन किसी नव्वाब ने न राजा ने उस से उट्ठेगी क्या मुसीबत-ए-इश्क़ इब्तिदा को जो इंतिहा जाने 'दाग़' से कह दो अब न घबराओ काम अपना बता हुआ जाने

Dagh Dehlvi

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