ख़ातिर से या लिहाज़ से मैं मान तो गया झूटी क़सम से आप का ईमान तो गया दिल ले के मुफ़्त कहते हैं कुछ काम का नहीं उल्टी शिकायतें हुईं एहसान तो गया डरता हूँ देख कर दिल-ए-बे-आरज़ू को मैं सुनसान घर ये क्यूँँ न हो मेहमान तो गया क्या आए राहत आई जो कुंज-ए-मज़ार में वो वलवला वो शौक़ वो अरमान तो गया देखा है बुत-कदे में जो ऐ शैख़ कुछ न पूछ ईमान की तो ये है कि ईमान तो गया इफ़्शा-ए-राज़-ए-इश्क़ में गो ज़िल्लतें हुईं लेकिन उसे जता तो दिया जान तो गया गो नामा-बर से ख़ुश न हुआ पर हज़ार शुक्र मुझ को वो मेरे नाम से पहचान तो गया बज़्म-ए-अदू में सूरत-ए-परवाना दिल मिरा गो रश्क से जला तिरे क़ुर्बान तो गया होश ओ हवा से ओ ताब ओ तवाँ 'दाग़' जा चुके अब हम भी जाने वाले हैं सामान तो गया
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सीना दहक रहा हो तो क्या चुप रहे कोई क्यूँँ चीख़ चीख़ कर न गला छील ले कोई साबित हुआ सुकून-ए-दिल-ओ-जाँ कहीं नहीं रिश्तों में ढूँढ़ता है तो ढूँडा करे कोई तर्क-ए-तअल्लुक़ात कोई मसअला नहीं ये तो वो रास्ता है कि बस चल पड़े कोई दीवार जानता था जिसे मैं वो धूल थी अब मुझ को ए'तिमाद की दावत न दे कोई मैं ख़ुद ये चाहता हूँ कि हालात हों ख़राब मेरे ख़िलाफ़ ज़हर उगलता फिरे कोई ऐ शख़्स अब तो मुझ को सभी कुछ क़ुबूल है ये भी क़ुबूल है कि तुझे छीन ले कोई हाँ ठीक है मैं अपनी अना का मरीज़ हूँ आख़िर मेरे मिज़ाज में क्यूँँ दख़्ल दे कोई इक शख़्स कर रहा है अभी तक वफ़ा का ज़िक्र काश उस ज़बाँ-दराज़ का मुँह नोच ले कोई
Jaun Elia
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चादर की इज़्ज़त करता हूँ और पर्दे को मानता हूँ हर पर्दा पर्दा नहीं होता इतना मैं भी जानता हूँ सारे मर्द एक जैसे हैं तुम ने कैसे कह डाला मैं भी तो एक मर्द हूँ तुम को ख़ुद से बेहतर मानता हूँ मैं ने उस सेे प्यार किया है मिल्कियत का दावा नहीं वो जिस के भी साथ है मैं उस को भी अपना मानता हूँ चादर की इज़्ज़त करता हूँ और पर्दे को मानता हूँ हर पर्दा पर्दा नहीं होता इतना मैं भी जानता हूँ
Ali Zaryoun
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पूछ लेते वो बस मिज़ाज मिरा कितना आसान था इलाज मिरा चारा-गर की नज़र बताती है हाल अच्छा नहीं है आज मिरा मैं तो रहता हूँ दश्त में मसरूफ़ क़ैस करता है काम-काज मिरा कोई कासा मदद को भेज अल्लाह मेरे बस में नहीं है ताज मिरा मैं मोहब्बत की बादशाहत हूँ मुझ पे चलता नहीं है राज मिरा
Fahmi Badayuni
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चला है सिलसिला कैसा ये रातों को मनाने का तुम्हें हक़ दे दिया किस ने दियों के दिल दुखाने का इरादा छोड़िए अपनी हदों से दूर जाने का ज़माना है ज़माने की निगाहों में न आने का कहाँ की दोस्ती किन दोस्तों की बात करते हो मियाँ दुश्मन नहीं मिलता कोई अब तो ठिकाने का निगाहों में कोई भी दूसरा चेहरा नहीं आया भरोसा ही कुछ ऐसा था तुम्हारे लौट आने का ये मैं ही था बचा के ख़ुद को ले आया किनारे तक समुंदर ने बहुत मौक़ा' दिया था डूब जाने का
Waseem Barelvi
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अश्क ज़ाया' हो रहे थे, देख कर रोता न था जिस जगह बनता था रोना, मैं वहाँ रोता न था सिर्फ़ तेरी चुप ने मेरे गाल गीले कर दिए मैं तो वो हूँ, जो किसी की मौत पर रोता न था मुझ पर कितने एहसान है गुज़रे, पर उन आँखों को क्या मेरा दुख ये है, के मेरा हम सेफ़र रोता न था मैं ने उस के वस्ल में भी हिज्र कटा है कहीं, वो मेरे कंधे पे रख लेता था सर, रोता न था प्यार तो पहले भी उस सेे था, मगर इतना नहीं तब में उस को छू तो लेता था, मगर रोता न था गिरियो ज़ारी को भी एक ख़ास मौसम चाहिए, मेरी आँखें देख लो, मैं वक़्त पर रोता न था
Tehzeeb Hafi
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बाक़ी जहाँ में क़ैस न फ़रहाद रह गया अफ़्साना आशिक़ों का फ़क़त याद रह गया ये सख़्त-जाँ तो क़त्ल से नाशाद रह गया ख़ंजर चला तो बाज़ू-ए-जल्लाद रह गया पाबंदियों ने इश्क़ की बेकस रखा मुझे मैं सौ असीरियों में भी आज़ाद रह गया चश्म-ए-सनम ने यूँँ तो बिगाड़े हज़ार घर इक का'बा चंद रोज़ को आबाद रह गया महशर में जा-ए-शिकवा किया शुक्र यार का जो भूलना था मुझ को वही याद रह गया उन की तो बन पड़ी कि लगी जान मुफ़्त हाथ तेरी गिरह में क्या दिल-ए-नाशाद रह गया पुर-नूर हो रहेगा ये ज़ुल्मत-कदा अगर दिल में बुतों का शौक़-ए-ख़ुदा-दाद रह गया यूँँ आँख उन की कर के इशारा पलट गई गोया कि लब से हो के कुछ इरशाद रह गया नासेह का जी चला था हमारी तरह मगर उल्फ़त की देख देख के उफ़्ताद रह गया हैं तेरे दिल में सब के ठिकाने बुरे भले मैं ख़ानुमाँ-ख़राब ही बर्बाद रह गया वो दिन गए कि थी मिरे सीने में कुछ ख़राश अब दिल कहाँ है दिल का निशाँ याद रह गया सूरत को तेरी देख के खिंचती है जान-ए-ख़ल्क़ दिल अपना थाम थाम के बहज़ाद रह गया ऐ 'दाग़' दिल ही दिल में घुले ज़ब्त-ए-इश्क़ से अफ़्सोस शौक़-ए-नाला-ओ-फ़रियाद रह गया
Dagh Dehlvi
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सितम ही करना जफ़ा ही करना निगाह-ए-उल्फ़त कभी न करना तुम्हें क़सम है हमारे सर की हमारे हक़ में कमी न करना हमारी मय्यत पे तुम जो आना तो चार आँसू बहा के जाना ज़रा रहे पास-ए-आबरू भी कहीं हमारी हँसी न करना कहाँ का आना कहाँ का जाना वो जानते ही नहीं ये रस्में वहाँ है वादे की भी ये सूरत कभी तो करना कभी न करना लिए तो चलते हैं हज़रत-ए-दिल तुम्हें भी उस अंजुमन में लेकिन हमारे पहलू में बैठ कर तुम हमीं से पहलू-तही न करना नहीं है कुछ क़त्ल उन का आसाँ ये सख़्त-जाँ हैं बुरे बला के क़ज़ा को पहले शरीक करना ये काम अपनी ख़ुशी न करना हलाक अंदाज़-ए-वस्ल करना कि पर्दा रह जाए कुछ हमारा ग़म-ए-जुदाई में ख़ाक कर के कहीं अदू की ख़ुशी न करना मिरी तो है बात ज़हर उन को वो उन के मतलब ही की न क्यूँँ हो कि उन से जो इल्तिजा से कहना ग़ज़ब है उन को वही न करना हुआ अगर शौक़ आइने से तो रुख़ रहे रास्ती की जानिब मिसाल-ए-आरिज़ सफ़ाई रखना ब-रंग-ए-काकुल कजी न करना वो ही हमारा तरीक़-ए-उल्फ़त कि दुश्मनों से भी मिल के चलना ये एक शेवा तिरा सितमगर कि दोस्त से दोस्ती न करना हम एक रस्ता गली का उस की दिखा के दिल को हुए पशेमाँ ये हज़रत-ए-ख़िज़्र को जता दो किसी की तुम रहबरी न करना बयान-ए-दर्द-ए-फ़िराक़ कैसा कि है वहाँ अपनी ये हक़ीक़त जो बात करनी तो नाला करना नहीं तो वो भी कभी न करना मदार है नासेहो तुम्हीं पर तमाम अब उस की मुंसिफ़ी का ज़रा तो कहना ख़ुदा-लगी भी फ़क़त सुख़न-परवरी न करना बुरी है ऐ 'दाग़' राह-ए-उल्फ़त ख़ुदा न ले जाए ऐसे रस्ते जो अपनी तुम ख़ैर चाहते हो तो भूल कर दिल-लगी न करना
Dagh Dehlvi
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दिल को क्या हो गया ख़ुदा जाने क्यूँँ है ऐसा उदास क्या जाने अपने ग़म में भी उस को सरफ़ा है न खिला जाने वो न खा जाने इस तजाहुल का क्या ठिकाना है जान कर जो न मुद्दआ' जाने कह दिया मैं ने राज़-ए-दिल अपना उस को तुम जानो या ख़ुदा जाने क्या ग़रज़ क्यूँँ इधर तवज्जोह हो हाल-ए-दिल आप की बला जाने जानते जानते ही जानेगा मुझ में क्या है अभी वो क्या जाने क्या हम उस बद-गुमाँ से बात करें जो सताइश को भी गिला जाने तुम न पाओगे सादा-दिल मुझ सा जो तग़ाफ़ुल को भी हया जाने है अबस जुर्म-ए-इश्क़ पर इल्ज़ाम जब ख़ता-वार भी ख़ता जाने नहीं कोताह दामन-ए-उम्मीद आगे अब दस्त-ए-ना-रसा जाने जो हो अच्छा हज़ार अच्छों का वाइ'ज़ उस बुत को तू बुरा जाने की मिरी क़द्र मिस्ल-ए-शाह-ए-दकन किसी नव्वाब ने न राजा ने उस से उट्ठेगी क्या मुसीबत-ए-इश्क़ इब्तिदा को जो इंतिहा जाने 'दाग़' से कह दो अब न घबराओ काम अपना बता हुआ जाने
Dagh Dehlvi
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कौन सा ताइर-ए-गुम-गश्ता उसे याद आया देखता भालता हर शाख़ को सय्याद आया मेरे क़ाबू में न पहरों दिल-ए-नाशाद आया वो मिरा भूलने वाला जो मुझे याद आया कोई भूला हुआ अंदाज़-ए-सितम याद आया कि तबस्सुम तुझे ज़ालिम दम-ए-बेदाद आया लाए हैं लोग जनाज़े की तरह महशर में किस मुसीबत से तिरा कुश्ता-ए-बेदाद आया जज़्ब-ए-वहशत तिरे क़ुर्बान तिरा क्या कहना खिंच के रग रग में मिरे नश्तर-ए-फ़स्साद आया उस के जल्वे को ग़रज़ कौन-ओ-मकाँ से क्या था दाद लेने के लिए हुस्न-ए-ख़ुदा-दाद आया बस्तियों से यही आवाज़ चली आती है जो किया तू ने वो आगे तिरे फ़रहाद आया दिल-ए-वीराँ से रक़ीबों ने मुरादें पाईं काम किस किस के मिरा ख़िर्मन-ए-बर्बाद आया इश्क़ के आते ही मुँह पर मिरे फूली है बसंत हो गया ज़र्द ये शागिर्द जब उस्ताद आया हो गया फ़र्ज़ मुझे शौक़ का दफ़्तर लिखना जब मिरे हाथ कोई ख़ामा-ए-फ़ौलाद आया ईद है क़त्ल मिरा अहल-ए-तमाशा के लिए सब गले मिलने लगे जब कि वो जल्लाद आया चैन करते हैं वहाँ रंज उठाने वाले काम उक़्बा में हमारा दिल-ए-नाशाद आया दी शब-ए-वस्ल मोअज़्ज़िन ने अज़ाँ पिछली रात हाए कम-बख़्त को किस वक़्त ख़ुदा याद आया मेरे नाले ने सुनाई है खरी किस किस को मुँह फ़रिश्तों पे ये गुस्ताख़ ये आज़ाद आया ग़म-ए-जावेद ने दी मुझ को मुबारकबादी जब सुना ये कि उन्हें शेवा-ए-बेदाद आया मैं तमन्ना-ए-शहादत का मज़ा भूल गया आज इस शौक़ से अरमान से जल्लाद आया शादियाना जो दिया नाला ओ शेवन ने दिया जब मुलाक़ात को नाशाद की नाशाद आया लीजिए सुनिए अब अफ़्साना-ए-फ़ुर्क़त मुझ से आप ने याद दिलाया तो मुझे याद आया आप की बज़्म में सब कुछ है मगर 'दाग़' नहीं हम को वो ख़ाना-ख़राब आज बहुत याद आया
Dagh Dehlvi
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सबक़ ऐसा पढ़ा दिया तू ने दिल से सब कुछ भला दिया तू ने हम निकम्में हुए ज़माने के काम ऐसा सिखा दिया तू ने कुछ तअ'ल्लुक़ रहा न दुनिया से शग़्ल ऐसा बता दिया तू ने किस ख़ुशी की ख़बर सुना के मुझे ग़म का पुतला बना दिया तू ने क्या बताऊँ कि क्या लिया मैं ने क्या कहूँ मैं की क्या दिया तू ने बे-तलब जो मिला मिला मुझ को बे-ग़रज़ जो दिया दिया तू ने उम्र-ए-जावेद ख़िज़्र को बख़्शी आब-ए-हैवाँ पिला दिया तू ने नार-ए-नमरूद को किया गुलज़ार दोस्त को यूँँ बचा दिया तू ने दस्त-ए-मूसा में फ़ैज़ बख़्शिश है नूर-ओ-लौह-ओ-असा दिया तू ने सुब्ह मौज नसीम गुलशन को नफ़स-ए-जाँ-फ़ज़ा दिया तू ने शब-ए-तीरा में शम्अ'' रौशन को नूर ख़ुर्शीद का दिया तू ने नग़्मा बुलबुल को रंग-ओ-बू गुल को दिल-कश-ओ-ख़ुशनुमा दिया तू ने कहीं मुश्ताक़ से हिजाब हुआ कहीं पर्दा उठा दिया तू ने था मिरा मुँह न क़ाबिल-ए-लब्बैक का'बा मुझ को दिखा दिया तू ने जिस क़दर मैं ने तुझ से ख़्वाहिश की इस से मुझ को सिवा दिया तू ने रहबर-ए-ख़िज़्र-ओ-हादी-ए-इल्यास मुझ को वो रहनुमा दिया तू ने मिट गए दिल से नक़्श-ए-बातिल सब नक़्शा अपना जमा दिया तू ने है यही राह मंज़िल-ए-मक़्सूद ख़ूब रस्ते लगा दिया तू ने मुझ गुनहगार को जो बख़्श दिया तो जहन्नुम को क्या दिया तू ने 'दाग़' को कौन देने वाला था जो दिया ऐ ख़ुदा दिया तू ने
Dagh Dehlvi
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