ghazalKuch Alfaaz

चाँद निकले किसी जानिब तिरी ज़ेबाई का रंग बदले किसी सूरत शब-ए-तन्हाई का दौलत-ए-लब से फिर ऐ ख़ुसरव-ए-शीरीं-दहनाँ आज अर्ज़ां हो कोई हर्फ़ शनासाई का गर्मी-ए-रश्क से हर अंजुमन-ए-गुल-बदनाँ तज़्किरा छेड़े तिरी पैरहन-आराई का सहन-ए-गुलशन में कभी ऐ शह-ए-शमशाद-क़दाँ फिर नज़र आए सलीक़ा तिरी रा'नाई का एक बार और मसीहा-ए-दिल-ए-दिल-ज़दगाँ कोई वा'दा कोई इक़रार मसीहाई का दीदा ओ दिल को सँभालो कि सर-ए-शाम-ए-फ़िराक़ साज़-ओ-सामान बहम पहुँचा है रुस्वाई का

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ज़ने हसीन थी और फूल चुन कर लाती थी मैं शे'र कहता था, वो दास्ताँ सुनाती थी अरब लहू था रगों में, बदन सुनहरा था वो मुस्कुराती नहीं थी, दीए जलाती थी "अली से दूर रहो", लोग उस सेे कहते थे "वो मेरा सच है", बहुत चीख कर बताती थी "अली ये लोग तुम्हें जानते नहीं हैं अभी" गले लगाकर मेरा हौसला बढ़ाती थी ये फूल देख रहे हो, ये उस का लहजा था ये झील देख रहे हो, यहाँ वो आती थी मैं उस के बा'द कभी ठीक से नहीं जागा वो मुझ को ख़्वाब नहीं नींद से जगाती थी उसे किसी से मोहब्बत थी और वो मैं नहीं था ये बात मुझ सेे ज़्यादा उसे रूलाती थी मैं कुछ बता नहीं सकता वो मेरी क्या थी "अली" कि उस को देख कर बस अपनी याद आती थी

Ali Zaryoun

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किसी लिबास की ख़ुशबू जब उड़ के आती है तेरे बदन की जुदाई बहुत सताती है तेरे गुलाब तरसते हैं तेरी ख़ुशबू को तेरी सफ़ेद चमेली तुझे बुलाती है तेरे बग़ैर मुझे चैन कैसे पड़ता हैं मेरे बगैर तुझे नींद कैसे आती है

Jaun Elia

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यहाँ तुम देखना रुतबा हमारा हमारी रेत है दरिया हमारा किसी से कल पिताजी कह रहे थे मुहब्बत खा गई लड़का हमारा तअ'ल्लुक़ ख़त्म करने जा रही है कहीं गिरवा न दे बच्चा हमारा

Kushal Dauneria

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मुझे उदास कर गए हो ख़ुश रहो मिरे मिज़ाज पर गए हो ख़ुश रहो मिरे लिए न रुक सके तो क्या हुआ जहाँ कहीं ठहर गए हो ख़ुश रहो ख़ुशी हुई है आज तुम को देख कर बहुत निखर सँवर गए हो ख़ुश रहो उदास हो किसी की बे-वफ़ाई पर वफ़ा कहीं तो कर गए हो ख़ुश रहो गली में और लोग भी थे आश्ना हमें सलाम कर गए हो ख़ुश रहो तुम्हें तो मेरी दोस्ती पे नाज़ था इसी से अब मुकर गए हो ख़ुश रहो किसी की ज़िन्दगी बनो कि बंदगी मिरे लिए तो मर गए हो ख़ुश रहो

Fazil Jamili

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सफ़र में धूप तो होगी जो चल सको तो चलो सभी हैं भीड़ में तुम भी निकल सको तो चलो किसी के वास्ते राहें कहाँ बदलती हैं तुम अपने आप को ख़ुद ही बदल सको तो चलो यहाँ किसी को कोई रास्ता नहीं देता मुझे गिरा के अगर तुम सँभल सको तो चलो कहीं नहीं कोई सूरज धुआँ धुआँ है फ़ज़ा ख़ुद अपने आप से बाहर निकल सको तो चलो यही है ज़िंदगी कुछ ख़्वाब चंद उम्मीदें इन्हीं खिलौनों से तुम भी बहल सको तो चलो

Nida Fazli

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बात बस से निकल चली है दिल की हालत सँभल चली है अब जुनूँ हद से बढ़ चला है अब तबीअ'त बहल चली है अश्क ख़ूनाब हो चले हैं ग़म की रंगत बदल चली है या यूँँही बुझ रही हैं शमएँ या शब-ए-हिज्र टल चली है लाख पैग़ाम हो गए हैं जब सबा एक पल चली है जाओ अब सो रहो सितारो दर्द की रात ढल चली है

Faiz Ahmad Faiz

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दरबार में अब सतवत-ए-शाही की अलामत दरबाँ का असा है कि मुसन्निफ़ का क़लम है आवारा है फिर कोह-ए-निदा पर जो बशारत तम्हीद-ए-मसर्रत है कि तूल-ए-शब-ए-ग़म है जिस धज्जी को गलियों में लिए फिरते हैं तिफ़्लाँ ये मेरा गरेबाँ है कि लश्कर का अलम है जिस नूर से है शहर की दीवार दरख़्शाँ ये ख़ून-ए-शहीदाँ है कि ज़र-ख़ाना-ए-जम है हल्क़ा किए बैठे रहो इक शम्अ' को यारो कुछ रौशनी बाक़ी तो है हर-चंद कि कम है

Faiz Ahmad Faiz

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अब के बरस दस्तूर-ए-सितम में क्या क्या बाब ईज़ाद हुए जो क़ातिल थे मक़्तूल हुए जो सैद थे अब सय्याद हुए पहले भी ख़िज़ाँ में बाग़ उजड़े पर यूँँ नहीं जैसे अब के बरस सारे बूटे पत्ता पत्ता रविश रविश बर्बाद हुए पहले भी तवाफ़-ए-शम्-ए-वफ़ा थी रस्म मोहब्बत वालों की हम तुम से पहले भी यहाँ 'मंसूर' हुए 'फ़रहाद' हुए इक गुल के मुरझाने पर क्या गुलशन में कोहराम मचा इक चेहरा कुम्हला जाने से कितने दिल नाशाद हुए 'फ़ैज़' न हम 'यूसुफ़' न कोई 'याक़ूब' जो हम को याद करे अपनी क्या कनआँ में रहे या मिस्र में जा आबाद हुए

Faiz Ahmad Faiz

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न अब रक़ीब न नासेह न ग़म-गुसार कोई तुम आश्ना थे तो थीं आश्नाइयाँ क्या क्या जुदा थे हम तो मुयस्सर थीं क़ुर्बतें कितनी बहम हुए तो पड़ी हैं जुदाइयाँ क्या क्या पहुँच के दर पे तेरे कितने मो'तबर ठहरे अगरचे रह में हुईं जग-हँसाइयाँ क्या क्या हम ऐसे सादा-दिलों की नियाज़-मंदी से बुतों ने की हैं जहाँ में ख़ुदाइयाँ क्या क्या सितम पे ख़ुश कभी लुत्फ़-ओ-करम से रंजीदा सिखाईं तुम ने हमें कज-अदाइयाँ क्या क्या

Faiz Ahmad Faiz

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गर्मी-ऐ-शौक़-ऐ-नज़ारा का असर तो देखो गुल खिले जाते हैं वो साया-ए-तर तो देखो ऐसे नादाँ भी न थे जाँ से गुज़रने वाले नासेहो पंद-गरो राह-गुज़र तो देखो वो तो वो है तुम्हें हो जाएगी उल्फ़त मुझ से इक नज़र तुम मिरा महबूब-ए-नज़र तो देखो वो जो अब चाक गरेबाँ भी नहीं करते हैं देखने वालो कभी उन का जिगर तो देखो दामन-ए-दर्द को गुलज़ार बना रक्खा है आओ इक दिन दिल-ए-पुर-ख़ूँ का हुनर तो देखो सुब्ह की तरह झमकता है शब-ए-ग़म का उफ़ुक़ 'फ़ैज़' ताबिंदगी-ए-दीदा-ए-तर तो देखो

Faiz Ahmad Faiz

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