ghazalKuch Alfaaz

चराग़ ख़ुद ही बुझाया बुझा के छोड़ दिया वो ग़ैर था उसे अपना बना के छोड़ दिया हज़ार चेहरे हैं मौजूद आदमी ग़ाएब ये किस ख़राबे में दुनिया ने ला के छोड़ दिया मैं अपनी जाँ में उसे जज़्ब किस तरह करता उसे गले से लगाया लगा के छोड़ दिया मैं जा चुका हूँ मिरे वास्ते उदास न हो मैं वो हूँ तू ने जिसे मुस्कुरा के छोड़ दिया किसी ने ये न बताया कि फ़ासला क्या है हर एक ने मुझे रस्ता दिखा के छोड़ दिया हमारे दिल में है क्या झाँक कर न देख सके ख़ुद अपनी ज़ात से पर्दा उठा के छोड़ दिया वो तेरा रोग भी है और तिरा इलाज भी है उसी को ढूँड जिसे तंग आ के छोड़ दिया वो अंजुमन में मिला भी तो उस ने बात न की कभी कभी कोई जुमला छुपा के छोड़ दिया रखूँ किसी से तवक़्क़ो तो क्या रखूँ 'शहज़ाद' ख़ुदा ने भी तो ज़मीं पर गिरा के छोड़ दिया

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कैसे उस ने ये सब कुछ मुझ सेे छुप कर बदला चेहरा बदला रस्ता बदला बा'द में घर बदला मैं उस के बारे में ये कहता था लोगों से मेरा नाम बदल देना वो शख़्स अगर बदला वो भी ख़ुश था उस ने दिल देकर दिल माँगा है मैं भी ख़ुश हूँ मैं ने पत्थर से पत्थर बदला मैं ने कहा क्या मेरी ख़ातिर ख़ुद को बदलोगे और फिर उस ने नज़रें बदलीं और नंबर बदला

Tehzeeb Hafi

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वो बे-वफ़ा है तो क्या मत कहो बुरा उस को कि जो हुआ सो हुआ ख़ुश रखे ख़ुदा उस को नज़र न आए तो उस की तलाश में रहना कहीं मिले तो पलट कर न देखना उस को वो सादा-ख़ू था ज़माने के ख़म समझता क्या हवा के साथ चला ले उड़ी हवा उस को वो अपने बारे में कितना है ख़ुश-गुमाँ देखो जब उस को मैं भी न देखूँ तो देखना उस को अभी से जाना भी क्या उस की कम-ख़याली पर अभी तो और बहुत होगा सोचना उस को उसे ये धुन कि मुझे कम से कम उदास रखे मिरी दु'आ कि ख़ुदा दे ये हौसला उस को पनाह ढूँढ़ रही है शब-ए-गिरफ़्ता-दिलाँ कोई बताओ मिरे घर का रास्ता उस को ग़ज़ल में तज़्किरा उस का न कर 'नसीर' कि अब भुला चुका वो तुझे तू भी भूल जा उस को

Naseer Turabi

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पागल कैसे हो जाते हैं देखो ऐसे हो जाते हैं ख़्वाबों का धंधा करती हो कितने पैसे हो जाते हैं दुनिया सा होना मुश्किल है तेरे जैसे हो जाते हैं मेरे काम ख़ुदा करता है तेरे वैसे हो जाते हैं

Ali Zaryoun

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अब के हम बिछड़े तो शायद कभी ख़्वाबों में मिलें जिस तरह सूखे हुए फूल किताबों में मिलें ढूँढ़ उजड़े हुए लोगों में वफ़ा के मोती ये ख़ज़ाने तुझे मुमकिन है ख़राबों में मिलें ग़म-ए-दुनिया भी ग़म-ए-यार में शामिल कर लो नशा बढ़ता है शराबें जो शराबों में मिलें तू ख़ुदा है न मिरा इश्क़ फ़रिश्तों जैसा दोनों इंसाँ हैं तो क्यूँँ इतने हिजाबों में मिलें आज हम दार पे खींचे गए जिन बातों पर क्या अजब कल वो ज़माने को निसाबों में मिलें अब न वो मैं न वो तू है न वो माज़ी है 'फ़राज़' जैसे दो शख़्स तमन्ना के सराबों में मिलें

Ahmad Faraz

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उसूलों पर जहाँ आँच आए टकराना ज़रूरी है जो ज़िंदा हो तो फिर ज़िंदा नज़र आना ज़रूरी है नई 'उम्रों की ख़ुदमुख़्तारियों को कौन समझाये कहाँ से बच के चलना है कहाँ जाना ज़रूरी है थके हारे परिंदे जब बसेरे के लिए लौटें सलीक़ामन्द शाख़ों का लचक जाना ज़रूरी है बहुत बेबाक आँखों में तअल्लुक़ टिक नहीं पाता मुहब्बत में कशिश रखने को शर्माना ज़रूरी है सलीक़ा ही नहीं शायद उसे महसूस करने का जो कहता है ख़ुदा है तो नज़र आना ज़रूरी है मेरे होंठों पे अपनी प्यास रख दो और फिर सोचो कि इस के बा'द भी दुनिया में कुछ पाना ज़रूरी है

Waseem Barelvi

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अपनी तस्वीर को आँखों से लगाता क्या है इक नज़र मेरी तरफ़ भी तिरा जाता क्या है मेरी रुस्वाई में वो भी हैं बराबर के शरीक मेरे क़िस्से मिरे यारों को सुनाता क्या है पास रह कर भी न पहचान सका तू मुझ को दूर से देख के अब हाथ हिलाता क्या है ज़ेहन के पर्दों पे मंज़िल के हयूले न बना ग़ौर से देखता जा राह में आता क्या है ज़ख़्म-ए-दिल जुर्म नहीं तोड़ भी दे मोहर-ए-सुकूत जो तुझे जानते हैं उन से छुपाता क्या है सफ़र-ए-शौक़ में क्यूँँ काँपते हैं पाँव तिरे आँख रखता है तो फिर आँख चुराता क्या है उम्र भर अपने गरेबाँ से उलझने वाले तू मुझे मेरे ही साए से डराता क्या है चाँदनी देख के चेहरे को छुपाने वाले धूप में बैठ के अब बाल सुखाता क्या है मर गए प्यास के मारे तो उठा अब्र-ए-करम बुझ गई बज़्म तो अब शम्अ' जलाता क्या है मैं तिरा कुछ भी नहीं हूँ मगर इतना तो बता देख कर मुझ को तिरे ज़ेहन में आता क्या है तेरा एहसास ज़रा सा तिरी हस्ती पायाब तो समुंदर की तरह शोर मचाता क्या है तुझ में कस-बल है तो दुनिया को बहा कर ले जा चाय की प्याली में तूफ़ान उठाता क्या है तेरी आवाज़ का जादू न चलेगा उन पर जागने वालों को 'शहज़ाद' जगाता क्या है

Shahzad Ahmad

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