चेहरा हुआ मैं और मिरी तस्वीर हुए सब मैं लफ़्ज़ हुआ मुझ में ही ज़ंजीर हुए सब बुनियाद भी मेरी दर-ओ-दीवार भी मेरे ता'मीर हुआ मैं कि ये ता'मीर हुए सब वैसे ही लिखोगे तो मिरा नाम भी होगा जो लफ़्ज़ लिखे वो मिरी जागीर हुए सब मरते हैं मगर मौत से पहले नहीं मरते ये वाक़िआ'' ऐसा है कि दिल-गीर हुए सब वो अहल-ए-क़लम साया-ए-रहमत की तरह थे हम इतने घटे अपनी ही ता'ज़ीर हुए सब उस लफ़्ज़ की मानिंद जो खुलता ही चला जाए ये ज़ात-ओ-ज़माँ मुझ से ही तहरीर हुए सब इतना सुख़न-ए-'मीर' नहीं सहल ख़ुदा ख़ैर नक़्क़ाद भी अब मो'तक़िद-ए-'मीर' हुए सब
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तुम्हें बस ये बताना चाहता हूँ मैं तुम से क्या छुपाना चाहता हूँ कभी मुझ से भी कोई झूठ बोलो मैं हाँ में हाँ मिलाना चाहता हूँ ये जो खिड़की है नक़्शे में तुम्हारे यहाँ मैं दर बनाना चाहता हूँ अदाकारी बहुत दुख दे रही है मैं सच-मुच मुस्कुराना चाहता हूँ परों में तीर है पंजों में तिनके मैं ये चिड़िया उड़ाना चाहता हूँ लिए बैठा हूँ घुँघरू फूल मोती तिरा हँसना बनाना चाहता हूँ अमीरी इश्क़ की तुम को मुबारक मैं बस खाना-कमाना चाहता हूँ मैं सारे शहर की बैसाखियों को तिरे दर पर नचाना चाहता हूँ मुझे तुम सेे बिछड़ना ही पड़ेगा मैं तुम को याद आना चाहता हूँ
Fahmi Badayuni
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कैसे उस ने ये सब कुछ मुझ सेे छुप कर बदला चेहरा बदला रस्ता बदला बा'द में घर बदला मैं उस के बारे में ये कहता था लोगों से मेरा नाम बदल देना वो शख़्स अगर बदला वो भी ख़ुश था उस ने दिल देकर दिल माँगा है मैं भी ख़ुश हूँ मैं ने पत्थर से पत्थर बदला मैं ने कहा क्या मेरी ख़ातिर ख़ुद को बदलोगे और फिर उस ने नज़रें बदलीं और नंबर बदला
Tehzeeb Hafi
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वो बे-वफ़ा है तो क्या मत कहो बुरा उस को कि जो हुआ सो हुआ ख़ुश रखे ख़ुदा उस को नज़र न आए तो उस की तलाश में रहना कहीं मिले तो पलट कर न देखना उस को वो सादा-ख़ू था ज़माने के ख़म समझता क्या हवा के साथ चला ले उड़ी हवा उस को वो अपने बारे में कितना है ख़ुश-गुमाँ देखो जब उस को मैं भी न देखूँ तो देखना उस को अभी से जाना भी क्या उस की कम-ख़याली पर अभी तो और बहुत होगा सोचना उस को उसे ये धुन कि मुझे कम से कम उदास रखे मिरी दु'आ कि ख़ुदा दे ये हौसला उस को पनाह ढूँढ़ रही है शब-ए-गिरफ़्ता-दिलाँ कोई बताओ मिरे घर का रास्ता उस को ग़ज़ल में तज़्किरा उस का न कर 'नसीर' कि अब भुला चुका वो तुझे तू भी भूल जा उस को
Naseer Turabi
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ज़बाँ तो खोल नज़र तो मिला जवाब तो दे मैं कितनी बार लुटा हूँ मुझे हिसाब तो दे तेरे बदन की लिखावट में है उतार चढ़ाव मैं तुझे कैसे पढूँगा मुझे किताब तो दे तेरा सवाल है साक़ी कि ज़िंदगी क्या है? जवाब देता हूँ पहले मुझे शराब तो दे
Rahat Indori
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वैसे मैं ने दुनिया में क्या देखा है तुम कहते हो तो फिर अच्छा देखा है मैं उस को अपनी वहशत तोहफ़े में दूँ हाथ उठाए जिस ने सहरा देखा है बिन देखे उस की तस्वीर बना लूँगा आज तो मैं ने उस को इतना देखा है एक नज़र में मंज़र कब खुलते हैं दोस्त तू ने देखा भी है तो क्या देखा है इश्क़ में बंदा मर भी सकता है मैं ने दिल की दस्तावेज़ में लिखा देखा है मैं तो आँखें देख के ही बतला दूँगा तुम में से किस किस ने दरिया देखा है आगे सीधे हाथ पे एक तराई है मैं ने पहले भी ये रस्ता देखा है तुम को तो इस बाग़ का नाम पता होगा तुम ने तो इस शहर का नक़्शा देखा है
Tehzeeb Hafi
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वो रात बे-पनाह थी और मैं ग़रीब था वो जिस ने ये चराग़ जलाया अजीब था वो रौशनी कि आँख उठाई नहीं गई कल मुझ से मेरा चाँद बहुत ही क़रीब था देखा मुझे तो तब्अ रवाँ हो गई मिरी वो मुस्कुरा दिया तो मैं शाइ'र अदीब था रखता न क्यूँँ मैं रूह ओ बदन उस के सामने वो यूँँ भी था तबीब वो यूँँ भी तबीब था हर सिलसिला था उस का ख़ुदा से मिला हुआ चुप हो कि लब-कुशा हो बला का ख़तीब था मौज-ए-नशात ओ सैल-ए-ग़म-ए-जाँ थे एक साथ गुलशन में नग़्मा-संज अजब अंदलीब था मैं भी रहा हूँ ख़ल्वत-ए-जानाँ में एक शाम ये ख़्वाब है या वाक़ई मैं ख़ुश-नसीब था हर्फ़-ए-दुआ ओ दस्त-ए-सख़ावत के बाब में ख़ुद मेरा तजरबा है वो बे-हद नजीब था देखा है उस को ख़ल्वत ओ जल्वत में बार-हा वो आदमी बहुत ही अजीब-ओ-ग़रीब था लिक्खो तमाम उम्र मगर फिर भी तुम 'अलीम' उस को दिखा न पाओ वो ऐसा हबीब था
Obaidullah Aleem
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अज़ीज़ इतना ही रक्खो कि जी सँभल जाए अब इस क़दर भी न चाहो कि दम निकल जाए मिले हैं यूँँ तो बहुत आओ अब मिलें यूँँ भी कि रूह गर्मी-ए-अनफ़ास से पिघल जाए मोहब्बतों में अजब है दिलों को धड़का सा कि जाने कौन कहाँ रास्ता बदल जाए ज़हे वो दिल जो तमन्ना-ए-ताज़ा-तर में रहे ख़ोशा वो उम्र जो ख़्वाबों ही में बहल जाए मैं वो चराग़ सर-ए-रहगुज़ार-ए-दुनिया हूँ जो अपनी ज़ात की तन्हाइयों में जल जाए हर एक लहजा यही आरज़ू यही हसरत जो आग दिल में है वो शे'र में भी ढल जाए
Obaidullah Aleem
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साहिब-ए-मेहर-ओ-वफ़ा अर्ज़-ओ-समा क्यूँँ चुप है हम पे तो वक़्त के पहरे हैं ख़ुदा क्यूँँ चुप है बे-सबब ग़म में सुलगना मिरी आदत ही सही साज़ ख़ामोश है क्यूँँ शोला-नवा क्यूँँ चुप है फूल तो सहम गए दस्त-ए-करम से दम-ए-सुब्ह गुनगुनाती हुई आवारा सबा क्यूँँ चुप है ख़त्म होगा न कभी सिलसिला-ए-अहल-ए-वफ़ा सोच ऐ दावर-ए-मक़्तल ये फ़ज़ा क्यूँँ चुप है मुझ पे तारी है रह-ए-इश्क़ की आसूदा थकन तुझ पे क्या गुज़री मिरे चाँद बता क्यूँँ चुप है जानने वाले तो सब जान गए होंगे 'अलीम' एक मुद्दत से तिरा ज़ेहन-ए-रसा क्यूँँ चुप है
Obaidullah Aleem
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कोई धुन हो मैं तिरे गीत ही गाए जाऊँ दर्द सीने में उठे शोर मचाए जाऊँ ख़्वाब बन कर तू बरसता रहे शबनम शबनम और बस मैं इसी मौसम में नहाए जाऊँ तेरे ही रंग उतरते चले जाएँ मुझ में ख़ुद को लिक्खूँ तिरी तस्वीर बनाए जाऊँ जिस को मिलना नहीं फिर उस से मोहब्बत कैसी सोचता जाऊँ मगर दिल में बसाए जाऊँ अब तू उस की हुई जिस पे मुझे प्यार आता है ज़िंदगी आ तुझे सीने से लगाए जाऊँ यही चेहरे मिरे होने की गवाही देंगे हर नए हर्फ़ में जाँ अपनी समाए जाऊँ जान तो चीज़ है क्या रिश्ता-ए-जाँ से आगे कोई आवाज़ दिए जाए मैं आए जाऊँ शायद इस राह पे कुछ और भी राही आएँ धूप में चलता रहूँ साए बिछाए जाऊँ अहल-ए-दिल होंगे तो समझेंगे सुख़न को मेरे बज़्म में आ ही गया हूँ तो सुनाए जाऊँ
Obaidullah Aleem
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ऐसी तेज़ हवा और ऐसी रात नहीं देखी लेकिन हम ने मौला जैसी ज़ात नहीं देखी उस की शान-ए-अजीब का मंज़र देखने वाला है इक ऐसा ख़ुर्शीद कि जिस ने रात नहीं देखी बिस्तर पर मौजूद रहे और सैर-ए-हफ़्त-अफ़्लाक ऐसी किसी पर रहमत की बरसात नहीं देखी उस की आल वही जो उस के नक़्श-ए-क़दम पर सिर्फ़ ज़ात की हम ने आल-ए-सादात नहीं देखी एक शजर है जिस की शाख़ें फैलती जाती हैं किसी शजर में हम ने ऐसी बात नहीं देखी इक दरिया-ए-रहमत है जो बहता जाता है ये शान-ए-बरकात किसी के साथ नहीं देखी शाहों की तारीख़ भी हम ने देखी है लेकिन उस के दर के गदाओं वाली बात नहीं देखी उस के नाम पे मारें खाना अब एज़ाज़ हमारा और किसी की ये इज़्ज़त औक़ात नहीं देखी सदियों की इस धूप छाँव में कोई हमें बतलाए पूरी हुई कौन सी उस की बात नहीं देखी अहल-ए-ज़मीं ने कौन सा हम पर ज़ुल्म नहीं ढाया कौन सी नुसरत हम ने उस के हाथ नहीं देखी
Obaidullah Aleem
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