दरिया हो या पहाड़ हो टकराना चाहिए जब तक न साँस टूटे जिए जाना चाहिए यूँँ तो क़दम क़दम पे है दीवार सामने कोई न हो तो ख़ुद से उलझ जाना चाहिए झुकती हुई नज़र हो कि सिमटा हुआ बदन हर रस-भरी घटा को बरस जाना चाहिए चौराहे बाग़ बिल्डिंगें सब शहर तो नहीं कुछ ऐसे वैसे लोगों से याराना चाहिए अपनी तलाश अपनी नज़र अपना तजरबा रस्ता हो चाहे साफ़ भटक जाना चाहिए चुप चुप मकान रास्ते गुम-सुम निढाल वक़्त इस शहर के लिए कोई दीवाना चाहिए बिजली का क़ुमक़ुमा न हो काला धुआँ तो हो ये भी अगर नहीं हो तो बुझ जाना चाहिए
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तेरे पीछे होगी दुनिया पागल बन क्या बोला मैं ने कुछ समझा? पागल बन सहरा में भी ढूँढ़ ले दरिया पागल बन वरना मर जाएगा प्यासा पागल बन आधा दाना आधा पागल नइँ नइँ नइँ उस को पाना है तो पूरा पागल बन दानाई दिखलाने से कुछ हासिल नहीं पागल खाना है ये दुनिया पागल बन देखें तुझ को लोग तो पागल हो जाएँ इतना उम्दा इतना आला पागल बन लोगों से डर लगता है तो घर में बैठ जिगरा है तो मेरे जैसा पागल बन
Varun Anand
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किस तरह होगा फ़कीरों का गुज़ारा सोचे उस सेे कहना कि वो इक बार दुबारा सोचे कैसे मुमकिन है उसे और कोई काम न हो कैसे मुमकिन है कि वो सिर्फ़ हमारा सोचे तेरे अफ़लाक पे जाए तो सितारा चमके मेरे अफ़लाक पे आए तो सितारा सोचे टूटे पतवार की कश्ती का मुक़द्दर क्या है ये तो दरिया ही बताए या किनारा सोचे ऐसा मौका हो कि बस एक ही बच सकता हो और उस वक़्त भी एक शख़्स तुम्हारा सोचे
Zahid Bashir
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सर झुकाओगे तो पत्थर देवता हो जाएगा इतना मत चाहो उसे वो बे-वफ़ा हो जाएगा हम भी दरिया हैं हमें अपना हुनर मालूम है जिस तरफ़ भी चल पड़ेंगे रास्ता हो जाएगा कितनी सच्चाई से मुझ से ज़िंदगी ने कह दिया तू नहीं मेरा तो कोई दूसरा हो जाएगा मैं ख़ुदा का नाम ले कर पी रहा हूँ दोस्तो ज़हर भी इस में अगर होगा दवा हो जाएगा सब उसी के हैं हवा ख़ुशबू ज़मीन ओ आसमाँ मैं जहाँ भी जाऊँगा उस को पता हो जाएगा
Bashir Badr
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टूटने पर कोई आए तो फिर ऐसा टूटे कि जिसे देख के हर देखने वाला टूटे अपने बिखरे हुए टुकड़ों को समेटे कब तक एक इंसान की ख़ातिर कोई कितना टूटे कोई टुकड़ा तेरी आँखों में न चुभ जाए कहीं दूर हो जा कि मेरे ख़्वाब का शीशा टूटे मैं किसी और को सोचूँ तो मुझे होश आए मैं किसी और को देखूँ तो ये नश्शा टूटे रंज होता है तो ऐसा कि बताए न बने जब किसी अपने के बाइ'से कोई अपना टूटे पास बैठे हुए यारों को ख़बर तक न हुई हम किसी बात पे इस दर्जा अनोखा टूटे इतनी जल्दी तो सँभलने की तवक़्क़ो' न करो वक़्त ही कितना हुआ है मेरा सपना टूटे दाद की भीक न माँग ऐ मेरे अच्छे शाएर जा तुझे मेरी दुआ है तेरा कासा टूटे तू उसे किस के भरोसे पे नहीं कात रही चर्ख़ को देखने वाली तेरा चर्ख़ा टूटे वर्ना कब तक लिए फिरता रहूँ उस को 'जव्वाद' कोई सूरत हो कि उम्मीद से रिश्ता टूटे
Jawwad Sheikh
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थोड़ा लिक्खा और ज़ियादा छोड़ दिया आने वालों के लिए रस्ता छोड़ दिया तुम क्या जानो उस दरिया पर क्या गुज़री तुम ने तो बस पानी भरना छोड़ दिया लड़कियाँ इश्क़ में कितनी पागल होती हैं फ़ोन बजा और चूल्हा जलता छोड़ दिया रोज़ इक पत्ता मुझ में आ गिरता है जब से मैं ने जंगल जाना छोड़ दिया बस कानों पर हाथ रखे थे थोड़ी देर और फिर उस आवाज़ ने पीछा छोड़ दिए
Tehzeeb Hafi
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दिन सलीक़े से उगा रात ठिकाने से रही दोस्ती अपनी भी कुछ रोज़ ज़माने से रही चंद लम्हों को ही बनती हैं मुसव्विर आँखें ज़िंदगी रोज़ तो तस्वीर बनाने से रही इस अँधेरे में तो ठोकर ही उजाला देगी रात जंगल में कोई शम्अ' जलाने से रही फ़ासला चाँद बना देता है हर पत्थर को दूर की रौशनी नज़दीक तो आने से रही शहर में सब को कहाँ मिलती है रोने की जगह अपनी इज़्ज़त भी यहाँ हँसने हँसाने से रही
Nida Fazli
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गिरजा में मंदिरों में अज़ानों में बट गया होते ही सुब्ह आदमी ख़ानों में बट गया इक इश्क़ नाम का जो परिंदा ख़ला में था उतरा जो शहर में तो दुकानों में बट गया पहले तलाशा खेत फिर दरिया की खोज की बाक़ी का वक़्त गेहूँ के दानों में बट गया जब तक था आसमान में सूरज सभी का था फिर यूँँ हुआ वो चंद मकानों में बट गया हैं ताक में शिकारी निशाना हैं बस्तियाँ आलम तमाम चंद मचानों में बट गया ख़बरों ने की मुसव्वरी ख़बरें ग़ज़ल बनीं ज़िंदा लहू तो तीर कमानों में बट गया
Nida Fazli
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हर एक घर में दिया भी जले अनाज भी हो अगर न हो कहीं ऐसा तो एहतिजाज भी हो रहेगी वा'दों में कब तक असीर ख़ुश-हाली हर एक बार ही कल क्यूँँ कभी तो आज भी हो न करते शोर-शराबा तो और क्या करते तुम्हारे शहर में कुछ और काम-काज भी हो हुकूमतों को बदलना तो कुछ मुहाल नहीं हुकूमतें जो बदलता है वो समाज भी हो बदल रहे हैं कई आदमी दरिंदों में मरज़ पुराना है इस का नया इलाज भी हो अकेले ग़म से नई शा'इरी नहीं होती ज़बान-ए-'मीर' में 'ग़ालिब' का इम्तिज़ाज भी हो
Nida Fazli
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जिसे देखते ही ख़ुमारी लगे उसे उम्र सारी हमारी लगे उजाला सा है उस के चारों तरफ़ वो नाज़ुक बदन पाँव भारी लगे वो ससुराल से आई है माइके उसे जितना देखो वो प्यारी लगे हसीन सूरतें और भी हैं मगर वो सब सैकड़ों में हज़ारी लगे चलो इस तरह से सजाएँ उसे ये दुनिया हमारी तुम्हारी लगे उसे देखना शेर-गोई का फ़न उसे सोचना दीन-दारी लगे
Nida Fazli
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दुख में नीर बहा देते थे सुख में हँसने लगते थे सीधे-सादे लोग थे लेकिन कितने अच्छे लगते थे नफ़रत चढ़ती आँधी जैसी प्यार उबलते चश्मों सा बैरी हूँ या संगी साथी सारे अपने लगते थे बहते पानी दुख-सुख बाँटें पेड़ बड़े बूढ़ों जैसे बच्चों की आहट सुनते ही खेत लहकने लगते थे नदिया पर्बत चाँद निगाहें माला एक कई दाने छोटे छोटे से आँगन भी कोसों फैले लगते थे
Nida Fazli
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