ghazalKuch Alfaaz

दरवाज़ा बंद देख के मेरे मकान का झोंका हवा का खिड़की के पर्दे हिला गया वो जान-ए-नौ-बहार जिधर से गुज़र गया पेड़ों ने फूल पत्तों से रस्ता छुपा लिया उस के क़रीब जाने का अंजाम ये हुआ मैं अपने-आप से भी बहुत दूर जा पड़ा अँगड़ाई ले रही थी गुलिस्ताँ में जब बहार हर फूल अपने रंग की आतिश में जल गया काँटे से टूटते हैं मिरे अंग अंग में रग रग में चाँद जलता हुआ ज़हर भर गया आँखों ने उस को देखा नहीं इस के बावजूद दिल उस की याद से कभी ग़ाफ़िल नहीं रहा दरवाज़ा खटखटा के सितारे चले गए ख़्वाबों की शाल ओढ़ के मैं ऊँघता रहा शब चाँदनी की आँच में तप कर निखर गई सूरज की जलती आग में दिन ख़ाक हो गया सड़कें तमाम धूप से अँगारा हो गईं अंधी हवाएँ चलती हैं इन पर बरहना-पा वो आए थोड़ी देर रुके और चले गए 'आदिल' मैं सर झुकाए हुए चुप खड़ा रहा

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बैठे हैं चैन से कहीं जाना तो है नहीं हम बे-घरों का कोई ठिकाना तो है नहीं तुम भी हो बीते वक़्त के मानिंद हू-ब-हू तुम ने भी याद आना है आना तो है नहीं अहद-ए-वफ़ा से किस लिए ख़ाइफ़ हो मेरी जान कर लो कि तुम ने अहद निभाना तो है नहीं वो जो हमें अज़ीज़ है कैसा है कौन है क्यूँँ पूछते हो हम ने बताना तो है नहीं दुनिया हम अहल-ए-इश्क़ पे क्यूँँ फेंकती है जाल हम ने तिरे फ़रेब में आना तो है नहीं वो इश्क़ तो करेगा मगर देख भाल के 'फ़ारिस' वो तेरे जैसा दिवाना तो है नहीं

Rehman Faris

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पागल कैसे हो जाते हैं देखो ऐसे हो जाते हैं ख़्वाबों का धंधा करती हो कितने पैसे हो जाते हैं दुनिया सा होना मुश्किल है तेरे जैसे हो जाते हैं मेरे काम ख़ुदा करता है तेरे वैसे हो जाते हैं

Ali Zaryoun

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जो तेरे साथ रहते हुए सोगवार हो लानत हो ऐसे शख़्स पे और बेशुमार हो अब इतनी देर भी ना लगा, ये हो ना कहीं तू आ चुका हो और तेरा इंतिज़ार हो मैं फूल हूँ तो फिर तेरे बालो में क्यूँ नहीं हूँ तू तीर है तो मेरे कलेजे के पार हो एक आस्तीन चढ़ाने की आदत को छोड़ कर ‘हाफ़ी’ तुम आदमी तो बहुत शानदार हो

Tehzeeb Hafi

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ज़ने हसीन थी और फूल चुन कर लाती थी मैं शे'र कहता था, वो दास्ताँ सुनाती थी अरब लहू था रगों में, बदन सुनहरा था वो मुस्कुराती नहीं थी, दीए जलाती थी "अली से दूर रहो", लोग उस सेे कहते थे "वो मेरा सच है", बहुत चीख कर बताती थी "अली ये लोग तुम्हें जानते नहीं हैं अभी" गले लगाकर मेरा हौसला बढ़ाती थी ये फूल देख रहे हो, ये उस का लहजा था ये झील देख रहे हो, यहाँ वो आती थी मैं उस के बा'द कभी ठीक से नहीं जागा वो मुझ को ख़्वाब नहीं नींद से जगाती थी उसे किसी से मोहब्बत थी और वो मैं नहीं था ये बात मुझ सेे ज़्यादा उसे रूलाती थी मैं कुछ बता नहीं सकता वो मेरी क्या थी "अली" कि उस को देख कर बस अपनी याद आती थी

Ali Zaryoun

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अब मेरे साथ नहीं है समझे ना समझाने की बात नहीं है समझे ना तुम माँगोगे और तुम्हें मिल जाएगा प्यार है ये ख़ैरात नहीं है समझे ना मैं बादल हूँ जिस पर चाहूँ बरसूँगा मेरी कोई ज़ात नहीं है समझे ना अपना ख़ाली हाथ मुझे मत दिखलाओ इस में मेरा हाथ नहीं है समझे ना

Zubair Ali Tabish

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ज़मीं छोड़ कर मैं किधर जाऊँगा अँधेरों के अंदर उतर जाऊँगा मिरी पत्तियाँ सारी सूखी हुईं नए मौसमों में बिखर जाऊँगा अगर आ गया आइना सामने तो अपने ही चेहरे से डर जाऊँगा वो इक आँख जो मेरी अपनी भी है न आई नज़र तो किधर जाऊँगा वो इक शख़्स आवाज़ देगा अगर मैं ख़ाली सड़क पर ठहर जाऊँगा पलट कर न पाया किसी को अगर तो अपनी ही आहट से डर जाऊँगा तिरी ज़ात में साँस ली है सदा तुझे छोड़ कर मैं किधर जाऊँगा

Adil Mansuri

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चेहरे पे चमचमाती हुई धूप मर गई सूरज को ढलता देख के फिर शाम डर गई मबहूत से खड़े रहे सब बस की लाइन में कूल्हे उछालती हुई बिजली गुज़र गई सूरज वही था धूप वही शहर भी वही क्या चीज़ थी जो जिस्म के अंदर ठिठर गई ख़्वाहिश सुखाने रक्खी थी कोठे पे दोपहर अब शाम हो चली मियाँ देखो किधर गई तहलील हो गई है हवा में उदासियाँ ख़ाली जगह जो रह गई तन्हाई भर गई चेहरे बग़ैर निकला था उस के मकान से रुस्वाइयों की हद से भी आगे ख़बर गई रंगों की सुर्ख़ नाफ़ दाखिल्या गुल-आफ़ताब अंधी हवाएँ ख़ार खटक कान भर गई

Adil Mansuri

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बदन पर नई फ़स्ल आने लगी हवा दिल में ख़्वाहिश जगाने लगी कोई ख़ुद-कुशी की तरफ़ चल दिया उदासी की मेहनत ठिकाने लगी जो चुप-चाप रहती थी दीवार पर वो तस्वीर बातें बनाने लगी ख़यालों के तारीक खंडरात में ख़मोशी ग़ज़ल गुनगुनाने लगी ज़रा देर बैठे थे तन्हाई में तिरी याद आँखें दुखाने लगी

Adil Mansuri

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चारों तरफ़ से मौत ने घेरा है ज़ीस्त को और उस के साथ हुक्म कि अब ज़िंदगी करो बाहर गली में शोर है बरसात का सुनो कुंडी लगा के आज तो घर में पड़े रहो छोड़ आए किस की छत पे जवाँ-साल चाँद को ख़ामोश किस लिए हो सितारो जवाब दो क्यूँँ चलते चलते रुक गए वीरान रास्तो तन्हा हूँ आज मैं ज़रा घर तक तो साथ दो जिस ने भी मुड़ के देखा वो पत्थर का हो गया नज़रें झुकाए दोस्तो चुप चुप चले चलो अल्लाह रक्खे तेरी सहर जैसी कम-सिनी दिल काँपता है जब भी तू आती है शाम को वीराँ चमन पे रोई है शबनम तमाम रात ऐसे में कोई नन्ही कली मुस्कुराए तो 'आदिल' हवाएँ कब से भी देती हैं दस्तकें जल्दी से उठ के कमरे का दरवाज़ा खोल दो

Adil Mansuri

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एक क़तरा अश्क का छलका तो दरिया कर दिया एक मुश्त-ए-ख़ाक जो बिखरी तो सहरा कर दिया मेरे टूटे हौसले के पर निकलते देख कर उस ने दीवारों को अपनी और ऊँचा कर दिया वारदात-ए-क़ल्ब लिक्खी हम ने फ़र्ज़ी नाम से और हाथों-हाथ उस को ख़ुद ही ले जा कर दिया उस की नाराज़ी का सूरज जब सवा नेज़े पे था अपने हर्फ़-ए-इज्ज़ ही ने सर पे साया कर दिया दुनिया भर की ख़ाक कोई छानता फिरता है अब आप ने दर से उठा कर कैसा रुस्वा कर दिया अब न कोई ख़ौफ़ दिल में और न आँखों में उमीद तू ने मर्ग-ए-ना-गहाँ बीमार अच्छा कर दिया भूल जा ये कल तिरे नक़्श-ए-क़दम थे चाँद पर देख उन हाथों को किस ने आज कासा कर दिया हम तो कहने जा रहे थे हम्ज़ा-ए-ये वस्सलाम बीच में उस ने अचानक नून-ग़ुन्ना कर दिया हम को गाली के लिए भी लब हिला सकते नहीं ग़ैर को बोसा दिया तो मुँह से दिखला कर दिया तीरगी की भी कोई हद होती है आख़िर मियाँ सुर्ख़ परचम को जला कर ही उजाला कर दिया बज़्म में अहल-ए-सुख़न तक़्तीअ' फ़रमाते रहे और हम ने अपने दिल का बोझ हल्का कर दिया जाने किस के मुंतज़िर बैठे हैं झाड़ू फेर कर दिल से हर ख़्वाहिश को 'आदिल' हम ने चलता कर दिया

Adil Mansuri

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