ghazalKuch Alfaaz

चेहरे पे चमचमाती हुई धूप मर गई सूरज को ढलता देख के फिर शाम डर गई मबहूत से खड़े रहे सब बस की लाइन में कूल्हे उछालती हुई बिजली गुज़र गई सूरज वही था धूप वही शहर भी वही क्या चीज़ थी जो जिस्म के अंदर ठिठर गई ख़्वाहिश सुखाने रक्खी थी कोठे पे दोपहर अब शाम हो चली मियाँ देखो किधर गई तहलील हो गई है हवा में उदासियाँ ख़ाली जगह जो रह गई तन्हाई भर गई चेहरे बग़ैर निकला था उस के मकान से रुस्वाइयों की हद से भी आगे ख़बर गई रंगों की सुर्ख़ नाफ़ दाखिल्या गुल-आफ़ताब अंधी हवाएँ ख़ार खटक कान भर गई

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टूटने पर कोई आए तो फिर ऐसा टूटे कि जिसे देख के हर देखने वाला टूटे अपने बिखरे हुए टुकड़ों को समेटे कब तक एक इंसान की ख़ातिर कोई कितना टूटे कोई टुकड़ा तेरी आँखों में न चुभ जाए कहीं दूर हो जा कि मेरे ख़्वाब का शीशा टूटे मैं किसी और को सोचूँ तो मुझे होश आए मैं किसी और को देखूँ तो ये नश्शा टूटे रंज होता है तो ऐसा कि बताए न बने जब किसी अपने के बाइ'से कोई अपना टूटे पास बैठे हुए यारों को ख़बर तक न हुई हम किसी बात पे इस दर्जा अनोखा टूटे इतनी जल्दी तो सँभलने की तवक़्क़ो' न करो वक़्त ही कितना हुआ है मेरा सपना टूटे दाद की भीक न माँग ऐ मेरे अच्छे शाएर जा तुझे मेरी दुआ है तेरा कासा टूटे तू उसे किस के भरोसे पे नहीं कात रही चर्ख़ को देखने वाली तेरा चर्ख़ा टूटे वर्ना कब तक लिए फिरता रहूँ उस को 'जव्वाद' कोई सूरत हो कि उम्मीद से रिश्ता टूटे

Jawwad Sheikh

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हालत जो हमारी है तुम्हारी तो नहीं है ऐसा है तो फिर ये कोई यारी तो नहीं है तहक़ीर ना कर ये मेरी उधड़ी हुई गुदड़ी जैसी भी है अपनी है उधारी तो नहीं है तन्हा ही सही लड़ तो रही है वो अकेली बस थक के गिरी है अभी हारी तो नहीं है ये तू जो मोहब्बत में सिला माँग रहा है ऐ शख़्स तू अंदर से भिखारी तो नहीं है जितनी भी कमा ली हो बना ली हो ये दुनिया दुनिया है तो फिर दोस्त तुम्हारी तो नहीं है

Ali Zaryoun

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हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी कि हर ख़्वाहिश पे दम निकले बहुत निकले मिरे अरमान लेकिन फिर भी कम निकले डरे क्यूँँ मेरा क़ातिल क्या रहेगा उस की गर्दन पर वो ख़ूँ जो चश्म-ए-तर से उम्र भर यूँँ दम-ब-दम निकले निकलना ख़ुल्द से आदम का सुनते आए हैं लेकिन बहुत बे-आबरू हो कर तिरे कूचे से हम निकले भरम खुल जाए ज़ालिम तेरे क़ामत की दराज़ी का अगर इस तुर्रा-ए-पुर-पेच-ओ-ख़म का पेच-ओ-ख़म निकले मगर लिखवाए कोई उस को ख़त तो हम से लिखवाए हुई सुब्ह और घर से कान पर रख कर क़लम निकले हुई इस दौर में मंसूब मुझ से बादा-आशामी फिर आया वो ज़माना जो जहाँ में जाम-ए-जम निकले हुई जिन से तवक़्क़ो' ख़स्तगी की दाद पाने की वो हम से भी ज़ियादा ख़स्ता-ए-तेग़-ए-सितम निकले मोहब्बत में नहीं है फ़र्क़ जीने और मरने का उसी को देख कर जीते हैं जिस काफ़िर पे दम निकले कहाँ मय-ख़ाने का दरवाज़ा 'ग़ालिब' और कहाँ वाइ'ज़ पर इतना जानते हैं कल वो जाता था कि हम निकले

Mirza Ghalib

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जिस तरह वक़्त गुज़रने के लिए होता है आदमी शक्ल पे मरने के लिए होता है तेरी आँखों से मुलाक़ात हुई तब ये खुला डूबने वाला उभरने के लिए होता है इश्क़ क्यूँँ पीछे हटा बात निभाने से मियाँ हुस्न तो ख़ैर मुकरने के लिए होता है आँख होती है किसी राह को तकने के लिए दिल किसी पाँव पे धरने के लिए होता है दिल की दिल्ली का चुनाव ही अलग है साहब जब भी होता है ये हरने के लिए होता है कोई बस्ती हो उजड़ने के लिए बसती है कोई मज़मा हो बिखरने के लिए होता है

Ali Zaryoun

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तुम सर्वत को पढ़ती हो कितनी अच्छी लड़की हो बात नहीं सुनती हो क्यूँँ ग़ज़लें भी तो सुनती हो क्या रिश्ता है शामों से सूरज की क्या लगती हो लोग नहीं डरते रब से तुम लोगों से डरती हो मैं तो जीता हूँ तुम में तुम क्यूँँ मुझ पे मरती हो आदम और सुधर जाए तुम भी हद ही करती हो किस ने जींस करी ममनूअ' पहनो अच्छी लगती हो

Ali Zaryoun

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ज़मीं छोड़ कर मैं किधर जाऊँगा अँधेरों के अंदर उतर जाऊँगा मिरी पत्तियाँ सारी सूखी हुईं नए मौसमों में बिखर जाऊँगा अगर आ गया आइना सामने तो अपने ही चेहरे से डर जाऊँगा वो इक आँख जो मेरी अपनी भी है न आई नज़र तो किधर जाऊँगा वो इक शख़्स आवाज़ देगा अगर मैं ख़ाली सड़क पर ठहर जाऊँगा पलट कर न पाया किसी को अगर तो अपनी ही आहट से डर जाऊँगा तिरी ज़ात में साँस ली है सदा तुझे छोड़ कर मैं किधर जाऊँगा

Adil Mansuri

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चारों तरफ़ से मौत ने घेरा है ज़ीस्त को और उस के साथ हुक्म कि अब ज़िंदगी करो बाहर गली में शोर है बरसात का सुनो कुंडी लगा के आज तो घर में पड़े रहो छोड़ आए किस की छत पे जवाँ-साल चाँद को ख़ामोश किस लिए हो सितारो जवाब दो क्यूँँ चलते चलते रुक गए वीरान रास्तो तन्हा हूँ आज मैं ज़रा घर तक तो साथ दो जिस ने भी मुड़ के देखा वो पत्थर का हो गया नज़रें झुकाए दोस्तो चुप चुप चले चलो अल्लाह रक्खे तेरी सहर जैसी कम-सिनी दिल काँपता है जब भी तू आती है शाम को वीराँ चमन पे रोई है शबनम तमाम रात ऐसे में कोई नन्ही कली मुस्कुराए तो 'आदिल' हवाएँ कब से भी देती हैं दस्तकें जल्दी से उठ के कमरे का दरवाज़ा खोल दो

Adil Mansuri

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दरवाज़ा बंद देख के मेरे मकान का झोंका हवा का खिड़की के पर्दे हिला गया वो जान-ए-नौ-बहार जिधर से गुज़र गया पेड़ों ने फूल पत्तों से रस्ता छुपा लिया उस के क़रीब जाने का अंजाम ये हुआ मैं अपने-आप से भी बहुत दूर जा पड़ा अँगड़ाई ले रही थी गुलिस्ताँ में जब बहार हर फूल अपने रंग की आतिश में जल गया काँटे से टूटते हैं मिरे अंग अंग में रग रग में चाँद जलता हुआ ज़हर भर गया आँखों ने उस को देखा नहीं इस के बावजूद दिल उस की याद से कभी ग़ाफ़िल नहीं रहा दरवाज़ा खटखटा के सितारे चले गए ख़्वाबों की शाल ओढ़ के मैं ऊँघता रहा शब चाँदनी की आँच में तप कर निखर गई सूरज की जलती आग में दिन ख़ाक हो गया सड़कें तमाम धूप से अँगारा हो गईं अंधी हवाएँ चलती हैं इन पर बरहना-पा वो आए थोड़ी देर रुके और चले गए 'आदिल' मैं सर झुकाए हुए चुप खड़ा रहा

Adil Mansuri

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बदन पर नई फ़स्ल आने लगी हवा दिल में ख़्वाहिश जगाने लगी कोई ख़ुद-कुशी की तरफ़ चल दिया उदासी की मेहनत ठिकाने लगी जो चुप-चाप रहती थी दीवार पर वो तस्वीर बातें बनाने लगी ख़यालों के तारीक खंडरात में ख़मोशी ग़ज़ल गुनगुनाने लगी ज़रा देर बैठे थे तन्हाई में तिरी याद आँखें दुखाने लगी

Adil Mansuri

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बिस्मिल के तड़पने की अदाओं में नशा था मैं हाथ में तलवार लिए झूम रहा था घूँघट में मिरे ख़्वाब की ता'बीर छुपी थी मेहंदी से हथेली में मिरा नाम लिखा था लब थे कि किसी प्याली के होंटों पे झुके थे और हाथ कहीं गर्दन-ए-मीना में पड़ा था हम्माम के आईने में शब डूब रही थी सिगरेट से नए दिन का धुआँ फैल रहा था दरिया के किनारे पे मिरी लाश पड़ी थी और पानी की तह में वो मुझे ढूँढ़ रहा था मालूम नहीं फिर वो कहाँ छुप गया 'आदिल' साया सा कोई लम्स की सरहद पे मिला था

Adil Mansuri

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