ghazalKuch Alfaaz

अब मेरे साथ नहीं है समझे ना समझाने की बात नहीं है समझे ना तुम माँगोगे और तुम्हें मिल जाएगा प्यार है ये ख़ैरात नहीं है समझे ना मैं बादल हूँ जिस पर चाहूँ बरसूँगा मेरी कोई ज़ात नहीं है समझे ना अपना ख़ाली हाथ मुझे मत दिखलाओ इस में मेरा हाथ नहीं है समझे ना

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वो बे-वफ़ा है तो क्या मत कहो बुरा उस को कि जो हुआ सो हुआ ख़ुश रखे ख़ुदा उस को नज़र न आए तो उस की तलाश में रहना कहीं मिले तो पलट कर न देखना उस को वो सादा-ख़ू था ज़माने के ख़म समझता क्या हवा के साथ चला ले उड़ी हवा उस को वो अपने बारे में कितना है ख़ुश-गुमाँ देखो जब उस को मैं भी न देखूँ तो देखना उस को अभी से जाना भी क्या उस की कम-ख़याली पर अभी तो और बहुत होगा सोचना उस को उसे ये धुन कि मुझे कम से कम उदास रखे मिरी दु'आ कि ख़ुदा दे ये हौसला उस को पनाह ढूँढ़ रही है शब-ए-गिरफ़्ता-दिलाँ कोई बताओ मिरे घर का रास्ता उस को ग़ज़ल में तज़्किरा उस का न कर 'नसीर' कि अब भुला चुका वो तुझे तू भी भूल जा उस को

Naseer Turabi

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अब के हम बिछड़े तो शायद कभी ख़्वाबों में मिलें जिस तरह सूखे हुए फूल किताबों में मिलें ढूँढ़ उजड़े हुए लोगों में वफ़ा के मोती ये ख़ज़ाने तुझे मुमकिन है ख़राबों में मिलें ग़म-ए-दुनिया भी ग़म-ए-यार में शामिल कर लो नशा बढ़ता है शराबें जो शराबों में मिलें तू ख़ुदा है न मिरा इश्क़ फ़रिश्तों जैसा दोनों इंसाँ हैं तो क्यूँँ इतने हिजाबों में मिलें आज हम दार पे खींचे गए जिन बातों पर क्या अजब कल वो ज़माने को निसाबों में मिलें अब न वो मैं न वो तू है न वो माज़ी है 'फ़राज़' जैसे दो शख़्स तमन्ना के सराबों में मिलें

Ahmad Faraz

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बैठे हैं चैन से कहीं जाना तो है नहीं हम बे-घरों का कोई ठिकाना तो है नहीं तुम भी हो बीते वक़्त के मानिंद हू-ब-हू तुम ने भी याद आना है आना तो है नहीं अहद-ए-वफ़ा से किस लिए ख़ाइफ़ हो मेरी जान कर लो कि तुम ने अहद निभाना तो है नहीं वो जो हमें अज़ीज़ है कैसा है कौन है क्यूँँ पूछते हो हम ने बताना तो है नहीं दुनिया हम अहल-ए-इश्क़ पे क्यूँँ फेंकती है जाल हम ने तिरे फ़रेब में आना तो है नहीं वो इश्क़ तो करेगा मगर देख भाल के 'फ़ारिस' वो तेरे जैसा दिवाना तो है नहीं

Rehman Faris

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ये मैं ने कब कहा कि मेरे हक़ में फ़ैसला करे अगर वो मुझ से ख़ुश नहीं है तो मुझे जुदा करे मैं उस के साथ जिस तरह गुज़ारता हूँ ज़िंदगी उसे तो चाहिए कि मेरा शुक्रिया अदा करे मेरी दुआ है और इक तरह से बद-दुआ भी है ख़ुदा तुम्हें तुम्हारे जैसी बेटियाँ अता करे बना चुका हूँ मैं मोहब्बतों के दर्द की दवा अगर किसी को चाहिए तो मुझ सेे राब्ता करे

Tehzeeb Hafi

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उसूलों पर जहाँ आँच आए टकराना ज़रूरी है जो ज़िंदा हो तो फिर ज़िंदा नज़र आना ज़रूरी है नई 'उम्रों की ख़ुदमुख़्तारियों को कौन समझाये कहाँ से बच के चलना है कहाँ जाना ज़रूरी है थके हारे परिंदे जब बसेरे के लिए लौटें सलीक़ामन्द शाख़ों का लचक जाना ज़रूरी है बहुत बेबाक आँखों में तअल्लुक़ टिक नहीं पाता मुहब्बत में कशिश रखने को शर्माना ज़रूरी है सलीक़ा ही नहीं शायद उसे महसूस करने का जो कहता है ख़ुदा है तो नज़र आना ज़रूरी है मेरे होंठों पे अपनी प्यास रख दो और फिर सोचो कि इस के बा'द भी दुनिया में कुछ पाना ज़रूरी है

Waseem Barelvi

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चाँद को दामन में ला कर रख दिया उस ने मेरी गोद में सर रख दिया आँख में आँसू है किस के नाम के किस ने कश्ती में समुंदर रख दिया वो बताने लग गया मजबूरियाँ और फिर हम ने रिसीवर रख दिया

Zubair Ali Tabish

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अक़्ल ने अच्छे अच्छों को बहकाया था शुक्र है हम पर कुछ वहशत का साया था तुम ने अपनी गर्दन ऊँची ही रक्खी वरना मैं तो माला ले कर आया था मैं अब तक उस के ही रंग में रंगा हूँ जिस ने सब सेे पहले रंग लगाया था मेरी राय सब सेे पहले ली जाए मैं ने सब सेे पहले धोख़ा खाया था सब को इल्म है फूल और ख़ुश्बू दोनों में सब सेे पहले किस ने हाथ छुड़ाया था इक लड़की ने फिर मुझ को बहकाया है इक लड़की ने अच्छे से समझाया था

Zubair Ali Tabish

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तुम्हारे ग़म से तौबा कर रहा हूँ तअ'ज्जुब है मैं ऐसा कर रहा हूँ है अपने हाथ में अपना गिरेबाँ न जाने किस से झगड़ा कर रहा हूँ बहुत से बंद ताले खुल रहे हैं तिरे सब ख़त इकट्ठा कर रहा हूँ कोई तितली निशाने पर नहीं है मैं बस रंगों का पीछा कर रहा हूँ मैं रस्मन कह रहा हूँ फिर मिलेंगे ये मत समझो कि वा'दा कर रहा हूँ मिरे अहबाब सारे शहर में हैं मैं अपने गाँव में क्या कर रहा हूँ मिरी हर इक ग़ज़ल असली है साहब कई बरसों से धंदा कर रहा हूँ

Zubair Ali Tabish

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बस इक निगाह-ए-नाज़ को तरसा हुआ था मैं हालांकि शहर-शहर में फैला हुआ था मैं मुद्दत के बा'द आइना देखा तो रो पड़ा किस बेहतरीन दोस्त से रूठा हुआ था मैं पहना जो रेनकोट तो बारिश नहीं हुई लौटा जो घर तो शर्म से भीगा हुआ था मैं पहले भी दी गई थी मुझे बज़्म की दुआ पहले भी इस दुआ पे अकेला हुआ था मैं कितनी अजीब बात है ना! तू ही आ गया! तेरे ही इंतिज़ार में बैठा हुआ था मैं

Zubair Ali Tabish

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चल ख़्वाहिश की बात करेंगे ख़ाली डिश की बात करेंगे पहले प्यासे तो बन जाओ फिर बारिश की बात करेंगे आना टूटा रिश्ता ले कर गुंजाइश की बात करेंगे बन्दे इक दो सज्दे कर के फ़रमाइश की बात करेंगे तुम औरों के शे'र सुनाओ हम ताबिश की बात करेंगे

Zubair Ali Tabish

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