तुम्हारे ग़म से तौबा कर रहा हूँ तअ'ज्जुब है मैं ऐसा कर रहा हूँ है अपने हाथ में अपना गिरेबाँ न जाने किस से झगड़ा कर रहा हूँ बहुत से बंद ताले खुल रहे हैं तिरे सब ख़त इकट्ठा कर रहा हूँ कोई तितली निशाने पर नहीं है मैं बस रंगों का पीछा कर रहा हूँ मैं रस्मन कह रहा हूँ फिर मिलेंगे ये मत समझो कि वा'दा कर रहा हूँ मिरे अहबाब सारे शहर में हैं मैं अपने गाँव में क्या कर रहा हूँ मिरी हर इक ग़ज़ल असली है साहब कई बरसों से धंदा कर रहा हूँ
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यही अपनी कहानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले वो लड़की जाँ हमारी थी, मियाँ पहले बहुत पहले वहम मुझ को ये भाता है,अभी मेरी दिवानी है मगर मेरी दिवानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले रक़ीब आ कर बताते हैं यहाँ तिल है, वहाँ तिल है हमें ये जानकारी थी मियाँ पहले, बहुत पहले अदब से माँग कर माफ़ी भरी महफ़िल ये कहता हूँ वो लड़की ख़ानदानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले
Anand Raj Singh
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क्यूँँ डरें ज़िन्दगी में क्या होगा कुछ न होगा तो तजरबा होगा हँसती आँखों में झाँक कर देखो कोई आँसू कहीं छुपा होगा इन दिनों ना-उमीद सा हूँ मैं शायद उस ने भी ये सुना होगा देख कर तुम को सोचता हूँ मैं क्या किसी ने तुम्हें छुआ होगा
Javed Akhtar
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मेरे बस में नहीं वरना क़ुदरत का लिखा हुआ काटता तेरे हिस्से में आए बुरे दिन कोई दूसरा काटता लारियों से ज़्यादा बहाव था तेरे हर इक लफ्ज़ में मैं इशारा नहीं काट सकता तेरी बात क्या काटता मैं ने भी ज़िंदगी और शब ए हिज्र काटी है सबकी तरह वैसे बेहतर तो ये था के मैं कम से कम कुछ नया काटता तेरे होते हुए मोमबत्ती बुझाई किसी और ने क्या ख़ुशी रह गई थी जन्मदिन की, मैं केक क्या काटता कोई भी तो नहीं जो मेरे भूखे रहने पे नाराज़ हो जेल में तेरी तस्वीर होती तो हँसकर सज़ा काटता
Tehzeeb Hafi
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चाँद सितारे फूल परिंदे शाम सवेरा एक तरफ़ सारी दुनिया उस का चर्बा उस का चेहरा एक तरफ़ वो लड़कर भी सो जाए तो उस का माथा चूमूँ मैं उस सेे मुहब्बत एक तरफ़ है उस सेे झगड़ा एक तरफ़ जिस शय पर वो उँगली रख दे उस को वो दिलवानी है उस की ख़ुशियाँ सब से अव्वल सस्ता महँगा एक तरफ़ ज़ख़्मों पर मरहम लगवाओ लेकिन उस के हाथों से चारासाज़ी एक तरफ़ है उस का छूना एक तरफ़ सारी दुनिया जो भी बोले सब कुछ शोर शराबा है सब का कहना एक तरफ़ है उस का कहना एक तरफ़ उस ने सारी दुनिया माँगी मैं ने उस को माँगा है उस के सपने एक तरफ़ है मेरा सपना एक तरफ़
Varun Anand
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तेरी मुश्किल न बढ़ाऊँगा चला जाऊँगा अश्क आँखों में छुपाऊँगा चला जाऊँगा अपनी दहलीज़ पे कुछ देर पड़ा रहने दे जैसे ही होश में आऊँगा चला जाऊँगा ख़्वाब लेने कोई आए कि न आए कोई मैं तो आवाज़ लगाऊँगा चला जाऊँगा चंद यादें मुझे बच्चों की तरह प्यारी हैं उन को सीने से लगाऊँगा चला जाऊँगा मुद्दतों बा'द मैं आया हूँ पुराने घर में ख़ुद को जी भर के रुलाऊँगा चला जाऊँगा इस जज़ीरे में ज़ियादा नहीं रहना अब तो आजकल नाव बनाऊँगा चला जाऊँगा मौसम-ए-गुल की तरह लौट के आऊँगा 'हसन' हर तरफ़ फूल खिलाऊँगा चला जाऊँगा
Hasan Abbasi
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चाँद को दामन में ला कर रख दिया उस ने मेरी गोद में सर रख दिया आँख में आँसू है किस के नाम के किस ने कश्ती में समुंदर रख दिया वो बताने लग गया मजबूरियाँ और फिर हम ने रिसीवर रख दिया
Zubair Ali Tabish
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बैठे-बैठे इक दम से चौंकाती है याद तिरी कब दस्तक दे कर आती है तितली के जैसी है मेरी हर ख़्वाहिश हाथ लगाने से पहले उड़ जाती है मेरे सज्दे राज़ नहीं रहने वाले उस की चौखट माथे को चमकाती है इश्क़ में जितना बहको उतना ही अच्छा ये गुमराही मंज़िल तक पहुँचाती है पहली पहली बार अजब सा लगता है धीरे धीरे आदत सी हो जाती है तुम उस को भी समझा कर पछताओगे वो भी मेरे ही जैसी जज़्बाती है
Zubair Ali Tabish
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ग़ज़ल तो सब को मीठी लग रही थी मगर नातिक को मिर्ची लग रही थी तुम्हारे लब नहीं चू में थे जब तक मुझे हर चीज़ कड़वी लग रही थी मैं जिस दिन छोड़ने वाला था उस को वो उस दिन सब सेे प्यारी लग रही थी
Zubair Ali Tabish
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वो पास क्या ज़रा सा मुस्कुरा के बैठ गया मैं इस मज़ाक़ को दिल से लगा के बैठ गया जब उस की बज़्म में दार-ओ-रसन की बात चली मैं झट से उठ गया और आगे आ के बैठ गया दरख़्त काट के जब थक गया लकड़-हारा तो इक दरख़्त के साए में जा के बैठ गया तुम्हारे दर से मैं कब उठना चाहता था मगर ये मेरा दिल है कि मुझ को उठा के बैठ गया जो मेरे वास्ते कुर्सी लगाया करता था वो मेरी कुर्सी से कुर्सी लगा के बैठ गया फिर उस के बा'द कई लोग उठ के जाने लगे मैं उठ के जाने का नुस्ख़ा बता के बैठ गया
Zubair Ali Tabish
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दिल फिर उस कूचे में जाने वाला है बैठे-बिठाए ठोकर खाने वाला है तर्क-ए-त'अल्लुक़ का धड़का सा है दिल को वो मुझ को इक बात बताने वाला है कितने अदब से बैठे हैं सूखे पौदे जैसे बादल शे'र सुनाने वाला है ये मत सोच सराए पर क्या बीतेगी तू तो बस इक रात बिताने वाला है ईंटों को आपस में मिलाने वाला शख़्स अस्ल में इक दीवार उठाने वाला है गाड़ी की रफ़्तार में आई है सुस्ती शायद अब स्टेशन आने वाला है आख़िरी हिचकी लेनी है अब आ जाओ बा'द में तुम को कौन बुलाने वाला है
Zubair Ali Tabish
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