वो पास क्या ज़रा सा मुस्कुरा के बैठ गया मैं इस मज़ाक़ को दिल से लगा के बैठ गया जब उस की बज़्म में दार-ओ-रसन की बात चली मैं झट से उठ गया और आगे आ के बैठ गया दरख़्त काट के जब थक गया लकड़-हारा तो इक दरख़्त के साए में जा के बैठ गया तुम्हारे दर से मैं कब उठना चाहता था मगर ये मेरा दिल है कि मुझ को उठा के बैठ गया जो मेरे वास्ते कुर्सी लगाया करता था वो मेरी कुर्सी से कुर्सी लगा के बैठ गया फिर उस के बा'द कई लोग उठ के जाने लगे मैं उठ के जाने का नुस्ख़ा बता के बैठ गया
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ये ग़म क्या दिल की आदत है नहीं तो किसी से कुछ शिकायत है नहीं तो है वो इक ख़्वाब-ए-बे-ताबीर उस को भुला देने की निय्यत है नहीं तो किसी के बिन किसी की याद के बिन जिए जाने की हिम्मत है नहीं तो किसी सूरत भी दिल लगता नहीं हाँ तो कुछ दिन से ये हालत है नहीं तो तेरे इस हाल पर है सब को हैरत तुझे भी इस पे हैरत है नहीं तो हम-आहंगी नहीं दुनिया से तेरी तुझे इस पर नदामत है नहीं तो हुआ जो कुछ यही मक़्सूम था क्या यही सारी हिकायत है नहीं तो अज़िय्यत-नाक उम्मीदों से तुझ को अमाँ पाने की हसरत है नहीं तो तू रहता है ख़याल-ओ-ख़्वाब में गुम तो इस की वज्ह फ़ुर्सत है नहीं तो सबब जो इस जुदाई का बना है वो मुझ सेे ख़ूब-सूरत है नहीं तो
Jaun Elia
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मेरे बस में नहीं वरना क़ुदरत का लिखा हुआ काटता तेरे हिस्से में आए बुरे दिन कोई दूसरा काटता लारियों से ज़्यादा बहाव था तेरे हर इक लफ्ज़ में मैं इशारा नहीं काट सकता तेरी बात क्या काटता मैं ने भी ज़िंदगी और शब ए हिज्र काटी है सबकी तरह वैसे बेहतर तो ये था के मैं कम से कम कुछ नया काटता तेरे होते हुए मोमबत्ती बुझाई किसी और ने क्या ख़ुशी रह गई थी जन्मदिन की, मैं केक क्या काटता कोई भी तो नहीं जो मेरे भूखे रहने पे नाराज़ हो जेल में तेरी तस्वीर होती तो हँसकर सज़ा काटता
Tehzeeb Hafi
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क्यूँँ डरें ज़िन्दगी में क्या होगा कुछ न होगा तो तजरबा होगा हँसती आँखों में झाँक कर देखो कोई आँसू कहीं छुपा होगा इन दिनों ना-उमीद सा हूँ मैं शायद उस ने भी ये सुना होगा देख कर तुम को सोचता हूँ मैं क्या किसी ने तुम्हें छुआ होगा
Javed Akhtar
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इतना मजबूर न कर बात बनाने लग जाएँ हम तेरे सर की क़सम झूठ ही खाने लग जाएँ इतने सन्नाटे पिए मेरी समा'अत ने कि अब सिर्फ़ आवाज़ पे चाहूँ तो निशाने लग जाएँ चलिए कुछ और नहीं आह-शुमारी ही सही हम किसी काम तो इस दिल के बहाने लग जाएँ हम वो गुम-गश्त-ए-मोहब्बत हैं कि तुम तो क्या हो ख़ुद को हम ढूँडने निकलें तो ज़माने लग जाएँ ख़्वाब कुछ ऐसे दिखाए हैं फ़क़ीरी ने मुझे जिन की ता'बीर में शाहों के ख़ज़ाने लग जाएँ मैं अगर अपनी जवानी के सुना दूँ क़िस्से ये जो लौंडे हैं मिरे पाँव दबाने लग जाएँ
Mehshar Afridi
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कैसे उस ने ये सब कुछ मुझ सेे छुप कर बदला चेहरा बदला रस्ता बदला बा'द में घर बदला मैं उस के बारे में ये कहता था लोगों से मेरा नाम बदल देना वो शख़्स अगर बदला वो भी ख़ुश था उस ने दिल देकर दिल माँगा है मैं भी ख़ुश हूँ मैं ने पत्थर से पत्थर बदला मैं ने कहा क्या मेरी ख़ातिर ख़ुद को बदलोगे और फिर उस ने नज़रें बदलीं और नंबर बदला
Tehzeeb Hafi
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चाँद को दामन में ला कर रख दिया उस ने मेरी गोद में सर रख दिया आँख में आँसू है किस के नाम के किस ने कश्ती में समुंदर रख दिया वो बताने लग गया मजबूरियाँ और फिर हम ने रिसीवर रख दिया
Zubair Ali Tabish
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बैठे-बैठे इक दम से चौंकाती है याद तिरी कब दस्तक दे कर आती है तितली के जैसी है मेरी हर ख़्वाहिश हाथ लगाने से पहले उड़ जाती है मेरे सज्दे राज़ नहीं रहने वाले उस की चौखट माथे को चमकाती है इश्क़ में जितना बहको उतना ही अच्छा ये गुमराही मंज़िल तक पहुँचाती है पहली पहली बार अजब सा लगता है धीरे धीरे आदत सी हो जाती है तुम उस को भी समझा कर पछताओगे वो भी मेरे ही जैसी जज़्बाती है
Zubair Ali Tabish
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चल ख़्वाहिश की बात करेंगे ख़ाली डिश की बात करेंगे पहले प्यासे तो बन जाओ फिर बारिश की बात करेंगे आना टूटा रिश्ता ले कर गुंजाइश की बात करेंगे बन्दे इक दो सज्दे कर के फ़रमाइश की बात करेंगे तुम औरों के शे'र सुनाओ हम ताबिश की बात करेंगे
Zubair Ali Tabish
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भरे हुए जाम पर सुराही का सर झुका तो बुरा लगेगा जिसे तेरी आरज़ू नहीं तू उसे मिला तो बुरा लगेगा ये ऐसा रस्ता है जिस पे हर कोई बारहा लड़खड़ा रहा है मैं पहली ठोकर के बा'द ही गर सँभल गया तो बुरा लगेगा मैं ख़ुश हूँ उस के निकालने पर और इतना आगे निकल चुका हूँ के अब अचानक से उस ने वापस बुला लिया तो बुरा लगेगा ये आख़िरी कंपकंपाता जुमला कि इस तअ'ल्लुक़ को ख़त्म कर दो बड़े जतन से कहा है उस ने नहीं किया तो बुरा लगेगा न जाने कितने ग़मों को पीने के बा'द ताबिश चढ़ी उदासी किसी ने ऐसे में आ के हम को हँसा दिया तो बुरा लगेगा
Zubair Ali Tabish
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एक पहुँचा हुआ मुसाफ़िर है दिल भटकने में फिर भी माहिर है कौन लाया है इश्क़ पर ईमाँ मैं भी काफ़िर हूँ तू भी काफ़िर है दर्द का वो जो हर्फ़-ए-अव्वल था दर्द का वो ही हर्फ़-ए-आख़िर है काम अधूरा पड़ा है ख़्वाबों का आज फिर नींद ग़ैर-हाज़िर है लाज रख ली तिरी समाअ'त ने वर्ना 'ताबिश' भी कोई शाइ'र है
Zubair Ali Tabish
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