दयार-ए-नूर में तीरा-शबों का साथी हो कोई तो हो जो मिरी वहशतों का साथी हो मैं उस से झूट भी बोलूँ तो मुझ से सच बोले मिरे मिज़ाज के सब मौसमों का साथी हो मैं उस के हाथ न आऊँ वो मेरा हो के रहे मैं गिर पड़ूँ तो मिरी पस्तियों का साथी हो वो मेरे नाम की निस्बत से मो'तबर ठहरे गली गली मिरी रुस्वाइयों का साथी हो करे कलाम जो मुझ से तो मेरे लहजे में मैं चुप रहूँ तो मेरे तेवरों का साथी हो मैं अपने आप को देखूँ वो मुझ को देखे जाए वो मेरे नफ़्स की गुमराहियों का साथी हो वो ख़्वाब देखे तो देखे मिरे हवाले से मिरे ख़याल के सब मंज़रों का साथी हो
Related Ghazal
तुम्हें बस ये बताना चाहता हूँ मैं तुम से क्या छुपाना चाहता हूँ कभी मुझ से भी कोई झूठ बोलो मैं हाँ में हाँ मिलाना चाहता हूँ ये जो खिड़की है नक़्शे में तुम्हारे यहाँ मैं दर बनाना चाहता हूँ अदाकारी बहुत दुख दे रही है मैं सच-मुच मुस्कुराना चाहता हूँ परों में तीर है पंजों में तिनके मैं ये चिड़िया उड़ाना चाहता हूँ लिए बैठा हूँ घुँघरू फूल मोती तिरा हँसना बनाना चाहता हूँ अमीरी इश्क़ की तुम को मुबारक मैं बस खाना-कमाना चाहता हूँ मैं सारे शहर की बैसाखियों को तिरे दर पर नचाना चाहता हूँ मुझे तुम सेे बिछड़ना ही पड़ेगा मैं तुम को याद आना चाहता हूँ
Fahmi Badayuni
249 likes
बैठे हैं चैन से कहीं जाना तो है नहीं हम बे-घरों का कोई ठिकाना तो है नहीं तुम भी हो बीते वक़्त के मानिंद हू-ब-हू तुम ने भी याद आना है आना तो है नहीं अहद-ए-वफ़ा से किस लिए ख़ाइफ़ हो मेरी जान कर लो कि तुम ने अहद निभाना तो है नहीं वो जो हमें अज़ीज़ है कैसा है कौन है क्यूँँ पूछते हो हम ने बताना तो है नहीं दुनिया हम अहल-ए-इश्क़ पे क्यूँँ फेंकती है जाल हम ने तिरे फ़रेब में आना तो है नहीं वो इश्क़ तो करेगा मगर देख भाल के 'फ़ारिस' वो तेरे जैसा दिवाना तो है नहीं
Rehman Faris
196 likes
ज़बाँ तो खोल नज़र तो मिला जवाब तो दे मैं कितनी बार लुटा हूँ मुझे हिसाब तो दे तेरे बदन की लिखावट में है उतार चढ़ाव मैं तुझे कैसे पढूँगा मुझे किताब तो दे तेरा सवाल है साक़ी कि ज़िंदगी क्या है? जवाब देता हूँ पहले मुझे शराब तो दे
Rahat Indori
190 likes
सितम ढाते हुए सोचा करोगे हमारे साथ तुम ऐसा करोगे? अँगूठी तो मुझे लौटा रहे हो अँगूठी के निशाँ का क्या करोगे? मैं तुम सेे अब झगड़ता भी नहीं हूँ तो क्या इस बात पर झगड़ा करोगे? मेरा दामन तुम्हीं था में हुए हो मेरा दामन तुम्हीं मैला करोगे बताओ वा'दा कर के आओगे ना? के पिछली बार के जैसा करोगे? वो दुल्हन बन के रुख़्सत हो गई है कहाँ तक कार का पीछा करोगे? मुझे बस यूँँ ही तुम सेे पूछना था अगर मैं मर गया तो क्या करोगे?
Zubair Ali Tabish
140 likes
यही अपनी कहानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले वो लड़की जाँ हमारी थी, मियाँ पहले बहुत पहले वहम मुझ को ये भाता है,अभी मेरी दिवानी है मगर मेरी दिवानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले रक़ीब आ कर बताते हैं यहाँ तिल है, वहाँ तिल है हमें ये जानकारी थी मियाँ पहले, बहुत पहले अदब से माँग कर माफ़ी भरी महफ़िल ये कहता हूँ वो लड़की ख़ानदानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले
Anand Raj Singh
526 likes
More from Iftikhar Arif
वफ़ा की ख़ैर मनाता हूँ बे-वफ़ाई में भी मैं उस की क़ैद में हूँ क़ैद से रिहाई में भी लहू की आग में जल-बुझ गए बदन तो खुला रसाई में भी ख़सारा है ना-रसाई में भी बदलते रहते हैं मौसम गुज़रता रहता है वक़्त मगर ये दिल कि वहीं का वहीं जुदाई में भी लिहाज़-ए-हुर्मत-ए-पैमाँ न पास-ए-हम-ख़्वाबी अजब तरह के तसादुम थे आशनाई में भी मैं दस बरस से किसी ख़्वाब के अज़ाब में हूँ वही अज़ाब दर आया है इस दहाई में भी तसादुम-ए-दिल-ओ-दुनिया में दिल की हार के बा'द हिजाब आने लगा है ग़ज़ल-सराई में भी मैं जा रहा हूँ अब उस की तरफ़ उसी की तरफ़ जो मेरे साथ था मेरी शिकस्ता-पाई में भी
Iftikhar Arif
0 likes
कोई तो फूल खिलाए दुआ के लहजे में अजब तरह की घुटन है हवा के लहजे में ये वक़्त किस की र'ऊनत पे ख़ाक डाल गया ये कौन बोल रहा था ख़ुदा के लहजे में न जाने ख़ल्क़-ए-ख़ुदा कौन से अज़ाब में है हवाएँ चीख़ पड़ीं इल्तिजा के लहजे में खुला फ़रेब-ए-मोहब्बत दिखाई देता है अजब कमाल है उस बे-वफ़ा के लहजे में यही है मस्लहत-ए-जब्र-ए-एहतियात तो फिर हम अपना हाल कहेंगे छुपा के लहजे में
Iftikhar Arif
1 likes
ये बस्ती जानी-पहचानी बहुत है यहाँ वा'दों की अर्ज़ानी बहुत है शगुफ़्ता लफ़्ज़ लिक्खे जा रहे हैं मगर लहजों में वीरानी बहुत है सुबुक-ज़र्फ़ों के क़ाबू में नहीं लफ़्ज़ मगर शौक़-ए-गुल-अफ़्शानी बहुत है है बाज़ारों में पानी सर से ऊँचा मिरे घर में भी तुग़्यानी बहुत है न जाने कब मिरे सहरा में आए वो इक दरिया कि तूफ़ानी बहुत है न जाने कब मिरे आँगन में बरसे वो इक बादल कि नुक़सानी बहुत है
Iftikhar Arif
0 likes
कहाँ के नाम ओ नसब इल्म क्या फ़ज़ीलत क्या जहान-ए-रिज़्क़ में तौक़ीर-ए-अहल-ए-हाजत क्या शिकम की आग लिए फिर रही है शहर-ब-शहर सग-ए-ज़माना हैं हम क्या हमारी हिजरत क्या दिमश्क़-ए-मस्लहत ओ कूफ़ा-ए-निफ़ाक़ के बीच फ़ुग़ान-ए-क़ाफ़िला-ए-बे-नवा की क़ीमत क्या मआल-ए-इज़्ज़त-ए-सादात-ए-इश्क़ देख के हम बदल गए तो बदलने पे इतनी हैरत क्या क़िमार-ख़ाना-ए-हस्ती में एक बाज़ी पर तमाम उम्र लगा दी तो फिर शिकायत क्या फ़रोग़-ए-सनअत-ए-क़द-आवरी का मौसम है सुबुक हुए पे भी निकला है क़द्द-ओ-क़ामत क्या
Iftikhar Arif
0 likes
अज़ाब ये भी किसी और पर नहीं आया कि एक उम्र चले और घर नहीं आया उस एक ख़्वाब की हसरत में जल बुझीं आँखें वो एक ख़्वाब कि अब तक नज़र नहीं आया करें तो किस से करें ना-रसाइयों का गिला सफ़र तमाम हुआ हम-सफ़र नहीं आया दिलों की बात बदन की ज़बाँ से कह देते ये चाहते थे मगर दिल इधर नहीं आया अजीब ही था मिरे दौर-ए-गुमरही का रफ़ीक़ बिछड़ गया तो कभी लौट कर नहीं आया हरीम-ए-लफ़्ज़-ओ-मआनी से निस्बतें भी रहीं मगर सलीक़ा-ए-अर्ज़-ए-हुनर नहीं आया
Iftikhar Arif
2 likes
Similar Writers
Our suggestions based on Iftikhar Arif.
Similar Moods
More moods that pair well with Iftikhar Arif's ghazal.







