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dharti par sab dard ke maare kis ke hain asman par chand sitare kis ke hain sunte hain vo shakhs to ghar hi badal gaya phir ye dil-avez ishare kis ke hain kis sahra ki dhuul hai sab ki ankhon men be-mauj o be-rud kinare kis ke hain ab kya sochna aisi-vaisi baton pe un hathon ne baal sanvare kis ke hain kaun hai is rim-jhim ke pichhe chhupa hua ye aansu saare ke saare kis ke hain kisi pahad ki choti par chadh kar dekho ankhon se ojhal nazzare kis ke hain dharti par sab dard ke mare kis ke hain aasman par chand sitare kis ke hain sunte hain wo shakhs to ghar hi badal gaya phir ye dil-awez ishaare kis ke hain kis sahra ki dhul hai sab ki aankhon mein be-mauj o be-rud kinare kis ke hain ab kya sochna aisi-waisi baaton pe un hathon ne baal sanware kis ke hain kaun hai is rim-jhim ke pichhe chhupa hua ye aansu sare ke sare kis ke hain kisi pahad ki choti par chadh kar dekho aankhon se ojhal nazzare kis ke hain

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वो बे-वफ़ा है तो क्या मत कहो बुरा उस को कि जो हुआ सो हुआ ख़ुश रखे ख़ुदा उस को नज़र न आए तो उस की तलाश में रहना कहीं मिले तो पलट कर न देखना उस को वो सादा-ख़ू था ज़माने के ख़म समझता क्या हवा के साथ चला ले उड़ी हवा उस को वो अपने बारे में कितना है ख़ुश-गुमाँ देखो जब उस को मैं भी न देखूँ तो देखना उस को अभी से जाना भी क्या उस की कम-ख़याली पर अभी तो और बहुत होगा सोचना उस को उसे ये धुन कि मुझे कम से कम उदास रखे मिरी दु'आ कि ख़ुदा दे ये हौसला उस को पनाह ढूँढ़ रही है शब-ए-गिरफ़्ता-दिलाँ कोई बताओ मिरे घर का रास्ता उस को ग़ज़ल में तज़्किरा उस का न कर 'नसीर' कि अब भुला चुका वो तुझे तू भी भूल जा उस को

Naseer Turabi

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कैसे उस ने ये सब कुछ मुझ सेे छुप कर बदला चेहरा बदला रस्ता बदला बा'द में घर बदला मैं उस के बारे में ये कहता था लोगों से मेरा नाम बदल देना वो शख़्स अगर बदला वो भी ख़ुश था उस ने दिल देकर दिल माँगा है मैं भी ख़ुश हूँ मैं ने पत्थर से पत्थर बदला मैं ने कहा क्या मेरी ख़ातिर ख़ुद को बदलोगे और फिर उस ने नज़रें बदलीं और नंबर बदला

Tehzeeb Hafi

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अब के हम बिछड़े तो शायद कभी ख़्वाबों में मिलें जिस तरह सूखे हुए फूल किताबों में मिलें ढूँढ़ उजड़े हुए लोगों में वफ़ा के मोती ये ख़ज़ाने तुझे मुमकिन है ख़राबों में मिलें ग़म-ए-दुनिया भी ग़म-ए-यार में शामिल कर लो नशा बढ़ता है शराबें जो शराबों में मिलें तू ख़ुदा है न मिरा इश्क़ फ़रिश्तों जैसा दोनों इंसाँ हैं तो क्यूँँ इतने हिजाबों में मिलें आज हम दार पे खींचे गए जिन बातों पर क्या अजब कल वो ज़माने को निसाबों में मिलें अब न वो मैं न वो तू है न वो माज़ी है 'फ़राज़' जैसे दो शख़्स तमन्ना के सराबों में मिलें

Ahmad Faraz

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उसूलों पर जहाँ आँच आए टकराना ज़रूरी है जो ज़िंदा हो तो फिर ज़िंदा नज़र आना ज़रूरी है नई 'उम्रों की ख़ुदमुख़्तारियों को कौन समझाये कहाँ से बच के चलना है कहाँ जाना ज़रूरी है थके हारे परिंदे जब बसेरे के लिए लौटें सलीक़ामन्द शाख़ों का लचक जाना ज़रूरी है बहुत बेबाक आँखों में तअल्लुक़ टिक नहीं पाता मुहब्बत में कशिश रखने को शर्माना ज़रूरी है सलीक़ा ही नहीं शायद उसे महसूस करने का जो कहता है ख़ुदा है तो नज़र आना ज़रूरी है मेरे होंठों पे अपनी प्यास रख दो और फिर सोचो कि इस के बा'द भी दुनिया में कुछ पाना ज़रूरी है

Waseem Barelvi

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ये मैं ने कब कहा कि मेरे हक़ में फ़ैसला करे अगर वो मुझ से ख़ुश नहीं है तो मुझे जुदा करे मैं उस के साथ जिस तरह गुज़ारता हूँ ज़िंदगी उसे तो चाहिए कि मेरा शुक्रिया अदा करे मेरी दुआ है और इक तरह से बद-दुआ भी है ख़ुदा तुम्हें तुम्हारे जैसी बेटियाँ अता करे बना चुका हूँ मैं मोहब्बतों के दर्द की दवा अगर किसी को चाहिए तो मुझ सेे राब्ता करे

Tehzeeb Hafi

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'जमाल' अब तो यही रह गया पता उस का भली सी शक्ल थी अच्छा सा नाम था उस का फिर एक साया दर-ओ-बाम पर उतर आया दिल-ओ-निगाह में फिर ज़िक्र छिड़ गया उस का किसे ख़बर थी कि ये दिन भी देखना होगा अब ए'तिबार भी दिल को नहीं रहा उस का जो मेरे ज़िक्र पर अब क़हक़हे लगाता है बिछड़ते वक़्त कोई हाल देखता उस का मुझे तबाह किया और सब की नज़रों में वो बे-क़ुसूर रहा ये कमाल था उस का सो किस से कीजिए ज़िक्र-नज़ाकत-ए-ख़द-ओ-ख़ाल कोई मिला ही नहीं सूरत-आश्ना उस का जो साया साया शब-ओ-रोज़ मेरे साथ रहा गली गली में पता पूछता फिरा उस का 'जमाल' उस ने तो ठानी थी उम्र-भर के लिए ये चार रोज़ में क्या हाल हो गया उस का

Jamal Ehsani

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वो लोग मेरे बहुत प्यार करने वाले थे गुज़र गए हैं जो मौसम गुज़रने वाले थे नई रुतों में दुखों के भी सिलसिले हैं नए वो ज़ख़्म ताज़ा हुए हैं जो भरने वाले थे ये किस मक़ाम पे सूझी तुझे बिछड़ने की कि अब तो जा के कहीं दिन सँवरने वाले थे हज़ार मुझ से वो पैमान-ए-वस्ल करता रहा पर उस के तौर-तरीक़े मुकरने वाले थे तुम्हें तो फ़ख़्र था शीराज़ा-बंदी-ए-जाँ पर हमारा क्या है कि हम तो बिखरने वाले थे तमाम रात नहाएा था शहर बारिश में वो रंग उतर ही गए जो उतरने वाले थे उस एक छोटे से क़स्बे पे रेल ठहरी नहीं वहाँ भी चंद मुसाफ़िर उतरने वाले थे

Jamal Ehsani

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