dil-e-nadan tujhe hua kya hai akhir is dard ki dava kya hai foolish heart what ails you pray? can antidotes this ache allay? ham hain mushtaq aur vo be-zar ya ilahi ye majra kya hai i'm ardent and she turns away lord! what is this game you play? main bhi munh men zaban rakhta huun kaash puchho ki muddaa kya hai i too am capable of speech just ask me what i want today jab ki tujh bin nahin koi maujud phir ye hangama ai khuda kya hai when but for you, naught else exists why then o lord this noisy fray? ye pari-chehra log kaise hain ghhamza o ishva o ada kya hai ... ... shikan-e-zulf-e-ambarin kyuun hai nigah-e-chashm-e-surma sa kya hai ... ... sabza o gul kahan se aae hain abr kya chiiz hai hava kya hai ... ... ham ko un se vafa ki hai ummid jo nahin jante vafa kya hai from her i hope for constancy who knows it not, to my dismay haan bhala kar tira bhala hoga aur darvesh ki sada kya hai good you do and goodness reap what else does the dervish say jaan tum par nisar karta huun main nahin janta dua kya hai to you i do bequeath my life i know not what it is to pray main ne maana ki kuchh nahin 'ghhalib' muft haath aae to bura kya hai ghalib's worthless i accept but if comes free then why delay? dil-e-nadan tujhe hua kya hai aakhir is dard ki dawa kya hai foolish heart what ails you pray? can antidotes this ache allay? hum hain mushtaq aur wo be-zar ya ilahi ye majra kya hai i'm ardent and she turns away lord! what is this game you play? main bhi munh mein zaban rakhta hun kash puchho ki muddaa kya hai i too am capable of speech just ask me what i want today jab ki tujh bin nahin koi maujud phir ye hangama ai khuda kya hai when but for you, naught else exists why then o lord this noisy fray? ye pari-chehra log kaise hain ghamza o ishwa o ada kya hai ... ... shikan-e-zulf-e-ambarin kyun hai nigah-e-chashm-e-surma sa kya hai ... ... sabza o gul kahan se aae hain abr kya chiz hai hawa kya hai ... ... hum ko un se wafa ki hai ummid jo nahin jaante wafa kya hai from her i hope for constancy who knows it not, to my dismay han bhala kar tera bhala hoga aur darwesh ki sada kya hai good you do and goodness reap what else does the dervish say jaan tum par nisar karta hun main nahin jaanta dua kya hai to you i do bequeath my life i know not what it is to pray main ne mana ki kuchh nahin 'ghaalib' muft hath aae to bura kya hai ghalib's worthless i accept but if comes free then why delay?
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यही अपनी कहानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले वो लड़की जाँ हमारी थी, मियाँ पहले बहुत पहले वहम मुझ को ये भाता है,अभी मेरी दिवानी है मगर मेरी दिवानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले रक़ीब आ कर बताते हैं यहाँ तिल है, वहाँ तिल है हमें ये जानकारी थी मियाँ पहले, बहुत पहले अदब से माँग कर माफ़ी भरी महफ़िल ये कहता हूँ वो लड़की ख़ानदानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले
Anand Raj Singh
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उसी जगह पर जहाँ कई रास्ते मिलेंगे पलट के आए तो सब सेे पहले तुझे मिलेंगे अगर कभी तेरे नाम पर जंग हो गई तो हम ऐसे बुज़दिल भी पहली सफ़ में खड़े मिलेंगे तुझे ये सड़कें मेरे तवस्सुत से जानती हैं तुझे हमेशा ये सब इशारे खुले मिलेंगे
Tehzeeb Hafi
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क्यूँँ डरें ज़िन्दगी में क्या होगा कुछ न होगा तो तजरबा होगा हँसती आँखों में झाँक कर देखो कोई आँसू कहीं छुपा होगा इन दिनों ना-उमीद सा हूँ मैं शायद उस ने भी ये सुना होगा देख कर तुम को सोचता हूँ मैं क्या किसी ने तुम्हें छुआ होगा
Javed Akhtar
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चाँद सितारे फूल परिंदे शाम सवेरा एक तरफ़ सारी दुनिया उस का चर्बा उस का चेहरा एक तरफ़ वो लड़कर भी सो जाए तो उस का माथा चूमूँ मैं उस सेे मुहब्बत एक तरफ़ है उस सेे झगड़ा एक तरफ़ जिस शय पर वो उँगली रख दे उस को वो दिलवानी है उस की ख़ुशियाँ सब से अव्वल सस्ता महँगा एक तरफ़ ज़ख़्मों पर मरहम लगवाओ लेकिन उस के हाथों से चारासाज़ी एक तरफ़ है उस का छूना एक तरफ़ सारी दुनिया जो भी बोले सब कुछ शोर शराबा है सब का कहना एक तरफ़ है उस का कहना एक तरफ़ उस ने सारी दुनिया माँगी मैं ने उस को माँगा है उस के सपने एक तरफ़ है मेरा सपना एक तरफ़
Varun Anand
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ये ग़म क्या दिल की आदत है नहीं तो किसी से कुछ शिकायत है नहीं तो है वो इक ख़्वाब-ए-बे-ताबीर उस को भुला देने की निय्यत है नहीं तो किसी के बिन किसी की याद के बिन जिए जाने की हिम्मत है नहीं तो किसी सूरत भी दिल लगता नहीं हाँ तो कुछ दिन से ये हालत है नहीं तो तेरे इस हाल पर है सब को हैरत तुझे भी इस पे हैरत है नहीं तो हम-आहंगी नहीं दुनिया से तेरी तुझे इस पर नदामत है नहीं तो हुआ जो कुछ यही मक़्सूम था क्या यही सारी हिकायत है नहीं तो अज़िय्यत-नाक उम्मीदों से तुझ को अमाँ पाने की हसरत है नहीं तो तू रहता है ख़याल-ओ-ख़्वाब में गुम तो इस की वज्ह फ़ुर्सत है नहीं तो सबब जो इस जुदाई का बना है वो मुझ सेे ख़ूब-सूरत है नहीं तो
Jaun Elia
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रौंदी हुई है कौकबा-ए-शहरयार की इतराए क्यूँँ न ख़ाक सर-ए-रहगुज़ार की जब उस के देखने के लिए आएँ बादशाह लोगों में क्यूँँ नुमूद न हो लाला-ज़ार की भूके नहीं हैं सैर-ए-गुलिस्ताँ के हम वले क्यूँँकर न खाइए कि हवा है बहार की
Mirza Ghalib
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हरीफ़-ए-मतलब-ए-मुश्किल नहीं फ़ुसून-ए-नियाज़ दुआ क़ुबूल हो या रब कि उम्र-ए-ख़िज़्र दराज़ न हो ब-हर्ज़ा बयाबाँ-नवर्द-ए-वहम-ए-वजूद हनूज़ तेरे तसव्वुर में है नशेब-ओ-फ़राज़ विसाल जल्वा तमाशा है पर दिमाग़ कहाँ कि दीजे आइना-ए-इन्तिज़ार को पर्दाज़ हर एक ज़र्रा-ए-आशिक़ है आफ़ताब-परस्त गई न ख़ाक हुए पर हवा-ए-जल्वा-ए-नाज़ न पूछ वुसअत-ए-मय-ख़ाना-ए-जुनूँ 'ग़ालिब' जहाँ ये कासा-ए-गर्दूं है एक ख़ाक-अंदाज़ फ़रेब-ए-सनअत-ए-ईजाद का तमाशा देख निगाह अक्स-फ़रोश ओ ख़याल आइना-साज़ ज़ि-बस-कि जल्वा-ए-सय्याद हैरत-आरा है उड़ी है सफ़्हा-ए-ख़ातिर से सूरत-ए-परवाज़ हुजूम-ए-फ़िक्र से दिल मिस्ल-ए-मौज लरज़े है कि शीशा नाज़ुक ओ सहबा-ए-आबगीन-गुदाज़ 'असद' से तर्क-ए-वफ़ा का गुमाँ वो मा'नी है कि खींचिए पर-ए-ताइर से सूरत-ए-परवाज़ हनूज़ ऐ असर-ए-दीद नंग-ए-रुस्वाई निगाह फ़ित्ना-ख़िराम ओ दर-ए-दो-आलम बाज़
Mirza Ghalib
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जिस बज़्म में तू नाज़ से गुफ़्तार में आवे जाँ कालबद-ए-सूरत-ए-दीवार में आवे साए की तरह साथ फिरें सर्व ओ सनोबर तू इस क़द-ए-दिलकश से जो गुलज़ार में आवे तब नाज़-ए-गिराँ माइगी-ए-अश्क बजा है जब लख़्त-ए-जिगर दीदा-ए-ख़ूँ-बार में आवे दे मुझ को शिकायत की इजाज़त कि सितमगर कुछ तुझ को मज़ा भी मिरे आज़ार में आवे उस चश्म-ए-फ़ुसूँ-गर का अगर पाए इशारा तूती की तरह आइना गुफ़्तार में आवे काँटों की ज़बाँ सूख गई प्यास से या रब इक आबला-पा वादी-ए-पुर-ख़ार में आवे मर जाऊँ न क्यूँँ रश्क से जब वो तन-ए-नाज़ुक आग़ोश-ए-ख़म-ए-हल्क़ा-ए-ज़ुन्नार में आवे ग़ारत-गर-ए-नामूस न हो गर हवस-ए-ज़र क्यूँँ शाहिद-ए-गुल बाग़ से बाज़ार में आवे तब चाक-ए-गरेबाँ का मज़ा है दिल-ए-नालाँ जब इक नफ़स उलझा हुआ हर तार में आवे आतिश-कदा है सीना मिरा राज़-ए-निहाँ से ऐ वाए अगर मा'रिज़-ए-इज़हार में आवे गंजीना-ए-मअ'नी का तिलिस्म उस को समझिए जो लफ़्ज़ कि 'ग़ालिब' मिरे अश'आर में आवे
Mirza Ghalib
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हुस्न-ए-मह गरचे ब-हंगाम-ए-कमाल अच्छा है उस से मेरा मह-ए-ख़ुर्शीद-जमाल अच्छा है बोसा देते नहीं और दिल पे है हर लहजा निगाह जी में कहते हैं कि मुफ़्त आए तो माल अच्छा है और बाज़ार से ले आए अगर टूट गया साग़र-ए-जम से मिरा जाम-ए-सिफ़ाल अच्छा है बे-तलब दें तो मज़ा उस में सिवा मिलता है वो गदा जिस को न हो ख़ू-ए-सवाल अच्छा है उन के देखे से जो आ जाती है मुँह पर रौनक़ वो समझते हैं कि बीमार का हाल अच्छा है देखिए पाते हैं उश्शाक़ बुतों से क्या फ़ैज़ इक बरहमन ने कहा है कि ये साल अच्छा है हम-सुख़न तेशा ने फ़रहाद को शीरीं से किया जिस तरह का कि किसी में हो कमाल अच्छा है क़तरा दरिया में जो मिल जाए तो दरिया हो जाए काम अच्छा है वो जिस का कि मआल अच्छा है ख़िज़्र-सुल्ताँ को रखे ख़ालिक़-ए-अकबर सरसब्ज़ शाह के बाग़ में ये ताज़ा निहाल अच्छा है हम को मालूम है जन्नत की हक़ीक़त लेकिन दिल के ख़ुश रखने को 'ग़ालिब' ये ख़याल अच्छा है
Mirza Ghalib
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वो मिरी चीन-ए-जबीं से ग़म-ए-पिन्हाँ समझा राज़-ए-मक्तूब ब-बे-रब्ती-ए-उनवाँ समझा यक अलिफ़ बेश नहीं सैक़ल-ए-आईना हनूज़ चाक करता हूँ मैं जब से कि गरेबाँ समझा शरह-ए-असबाब-ए-गिरफ़्तारी-ए-ख़ातिर मत पूछ इस क़दर तंग हुआ दिल कि मैं ज़िंदाँ समझा बद-गुमानी ने न चाहा उसे सरगर्म-ए-ख़िराम रुख़ पे हर क़तरा अरक़ दीदा-ए-हैराँ समझा इज्ज़ से अपने ये जाना कि वो बद-ख़ू होगा नब्ज़-ए-ख़स से तपिश-ए-शोला-ए-सोज़ाँ समझा सफ़र-ए-इश्क़ में की ज़ोफ़ ने राहत-तलबी हर क़दम साए को मैं अपने शबिस्ताँ समझा था गुरेज़ाँ मिज़ा-ए-यार से दिल ता दम-ए-मर्ग दफ़-ए-पैकान-ए-क़ज़ा इस क़दर आसाँ समझा दिल दिया जान के क्यूँँ उस को वफ़ादार 'असद' ग़लती की कि जो काफ़िर को मुसलमाँ समझा हम ने वहशत-कदा-ए-बज़्म-ए-जहाँ में जूँ शम्अ'' शो'ला-ए-इश्क़ को अपना सर-ओ-सामाँ समझा
Mirza Ghalib
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