दिल मिरा सोज़-ए-निहाँ से बे-मुहाबा जल गया आतिश-ए-ख़ामोश की मानिंद गोया जल गया दिल में ज़ौक़-ए-वस्ल ओ याद-ए-यार तक बाक़ी नहीं आग इस घर में लगी ऐसी कि जो था जल गया मैं अदम से भी परे हूँ वर्ना ग़ाफ़िल बार-हा मेरी आह-ए-आतिशीं से बाल-ए-अन्क़ा जल गया अर्ज़ कीजे जौहर-ए-अंदेशा की गर्मी कहाँ कुछ ख़याल आया था वहशत का कि सहरा जल गया दिल नहीं तुझ को दिखाता वर्ना दाग़ों की बहार इस चराग़ाँ का करूँँ क्या कार-फ़रमा जल गया मैं हूँ और अफ़्सुर्दगी की आरज़ू 'ग़ालिब' कि दिल देख कर तर्ज़-ए-तपाक-ए-अहल-ए-दुनिया जल गया ख़ानमान-ए-आशिक़ाँ दुकान-ए-आतिश-बाज़ है शो'ला-रू जब हो गए गर्म-ए-तमाशा जल गया ता कुजा अफ़सोस-ए-गरमी-हा-ए-सोहबत ऐ ख़याल दिल बा-सोज़-ए-आतिश-ए-दाग़-ए-तमन्ना जल गया है 'असद' बेगाना-ए-अफ़्सुर्दगी ऐ बेकसी दिल ज़-अंदाज़-ए-तपाक-ए-अहल-ए-दुनिया जल गया दूद मेरा सुंबुलिस्ताँ से करे है हम-सरी बस-कि शौक़-ए-आतिश-गुल से सरापा जल गया शम्अ-रूयाँ की सर-अंगुश्त-ए-हिनाई देख कर ग़ुंचा-ए-गुल पर-फ़िशाँ परवाना-आसा जल गया
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उसी जगह पर जहाँ कई रास्ते मिलेंगे पलट के आए तो सब सेे पहले तुझे मिलेंगे अगर कभी तेरे नाम पर जंग हो गई तो हम ऐसे बुज़दिल भी पहली सफ़ में खड़े मिलेंगे तुझे ये सड़कें मेरे तवस्सुत से जानती हैं तुझे हमेशा ये सब इशारे खुले मिलेंगे
Tehzeeb Hafi
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चाँद सितारे फूल परिंदे शाम सवेरा एक तरफ़ सारी दुनिया उस का चर्बा उस का चेहरा एक तरफ़ वो लड़कर भी सो जाए तो उस का माथा चूमूँ मैं उस सेे मुहब्बत एक तरफ़ है उस सेे झगड़ा एक तरफ़ जिस शय पर वो उँगली रख दे उस को वो दिलवानी है उस की ख़ुशियाँ सब से अव्वल सस्ता महँगा एक तरफ़ ज़ख़्मों पर मरहम लगवाओ लेकिन उस के हाथों से चारासाज़ी एक तरफ़ है उस का छूना एक तरफ़ सारी दुनिया जो भी बोले सब कुछ शोर शराबा है सब का कहना एक तरफ़ है उस का कहना एक तरफ़ उस ने सारी दुनिया माँगी मैं ने उस को माँगा है उस के सपने एक तरफ़ है मेरा सपना एक तरफ़
Varun Anand
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ये ग़म क्या दिल की आदत है नहीं तो किसी से कुछ शिकायत है नहीं तो है वो इक ख़्वाब-ए-बे-ताबीर उस को भुला देने की निय्यत है नहीं तो किसी के बिन किसी की याद के बिन जिए जाने की हिम्मत है नहीं तो किसी सूरत भी दिल लगता नहीं हाँ तो कुछ दिन से ये हालत है नहीं तो तेरे इस हाल पर है सब को हैरत तुझे भी इस पे हैरत है नहीं तो हम-आहंगी नहीं दुनिया से तेरी तुझे इस पर नदामत है नहीं तो हुआ जो कुछ यही मक़्सूम था क्या यही सारी हिकायत है नहीं तो अज़िय्यत-नाक उम्मीदों से तुझ को अमाँ पाने की हसरत है नहीं तो तू रहता है ख़याल-ओ-ख़्वाब में गुम तो इस की वज्ह फ़ुर्सत है नहीं तो सबब जो इस जुदाई का बना है वो मुझ सेे ख़ूब-सूरत है नहीं तो
Jaun Elia
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कैसे उस ने ये सब कुछ मुझ सेे छुप कर बदला चेहरा बदला रस्ता बदला बा'द में घर बदला मैं उस के बारे में ये कहता था लोगों से मेरा नाम बदल देना वो शख़्स अगर बदला वो भी ख़ुश था उस ने दिल देकर दिल माँगा है मैं भी ख़ुश हूँ मैं ने पत्थर से पत्थर बदला मैं ने कहा क्या मेरी ख़ातिर ख़ुद को बदलोगे और फिर उस ने नज़रें बदलीं और नंबर बदला
Tehzeeb Hafi
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वो बे-वफ़ा है तो क्या मत कहो बुरा उस को कि जो हुआ सो हुआ ख़ुश रखे ख़ुदा उस को नज़र न आए तो उस की तलाश में रहना कहीं मिले तो पलट कर न देखना उस को वो सादा-ख़ू था ज़माने के ख़म समझता क्या हवा के साथ चला ले उड़ी हवा उस को वो अपने बारे में कितना है ख़ुश-गुमाँ देखो जब उस को मैं भी न देखूँ तो देखना उस को अभी से जाना भी क्या उस की कम-ख़याली पर अभी तो और बहुत होगा सोचना उस को उसे ये धुन कि मुझे कम से कम उदास रखे मिरी दु'आ कि ख़ुदा दे ये हौसला उस को पनाह ढूँढ़ रही है शब-ए-गिरफ़्ता-दिलाँ कोई बताओ मिरे घर का रास्ता उस को ग़ज़ल में तज़्किरा उस का न कर 'नसीर' कि अब भुला चुका वो तुझे तू भी भूल जा उस को
Naseer Turabi
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तुम अपने शिकवे की बातें न खोद खोद के पूछो हज़र करो मिरे दिल से कि इस में आग दबी है दिला ये दर्द-ओ-अलम भी तो मुग़्तनिम है कि आख़िर न गिर्या-ए-सहरी है न आह-ए-नीम-शबी है नज़र ब-नक़्स-ए-गदायाँ कमाल-ए-बे-अदबी है कि ख़ार-ए-ख़ुश्क को भी दावा-ए-चमन-नसबी है हुआ विसाल से शौक़-ए-दिल-ए-हरीस ज़ियादा लब-ए-क़दह पे कफ़-ए-बादा जोश-ए-तिश्ना-लबी है ख़ुशा वो दिल कि सरापा तिलिस्म-ए-बे-ख़बरी हो जुनून ओ यास ओ अलम रिज़्क़-ए-मुद्दआ-तलबी है चमन में किस के ये बरहम हुई है बज़्म-ए-तमाशा कि बर्ग बर्ग-ए-समन शीशा रेज़ा-ए-हलबी है इमाम-ए-ज़ाहिर-ओ-बातिन अमीर-ए-सूरत-ओ-मअनी 'अली' वली असदुल्लाह जानशीन-ए-नबी है
Mirza Ghalib
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हुस्न-ए-मह गरचे ब-हंगाम-ए-कमाल अच्छा है उस से मेरा मह-ए-ख़ुर्शीद-जमाल अच्छा है बोसा देते नहीं और दिल पे है हर लहजा निगाह जी में कहते हैं कि मुफ़्त आए तो माल अच्छा है और बाज़ार से ले आए अगर टूट गया साग़र-ए-जम से मिरा जाम-ए-सिफ़ाल अच्छा है बे-तलब दें तो मज़ा उस में सिवा मिलता है वो गदा जिस को न हो ख़ू-ए-सवाल अच्छा है उन के देखे से जो आ जाती है मुँह पर रौनक़ वो समझते हैं कि बीमार का हाल अच्छा है देखिए पाते हैं उश्शाक़ बुतों से क्या फ़ैज़ इक बरहमन ने कहा है कि ये साल अच्छा है हम-सुख़न तेशा ने फ़रहाद को शीरीं से किया जिस तरह का कि किसी में हो कमाल अच्छा है क़तरा दरिया में जो मिल जाए तो दरिया हो जाए काम अच्छा है वो जिस का कि मआल अच्छा है ख़िज़्र-सुल्ताँ को रखे ख़ालिक़-ए-अकबर सरसब्ज़ शाह के बाग़ में ये ताज़ा निहाल अच्छा है हम को मालूम है जन्नत की हक़ीक़त लेकिन दिल के ख़ुश रखने को 'ग़ालिब' ये ख़याल अच्छा है
Mirza Ghalib
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कोह के हों बार-ए-ख़ातिर गर सदा हो जाइए बे-तकल्लुफ़ ऐ शरार-ए-जस्ता क्या हो जाइए बैज़ा-आसा नंग-ए-बाल-ओ-पर है ये कुंज-ए-क़फ़स अज़-सर-ए-नौ ज़िंदगी हो गर रिहा हो जाइए वुसअत-ए-मशरब नियाज़-ए-कुल्फ़त-ए-वहशत 'असद' यक-बयाबाँ साया-ए-बाल-ए-हुमा हो जाइए
Mirza Ghalib
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दिल लगा कर लग गया उन को भी तन्हा बैठना बारे अपनी बेकसी की हम ने पाई दाद याँ हैं ज़वाल-आमादा अज्ज़ा आफ़रीनश के तमाम महर-ए-गर्दूं है चराग़-ए-रहगुज़ार-ए-बाद याँ है तरह्हुम-आफ़रीं आराइश-ए-बे-दाद याँ अश्क-ए-चश्म-ए-दाम है हर दाना-ए-सय्याद याँ है गुदाज़-ए-मोम अंदाज़-ए-चकीदन-हा-ए-ख़ूँ नीश-ए-ज़ंबूर-ए-असल है नश्तर-ए-फ़स्साद याँ ना-गवारा है हमें एहसान-ए-साहब-दाैलताँ है ज़र-ए-गुल भी नज़र में जौहर-ए-फ़ौलाद याँ जुम्बिश-ए-दिल से हुए हैं उक़्दा-हा-ए-कार वा कम-तरीं मज़दूर-ए-संगीं-दस्त है फ़रहाद याँ क़तरा-हा-ए-ख़ून-ए-बिस्मिल ज़ेब-ए-दामाँ हैं 'असद' है तमाशा करदनी गुल-चीनी-ए-जल्लाद याँ
Mirza Ghalib
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ग़म नहीं होता है आज़ादों को बेश अज़-यक-नफ़स बर्क़ से करते हैं रौशन शम्-ए-मातम-ख़ाना हम महफ़िलें बरहम करे है गंजिंफ़ा-बाज़-ए-ख़याल हैं वरक़-गर्दानी-ए-नैरंग-ए-यक-बुत-ख़ाना हम बावजूद-ए-यक-जहाँ हंगामा पैदाई नहीं हैं चराग़ान-ए-शबिस्तान-ए-दिल-ए-परवाना हम ज़ोफ़ से है ने क़नाअ'त से ये तर्क-ए-जुस्तुजू हैं वबाल-ए-तकिया-गाह-ए-हिम्मत-ए-मर्दाना हम दाइम-उल-हब्स इस में हैं लाखों तमन्नाएँ 'असद' जानते हैं सीना-ए-पुर-ख़ूँ को ज़िंदाँ-ख़ाना हम बस-कि हैं बद-मस्त-ए-ब-शिकन ब-शिकन-ए-मय-ख़ाना हम मू-ए-शीशा को समझते हैं ख़त-ए-पैमाना हम बस-कि हर-यक-मू-ए-ज़ुल्फ़-अफ़्शाँ से है तार-ए-शुआअ' पंजा-ए-ख़ुर्शीद को समझे हैं दस्त-ए-शाना हम मश्क़-ए-अज़-ख़ुद-रफ़्तगी से हैं ब-गुलज़ार-ए-ख़याल आश्ना ताबीर-ए-ख़्वाब-ए-सब्ज़ा-ए-बेगाना हम फ़र्त-ए-बे-ख़्वाबी से हैं शब-हा-ए-हिज्र-ए-यार में जूँ ज़बान-ए-शम्अ' दाग़-ए-गर्मी-ए-अफ़्साना हम शाम-ए-ग़म में सोज़-ए-इश्क़-ए-आतिश-ए-रुख़्सार से पुर-फ़शान-ए-सोख़्तन हैं सूरत-ए-परवाना हम हसरत-ए-अर्ज़-ए-तमन्ना याँ से समझा चाहिए दो-जहाँ हश्र-ए-ज़बान-ए-ख़ुश्क हैं जूँ शाना हम कश्ती-ए-आलम ब-तूफ़ान-ए-तग़ाफ़ुल दे कि हैं आलम-ए-आब-ए-गुदाज़-ए-जौहर-ए-अफ़्साना हम वहशत-ए-बे-रब्ती-ए-पेच-ओ-ख़म-ए-हस्ती न पूछ नंग-ए-बालीदन हैं जूँ मू-ए-सर-ए-दीवाना हम
Mirza Ghalib
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