तुम अपने शिकवे की बातें न खोद खोद के पूछो हज़र करो मिरे दिल से कि इस में आग दबी है दिला ये दर्द-ओ-अलम भी तो मुग़्तनिम है कि आख़िर न गिर्या-ए-सहरी है न आह-ए-नीम-शबी है नज़र ब-नक़्स-ए-गदायाँ कमाल-ए-बे-अदबी है कि ख़ार-ए-ख़ुश्क को भी दावा-ए-चमन-नसबी है हुआ विसाल से शौक़-ए-दिल-ए-हरीस ज़ियादा लब-ए-क़दह पे कफ़-ए-बादा जोश-ए-तिश्ना-लबी है ख़ुशा वो दिल कि सरापा तिलिस्म-ए-बे-ख़बरी हो जुनून ओ यास ओ अलम रिज़्क़-ए-मुद्दआ-तलबी है चमन में किस के ये बरहम हुई है बज़्म-ए-तमाशा कि बर्ग बर्ग-ए-समन शीशा रेज़ा-ए-हलबी है इमाम-ए-ज़ाहिर-ओ-बातिन अमीर-ए-सूरत-ओ-मअनी 'अली' वली असदुल्लाह जानशीन-ए-नबी है
Related Ghazal
चला है सिलसिला कैसा ये रातों को मनाने का तुम्हें हक़ दे दिया किस ने दियों के दिल दुखाने का इरादा छोड़िए अपनी हदों से दूर जाने का ज़माना है ज़माने की निगाहों में न आने का कहाँ की दोस्ती किन दोस्तों की बात करते हो मियाँ दुश्मन नहीं मिलता कोई अब तो ठिकाने का निगाहों में कोई भी दूसरा चेहरा नहीं आया भरोसा ही कुछ ऐसा था तुम्हारे लौट आने का ये मैं ही था बचा के ख़ुद को ले आया किनारे तक समुंदर ने बहुत मौक़ा' दिया था डूब जाने का
Waseem Barelvi
103 likes
आँख को आइना समझते हो तुम भी सबकी तरह समझते हो दोस्त अब क्यूँ नहीं समझते तुम तुम तो कहते थे ना समझते हो अपना ग़म तुम को कैसे समझाऊँ सब सेे हारा हुआ समझते हो मेरी दुनिया उजड़ गई इस में तुम इसे हादसा समझते हो आख़िरी रास्ता तो बाक़ी है आख़िरी रास्ता समझते हो
Himanshi babra KATIB
76 likes
तुम्हें बस ये बताना चाहता हूँ मैं तुम से क्या छुपाना चाहता हूँ कभी मुझ से भी कोई झूठ बोलो मैं हाँ में हाँ मिलाना चाहता हूँ ये जो खिड़की है नक़्शे में तुम्हारे यहाँ मैं दर बनाना चाहता हूँ अदाकारी बहुत दुख दे रही है मैं सच-मुच मुस्कुराना चाहता हूँ परों में तीर है पंजों में तिनके मैं ये चिड़िया उड़ाना चाहता हूँ लिए बैठा हूँ घुँघरू फूल मोती तिरा हँसना बनाना चाहता हूँ अमीरी इश्क़ की तुम को मुबारक मैं बस खाना-कमाना चाहता हूँ मैं सारे शहर की बैसाखियों को तिरे दर पर नचाना चाहता हूँ मुझे तुम सेे बिछड़ना ही पड़ेगा मैं तुम को याद आना चाहता हूँ
Fahmi Badayuni
249 likes
ज़िन्दगी भर फूल ही भिजवाओगे या किसी दिन ख़ुद भी मिलने आओगे पहरे-दारों से बचूँगा कब तलक दोस्त तुम एक दिन मुझे मरवाओगे ख़ुद को आईने में कम देखा करो एक दिन सूरज-मुखी बन जाओगे
Tehzeeb Hafi
88 likes
कभी मिलेंगे तो ये कर्ज़ भी उतारेंगे तुम्हारे चेहरे को पहरों तलक निहारेंगे ये क्या सितम कि खिलाड़ी बदल दिया उस ने हम इस उमीद पे बैठे थे हम ही हारेंगे हमारे बा'द तेरे इश्क़ में नए लड़के बदन तो चू मेंगे ज़ुल्फ़ें नहीं सँवारेंगे
Vikram Gaur Vairagi
70 likes
More from Mirza Ghalib
हसद से दिल अगर अफ़्सुर्दा है गर्म-ए-तमाशा हो कि चश्म-ए-तंग शायद कसरत-ए-नज़्ज़ारा से वा हो ब-क़द्र-ए-हसरत-ए-दिल चाहिए ज़ौक़-ए-मआसी भी भरूँ यक-गोशा-ए-दामन गर आब-ए-हफ़्त-दरिया हो अगर वो सर्व-क़द गर्म-ए-ख़िराम-ए-नाज़ आ जावे कफ़-ए-हर-ख़ाक-ए-गुलशन शक्ल-ए-क़ुमरी नाला-फ़र्सा हो बहम बालीदन-ए-संग-ओ-गुल-ए-सहरा ये चाहे है कि तार-ए-जादा भी कोहसार को ज़ुन्नार-ए-मीना हो हरीफ़-ए-वहशत-ए-नाज़-ए-नसीम-ए-इश्क़ जब आऊँ कि मिस्ल-ए-ग़ुंचा साज़-ए-यक-गुलिस्ताँ दिल मुहय्या हो बजाए दाना ख़िर्मन यक-बयाबाँ बैज़ा-ए-कुमरी मिरा हासिल वो नुस्ख़ा है कि जिस से ख़ाक पैदा हो करे क्या साज़-ए-बीनिश वो शहीद-ए-दर्द-आगाही जिसे मू-ए-दिमाग़-ए-बे-ख़ुदी ख़्वाब-ए-ज़ुलेख़ा हो दिल-ए-जूँ-शम्अ' बहर-ए-दावत-ए-नज़्ज़ारा लायानी निगह लबरेज़-ए-अश्क ओ सीना मामूर-ए-तमन्ना हो न देखें रू-ए-यक-दिल सर्द ग़ैर-अज़ शम-ए-काफ़ूरी ख़ुदाया इस क़दर बज़्म-ए-'असद' गर्म-ए-तमाशा हो
Mirza Ghalib
0 likes
रौंदी हुई है कौकबा-ए-शहरयार की इतराए क्यूँँ न ख़ाक सर-ए-रहगुज़ार की जब उस के देखने के लिए आएँ बादशाह लोगों में क्यूँँ नुमूद न हो लाला-ज़ार की भूके नहीं हैं सैर-ए-गुलिस्ताँ के हम वले क्यूँँकर न खाइए कि हवा है बहार की
Mirza Ghalib
0 likes
हरीफ़-ए-मतलब-ए-मुश्किल नहीं फ़ुसून-ए-नियाज़ दुआ क़ुबूल हो या रब कि उम्र-ए-ख़िज़्र दराज़ न हो ब-हर्ज़ा बयाबाँ-नवर्द-ए-वहम-ए-वजूद हनूज़ तेरे तसव्वुर में है नशेब-ओ-फ़राज़ विसाल जल्वा तमाशा है पर दिमाग़ कहाँ कि दीजे आइना-ए-इन्तिज़ार को पर्दाज़ हर एक ज़र्रा-ए-आशिक़ है आफ़ताब-परस्त गई न ख़ाक हुए पर हवा-ए-जल्वा-ए-नाज़ न पूछ वुसअत-ए-मय-ख़ाना-ए-जुनूँ 'ग़ालिब' जहाँ ये कासा-ए-गर्दूं है एक ख़ाक-अंदाज़ फ़रेब-ए-सनअत-ए-ईजाद का तमाशा देख निगाह अक्स-फ़रोश ओ ख़याल आइना-साज़ ज़ि-बस-कि जल्वा-ए-सय्याद हैरत-आरा है उड़ी है सफ़्हा-ए-ख़ातिर से सूरत-ए-परवाज़ हुजूम-ए-फ़िक्र से दिल मिस्ल-ए-मौज लरज़े है कि शीशा नाज़ुक ओ सहबा-ए-आबगीन-गुदाज़ 'असद' से तर्क-ए-वफ़ा का गुमाँ वो मा'नी है कि खींचिए पर-ए-ताइर से सूरत-ए-परवाज़ हनूज़ ऐ असर-ए-दीद नंग-ए-रुस्वाई निगाह फ़ित्ना-ख़िराम ओ दर-ए-दो-आलम बाज़
Mirza Ghalib
0 likes
हवस को है नशात-ए-कार क्या क्या न हो मरना तो जीने का मज़ा क्या तजाहुल-पेशगी से मुद्दआ' क्या कहाँ तक ऐ सरापा नाज़ क्या क्या नवाज़िश-हा-ए-बेजा देखता हूँ शिकायत-हा-ए-रंगीं का गिला क्या निगाह-ए-बे-महाबा चाहता हूँ तग़ाफ़ुल-हा-ए-तमकीं-आज़मा क्या फ़रोग़-ए-शोला-ए-ख़स यक-नफ़स है हवस को पास-ए-नामूस-ए-वफ़ा क्या नफ़स मौज-ए-मुहीत-ए-बे-ख़ुदी है तग़ाफ़ुल-हा-ए-साक़ी का गिला क्या दिमाग़-ए-इत्र-ए-पैराहन नहीं है ग़म-ए-आवारगी-हा-ए-सबा क्या दिल-ए-हर-क़तरा है साज़-ए-अनल-बहर हम उस के हैं हमारा पूछना क्या मुहाबा क्या है मैं ज़ामिन इधर देख शहीदान-ए-निगह का ख़ूँ-बहा क्या सुन ऐ ग़ारत-गर-ए-जिंस-ए-वफ़ा सुन शिकस्त-ए-शीशा-ए-दिल की सदा क्या किया किस ने जिगर-दारी का दावा शकीब-ए-ख़ातिर-ए-आशिक़ भला क्या ये क़ातिल वादा-ए-सब्र-आज़मा क्यूँँ ये काफ़िर फ़ित्ना-ए-ताक़त-रुबा क्या बला-ए-जाँ है 'ग़ालिब' उस की हर बात इबारत क्या इशारत क्या अदा क्या
Mirza Ghalib
0 likes
हुज़ूर-ए-शाह में अहल-ए-सुख़न की आज़माइश है चमन में ख़ुश-नवायान-ए-चमन की आज़माइश है क़द ओ गेसू में क़ैस ओ कोहकन की आज़माइश है जहाँ हम हैं वहाँ दार-ओ-रसन की आज़माइश है करेंगे कोहकन के हौसले का इम्तिहान आख़िर अभी उस ख़स्ता के नेरवे तन की आज़माइश है नसीम-ए-मिस्र को क्या पीर-ए-कनआँ' की हवा-ख़्वाही उसे यूसुफ़ की बू-ए-पैरहन की आज़माइश है वो आया बज़्म में देखो न कहियो फिर कि ग़ाफ़िल थे शकेब-ओ-सब्र-ए-अहल-ए-अंजुमन की आज़माइश है रहे दिल ही में तीर अच्छा जिगर के पार हो बेहतर ग़रज़ शुस्त-ए-बुत-ए-नावक-फ़गन की आज़माइश है नहीं कुछ सुब्हा-ओ-ज़ुन्नार के फंदे में गीराई वफ़ादारी में शैख़ ओ बरहमन की आज़माइश है पड़ा रह ऐ दिल-ए-वाबस्ता बे-ताबी से क्या हासिल मगर फिर ताब-ए-ज़ुल्फ़-ए-पुर-शिकन की आज़माइश है रग-ओ-पय में जब उतरे ज़हर-ए-ग़म तब देखिए क्या हो अभी तो तल्ख़ी-ए-काम-ओ-दहन की आज़माइश है वो आवेंगे मिरे घर वा'दा कैसा देखना 'ग़ालिब' नए फ़ित्नों में अब चर्ख़-ए-कुहन की आज़माइश है
Mirza Ghalib
0 likes
Similar Writers
Our suggestions based on Mirza Ghalib.
Similar Moods
More moods that pair well with Mirza Ghalib's ghazal.







