ghazalKuch Alfaaz

कभी मिलेंगे तो ये कर्ज़ भी उतारेंगे तुम्हारे चेहरे को पहरों तलक निहारेंगे ये क्या सितम कि खिलाड़ी बदल दिया उस ने हम इस उमीद पे बैठे थे हम ही हारेंगे हमारे बा'द तेरे इश्क़ में नए लड़के बदन तो चू मेंगे ज़ुल्फ़ें नहीं सँवारेंगे

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ज़ने हसीन थी और फूल चुन कर लाती थी मैं शे'र कहता था, वो दास्ताँ सुनाती थी अरब लहू था रगों में, बदन सुनहरा था वो मुस्कुराती नहीं थी, दीए जलाती थी "अली से दूर रहो", लोग उस सेे कहते थे "वो मेरा सच है", बहुत चीख कर बताती थी "अली ये लोग तुम्हें जानते नहीं हैं अभी" गले लगाकर मेरा हौसला बढ़ाती थी ये फूल देख रहे हो, ये उस का लहजा था ये झील देख रहे हो, यहाँ वो आती थी मैं उस के बा'द कभी ठीक से नहीं जागा वो मुझ को ख़्वाब नहीं नींद से जगाती थी उसे किसी से मोहब्बत थी और वो मैं नहीं था ये बात मुझ सेे ज़्यादा उसे रूलाती थी मैं कुछ बता नहीं सकता वो मेरी क्या थी "अली" कि उस को देख कर बस अपनी याद आती थी

Ali Zaryoun

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इक हुनर है जो कर गया हूँ मैं सब के दिल से उतर गया हूँ मैं कैसे अपनी हँसी को ज़ब्त करूँँ सुन रहा हूँ कि घर गया हूँ मैं क्या बताऊँ कि मर नहीं पाता जीते-जी जब से मर गया हूँ मैं अब है बस अपना सामना दर-पेश हर किसी से गुज़र गया हूँ मैं वही नाज़-ओ-अदा वही ग़म्ज़े सर-ब-सर आप पर गया हूँ मैं अजब इल्ज़ाम हूँ ज़माने का कि यहाँ सब के सर गया हूँ मैं कभी ख़ुद तक पहुँच नहीं पाया जब कि वाँ उम्र भर गया हूँ मैं तुम से जानाँ मिला हूँ जिस दिन से बे-तरह ख़ुद से डर गया हूँ मैं कू-ए-जानाँ में सोग बरपा है कि अचानक सुधर गया हूँ मैं

Jaun Elia

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वो पास क्या ज़रा सा मुस्कुरा के बैठ गया मैं इस मज़ाक़ को दिल से लगा के बैठ गया जब उस की बज़्म में दार-ओ-रसन की बात चली मैं झट से उठ गया और आगे आ के बैठ गया दरख़्त काट के जब थक गया लकड़-हारा तो इक दरख़्त के साए में जा के बैठ गया तुम्हारे दर से मैं कब उठना चाहता था मगर ये मेरा दिल है कि मुझ को उठा के बैठ गया जो मेरे वास्ते कुर्सी लगाया करता था वो मेरी कुर्सी से कुर्सी लगा के बैठ गया फिर उस के बा'द कई लोग उठ के जाने लगे मैं उठ के जाने का नुस्ख़ा बता के बैठ गया

Zubair Ali Tabish

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चला है सिलसिला कैसा ये रातों को मनाने का तुम्हें हक़ दे दिया किस ने दियों के दिल दुखाने का इरादा छोड़िए अपनी हदों से दूर जाने का ज़माना है ज़माने की निगाहों में न आने का कहाँ की दोस्ती किन दोस्तों की बात करते हो मियाँ दुश्मन नहीं मिलता कोई अब तो ठिकाने का निगाहों में कोई भी दूसरा चेहरा नहीं आया भरोसा ही कुछ ऐसा था तुम्हारे लौट आने का ये मैं ही था बचा के ख़ुद को ले आया किनारे तक समुंदर ने बहुत मौक़ा' दिया था डूब जाने का

Waseem Barelvi

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उस ने दो चार कर दिया मुझ को ज़ेहनी बीमार कर दिया मुझ को क्यूँ नहीं दस्तरस में तू मेरे क्यूँ तलबगार कर दिया मुझ को कभी पत्थर कभी ख़ुदा उस ने चाहा जो यार कर दिया मुझ को उस सेे कोई सवाल मत करना उस ने इनकार कर दिया मुझ को एक इंसान ही तो माँगा था उस को भी मार कर दिया मुझ को

Himanshi babra KATIB

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जब भी दीवाना कोई राह भटक जाता है सब से पहले तो मेरा आप पे शक जाता है शर्त पूरी हो यही जीत नहीं कहलाती शिव धनुष राम के हाथों में चटक जाता है पहले कह देता है ग़ुस्से में कोई बात बुरी और फिर अपने ही ग़ुस्से पे भड़क जाता है वो बताते हैं मुझे पीने पिलाने का शऊर जिन से नश्शे में अभी जाम छलक जाता है आप के शहर के आशिक़ भी हमें सुनते हैं उस तरफ़ भी इसी दरिया का नमक जाता है

Vikram Gaur Vairagi

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तेरे आगे है सब तुझ को दिखाई दे रहा है तेरा ग़म ख़ुद-ब-ख़ुद मुझ को रिहाई दे रहा है मेरे सीने पे सर रक्खा है तो ख़ामोश मत रह मुझे बतला तुझे जो भी सुनाई दे रहा है तेरी ग़लती है ये हरगिज़ नहीं है तेरी ग़लती तेरी ग़लती है तू उस पर सफ़ाई दे रहा है अँधेरा वो कि जिस में देखना मुमकिन नहीं है मगर फिर भी अँधेरा क्यूँँ दिखाई दे रहा है मुझे पूछे बिना मुझ सेे मुहब्बत कर रहा है मरज़ जाने बिना मुझ को दवाई दे रहा है

Vikram Gaur Vairagi

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ये शाहज़ादी की एक अदा है कमी नहीं है वो बोलने जब लगे तो फिर सोचती नहीं है कोई जो पूछे ख़मोश क्यूँँ हो तो हम बताएँ हमारी नाराज़गी है ये ख़ामुशी नहीं है ख़ला का चेहरा मुसव्विरों ने परख लिया है पर उस की तस्वीर इनसे अब तक बनी नहीं है कल उस की आँखों में फिर से आँसू थे मुझ को ले कर तो आग अब तक दहक रही है बुझी नहीं है मुझी को महफ़िल में ढूँढ़ने वो हुआ था दाख़िल मुझी पे उस की निगाह अब तक पड़ी नहीं है

Vikram Gaur Vairagi

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मैं राह-ए-जन्नत का अस्ल नक़्शा चुरा रहा था सो उँगलियों को तेरे लबों पर फिरा रहा था मैं इस लिए भी सर अपना हाँ में हिला रहा था मुझे पता है तू सिर्फ़ बातें बना रहा था बिछड़ के हम सेे हमारी ग़लती गिना रहा था हमारा ग़म था हमीं को आँखें दिखा रहा था वो ख़ुद को दुनिया का एक हिस्सा बना चुकी थी मैं अपने हिस्से का प्यार जिस पर लुटा रहा था तुम्हीं ने जाने को कह दिया है तुम्हीं कहोगे उसे बुलाओ, वो शे'र अच्छे सुना रहा था

Vikram Gaur Vairagi

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चेहरा धुँदला सा था और सुनहरे झुमके थे बादल ने कानों में चाँद के टुकड़े पहने थे इक दूजे को खोने से हम इतना डरते थे ग़ुस्सा भी होते तो बातें करते रहते थे मैं तो सजदे में था देखने वाले कहते हैं क़ातिल की तलवार से पहले आँसू निकले थे

Vikram Gaur Vairagi

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