ghazalKuch Alfaaz

तेरे आगे है सब तुझ को दिखाई दे रहा है तेरा ग़म ख़ुद-ब-ख़ुद मुझ को रिहाई दे रहा है मेरे सीने पे सर रक्खा है तो ख़ामोश मत रह मुझे बतला तुझे जो भी सुनाई दे रहा है तेरी ग़लती है ये हरगिज़ नहीं है तेरी ग़लती तेरी ग़लती है तू उस पर सफ़ाई दे रहा है अँधेरा वो कि जिस में देखना मुमकिन नहीं है मगर फिर भी अँधेरा क्यूँँ दिखाई दे रहा है मुझे पूछे बिना मुझ सेे मुहब्बत कर रहा है मरज़ जाने बिना मुझ को दवाई दे रहा है

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ये सात आठ पड़ोसी कहाँ से आए मेरे तुम्हारे दिल में तो कोई न था सिवाए मेरे किसी ने पास बिठाया बस आगे याद नहीं मुझे तो दोस्त वहाँ से उठा के लाए मेरे ये सोच कर न किए अपने दर्द उस के सुपुर्द वो लालची है असासे न बेच खाए मेरे इधर किधर तू नया है यहाँ कि पागल है किसी ने क्या तुझे क़िस्से नहीं सुनाए मेरे वो आज़माए मेरे दोस्त को ज़रूर मगर उसे कहो कि तरीके न आज़माए मेरे

Umair Najmi

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वो बे-वफ़ा है तो क्या मत कहो बुरा उस को कि जो हुआ सो हुआ ख़ुश रखे ख़ुदा उस को नज़र न आए तो उस की तलाश में रहना कहीं मिले तो पलट कर न देखना उस को वो सादा-ख़ू था ज़माने के ख़म समझता क्या हवा के साथ चला ले उड़ी हवा उस को वो अपने बारे में कितना है ख़ुश-गुमाँ देखो जब उस को मैं भी न देखूँ तो देखना उस को अभी से जाना भी क्या उस की कम-ख़याली पर अभी तो और बहुत होगा सोचना उस को उसे ये धुन कि मुझे कम से कम उदास रखे मिरी दु'आ कि ख़ुदा दे ये हौसला उस को पनाह ढूँढ़ रही है शब-ए-गिरफ़्ता-दिलाँ कोई बताओ मिरे घर का रास्ता उस को ग़ज़ल में तज़्किरा उस का न कर 'नसीर' कि अब भुला चुका वो तुझे तू भी भूल जा उस को

Naseer Turabi

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ज़बाँ तो खोल नज़र तो मिला जवाब तो दे मैं कितनी बार लुटा हूँ मुझे हिसाब तो दे तेरे बदन की लिखावट में है उतार चढ़ाव मैं तुझे कैसे पढूँगा मुझे किताब तो दे तेरा सवाल है साक़ी कि ज़िंदगी क्या है? जवाब देता हूँ पहले मुझे शराब तो दे

Rahat Indori

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तेरे पीछे होगी दुनिया पागल बन क्या बोला मैं ने कुछ समझा? पागल बन सहरा में भी ढूँढ़ ले दरिया पागल बन वरना मर जाएगा प्यासा पागल बन आधा दाना आधा पागल नइँ नइँ नइँ उस को पाना है तो पूरा पागल बन दानाई दिखलाने से कुछ हासिल नहीं पागल खाना है ये दुनिया पागल बन देखें तुझ को लोग तो पागल हो जाएँ इतना उम्दा इतना आला पागल बन लोगों से डर लगता है तो घर में बैठ जिगरा है तो मेरे जैसा पागल बन

Varun Anand

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बैठे हैं चैन से कहीं जाना तो है नहीं हम बे-घरों का कोई ठिकाना तो है नहीं तुम भी हो बीते वक़्त के मानिंद हू-ब-हू तुम ने भी याद आना है आना तो है नहीं अहद-ए-वफ़ा से किस लिए ख़ाइफ़ हो मेरी जान कर लो कि तुम ने अहद निभाना तो है नहीं वो जो हमें अज़ीज़ है कैसा है कौन है क्यूँँ पूछते हो हम ने बताना तो है नहीं दुनिया हम अहल-ए-इश्क़ पे क्यूँँ फेंकती है जाल हम ने तिरे फ़रेब में आना तो है नहीं वो इश्क़ तो करेगा मगर देख भाल के 'फ़ारिस' वो तेरे जैसा दिवाना तो है नहीं

Rehman Faris

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ये शाहज़ादी की एक अदा है कमी नहीं है वो बोलने जब लगे तो फिर सोचती नहीं है कोई जो पूछे ख़मोश क्यूँँ हो तो हम बताएँ हमारी नाराज़गी है ये ख़ामुशी नहीं है ख़ला का चेहरा मुसव्विरों ने परख लिया है पर उस की तस्वीर इनसे अब तक बनी नहीं है कल उस की आँखों में फिर से आँसू थे मुझ को ले कर तो आग अब तक दहक रही है बुझी नहीं है मुझी को महफ़िल में ढूँढ़ने वो हुआ था दाख़िल मुझी पे उस की निगाह अब तक पड़ी नहीं है

Vikram Gaur Vairagi

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जब भी दीवाना कोई राह भटक जाता है सब से पहले तो मेरा आप पे शक जाता है शर्त पूरी हो यही जीत नहीं कहलाती शिव धनुष राम के हाथों में चटक जाता है पहले कह देता है ग़ुस्से में कोई बात बुरी और फिर अपने ही ग़ुस्से पे भड़क जाता है वो बताते हैं मुझे पीने पिलाने का शऊर जिन से नश्शे में अभी जाम छलक जाता है आप के शहर के आशिक़ भी हमें सुनते हैं उस तरफ़ भी इसी दरिया का नमक जाता है

Vikram Gaur Vairagi

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चेहरा धुँदला सा था और सुनहरे झुमके थे बादल ने कानों में चाँद के टुकड़े पहने थे इक दूजे को खोने से हम इतना डरते थे ग़ुस्सा भी होते तो बातें करते रहते थे मैं तो सजदे में था देखने वाले कहते हैं क़ातिल की तलवार से पहले आँसू निकले थे

Vikram Gaur Vairagi

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मैं राह-ए-जन्नत का अस्ल नक़्शा चुरा रहा था सो उँगलियों को तेरे लबों पर फिरा रहा था मैं इस लिए भी सर अपना हाँ में हिला रहा था मुझे पता है तू सिर्फ़ बातें बना रहा था बिछड़ के हम सेे हमारी ग़लती गिना रहा था हमारा ग़म था हमीं को आँखें दिखा रहा था वो ख़ुद को दुनिया का एक हिस्सा बना चुकी थी मैं अपने हिस्से का प्यार जिस पर लुटा रहा था तुम्हीं ने जाने को कह दिया है तुम्हीं कहोगे उसे बुलाओ, वो शे'र अच्छे सुना रहा था

Vikram Gaur Vairagi

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मुझ ऐसे शख़्स से रिश्ता नहीं निकाल सका वो अपने हुस्न का सदक़ा नहीं निकाल सका मैं मिल रहा था उसे बा'द एक मुद्दत के सो उस सेे कोई भी रिश्ता नहीं निकाल सका तेरे लिए तो मुझे ज़िंदगी भी कम थी मगर मेरे लिए तो तू लम्हा नहीं निकाल सका तू देख पाई नहीं मुझ को ख़त्म होते हुए मैं तेरी आँख का कचरा नहीं निकाल सका इक ऐसी बात का ग़ुस्सा है मेरे लहजे में वो बात जिस का मैं ग़ुस्सा नहीं निकाल सका

Vikram Gaur Vairagi

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