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मैं राह-ए-जन्नत का अस्ल नक़्शा चुरा रहा था सो उँगलियों को तेरे लबों पर फिरा रहा था मैं इस लिए भी सर अपना हाँ में हिला रहा था मुझे पता है तू सिर्फ़ बातें बना रहा था बिछड़ के हम सेे हमारी ग़लती गिना रहा था हमारा ग़म था हमीं को आँखें दिखा रहा था वो ख़ुद को दुनिया का एक हिस्सा बना चुकी थी मैं अपने हिस्से का प्यार जिस पर लुटा रहा था तुम्हीं ने जाने को कह दिया है तुम्हीं कहोगे उसे बुलाओ, वो शे'र अच्छे सुना रहा था

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मेरे बस में नहीं वरना क़ुदरत का लिखा हुआ काटता तेरे हिस्से में आए बुरे दिन कोई दूसरा काटता लारियों से ज़्यादा बहाव था तेरे हर इक लफ्ज़ में मैं इशारा नहीं काट सकता तेरी बात क्या काटता मैं ने भी ज़िंदगी और शब ए हिज्र काटी है सबकी तरह वैसे बेहतर तो ये था के मैं कम से कम कुछ नया काटता तेरे होते हुए मोमबत्ती बुझाई किसी और ने क्या ख़ुशी रह गई थी जन्मदिन की, मैं केक क्या काटता कोई भी तो नहीं जो मेरे भूखे रहने पे नाराज़ हो जेल में तेरी तस्वीर होती तो हँसकर सज़ा काटता

Tehzeeb Hafi

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चाँद सितारे फूल परिंदे शाम सवेरा एक तरफ़ सारी दुनिया उस का चर्बा उस का चेहरा एक‌ तरफ़ वो लड़कर भी सो जाए तो उस का माथा चूमूँ मैं उस सेे मुहब्बत एक तरफ़ है उस सेे झगड़ा एक तरफ़ जिस शय पर वो उँगली रख दे उस को वो दिलवानी है उस की ख़ुशियाँ सब से अव्वल सस्ता महँगा एक तरफ़ ज़ख़्मों पर मरहम लगवाओ लेकिन उस के हाथों से चारासाज़ी एक तरफ़ है उस का छूना एक तरफ़ सारी दुनिया जो भी बोले सब कुछ शोर शराबा है सब का कहना एक तरफ़ है उस का कहना एक तरफ़ उस ने सारी दुनिया माँगी मैं ने उस को माँगा है उस के सपने एक तरफ़ है मेरा सपना एक तरफ़

Varun Anand

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क्यूँँ डरें ज़िन्दगी में क्या होगा कुछ न होगा तो तजरबा होगा हँसती आँखों में झाँक कर देखो कोई आँसू कहीं छुपा होगा इन दिनों ना-उमीद सा हूँ मैं शायद उस ने भी ये सुना होगा देख कर तुम को सोचता हूँ मैं क्या किसी ने तुम्हें छुआ होगा

Javed Akhtar

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तेरी मुश्किल न बढ़ाऊँगा चला जाऊँगा अश्क आँखों में छुपाऊँगा चला जाऊँगा अपनी दहलीज़ पे कुछ देर पड़ा रहने दे जैसे ही होश में आऊँगा चला जाऊँगा ख़्वाब लेने कोई आए कि न आए कोई मैं तो आवाज़ लगाऊँगा चला जाऊँगा चंद यादें मुझे बच्चों की तरह प्यारी हैं उन को सीने से लगाऊँगा चला जाऊँगा मुद्दतों बा'द मैं आया हूँ पुराने घर में ख़ुद को जी भर के रुलाऊँगा चला जाऊँगा इस जज़ीरे में ज़ियादा नहीं रहना अब तो आजकल नाव बनाऊँगा चला जाऊँगा मौसम-ए-गुल की तरह लौट के आऊँगा 'हसन' हर तरफ़ फूल खिलाऊँगा चला जाऊँगा

Hasan Abbasi

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इतना मजबूर न कर बात बनाने लग जाएँ हम तेरे सर की क़सम झूठ ही खाने लग जाएँ इतने सन्नाटे पिए मेरी समा'अत ने कि अब सिर्फ़ आवाज़ पे चाहूँ तो निशाने लग जाएँ चलिए कुछ और नहीं आह-शुमारी ही सही हम किसी काम तो इस दिल के बहाने लग जाएँ हम वो गुम-गश्त-ए-मोहब्बत हैं कि तुम तो क्या हो ख़ुद को हम ढूँडने निकलें तो ज़माने लग जाएँ ख़्वाब कुछ ऐसे दिखाए हैं फ़क़ीरी ने मुझे जिन की ता'बीर में शाहों के ख़ज़ाने लग जाएँ मैं अगर अपनी जवानी के सुना दूँ क़िस्से ये जो लौंडे हैं मिरे पाँव दबाने लग जाएँ

Mehshar Afridi

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जब भी दीवाना कोई राह भटक जाता है सब से पहले तो मेरा आप पे शक जाता है शर्त पूरी हो यही जीत नहीं कहलाती शिव धनुष राम के हाथों में चटक जाता है पहले कह देता है ग़ुस्से में कोई बात बुरी और फिर अपने ही ग़ुस्से पे भड़क जाता है वो बताते हैं मुझे पीने पिलाने का शऊर जिन से नश्शे में अभी जाम छलक जाता है आप के शहर के आशिक़ भी हमें सुनते हैं उस तरफ़ भी इसी दरिया का नमक जाता है

Vikram Gaur Vairagi

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चेहरा धुँदला सा था और सुनहरे झुमके थे बादल ने कानों में चाँद के टुकड़े पहने थे इक दूजे को खोने से हम इतना डरते थे ग़ुस्सा भी होते तो बातें करते रहते थे मैं तो सजदे में था देखने वाले कहते हैं क़ातिल की तलवार से पहले आँसू निकले थे

Vikram Gaur Vairagi

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ये शाहज़ादी की एक अदा है कमी नहीं है वो बोलने जब लगे तो फिर सोचती नहीं है कोई जो पूछे ख़मोश क्यूँँ हो तो हम बताएँ हमारी नाराज़गी है ये ख़ामुशी नहीं है ख़ला का चेहरा मुसव्विरों ने परख लिया है पर उस की तस्वीर इनसे अब तक बनी नहीं है कल उस की आँखों में फिर से आँसू थे मुझ को ले कर तो आग अब तक दहक रही है बुझी नहीं है मुझी को महफ़िल में ढूँढ़ने वो हुआ था दाख़िल मुझी पे उस की निगाह अब तक पड़ी नहीं है

Vikram Gaur Vairagi

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मुझ ऐसे शख़्स से रिश्ता नहीं निकाल सका वो अपने हुस्न का सदक़ा नहीं निकाल सका मैं मिल रहा था उसे बा'द एक मुद्दत के सो उस सेे कोई भी रिश्ता नहीं निकाल सका तेरे लिए तो मुझे ज़िंदगी भी कम थी मगर मेरे लिए तो तू लम्हा नहीं निकाल सका तू देख पाई नहीं मुझ को ख़त्म होते हुए मैं तेरी आँख का कचरा नहीं निकाल सका इक ऐसी बात का ग़ुस्सा है मेरे लहजे में वो बात जिस का मैं ग़ुस्सा नहीं निकाल सका

Vikram Gaur Vairagi

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तेरे आगे है सब तुझ को दिखाई दे रहा है तेरा ग़म ख़ुद-ब-ख़ुद मुझ को रिहाई दे रहा है मेरे सीने पे सर रक्खा है तो ख़ामोश मत रह मुझे बतला तुझे जो भी सुनाई दे रहा है तेरी ग़लती है ये हरगिज़ नहीं है तेरी ग़लती तेरी ग़लती है तू उस पर सफ़ाई दे रहा है अँधेरा वो कि जिस में देखना मुमकिन नहीं है मगर फिर भी अँधेरा क्यूँँ दिखाई दे रहा है मुझे पूछे बिना मुझ सेे मुहब्बत कर रहा है मरज़ जाने बिना मुझ को दवाई दे रहा है

Vikram Gaur Vairagi

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