ghazalKuch Alfaaz

ये सात आठ पड़ोसी कहाँ से आए मेरे तुम्हारे दिल में तो कोई न था सिवाए मेरे किसी ने पास बिठाया बस आगे याद नहीं मुझे तो दोस्त वहाँ से उठा के लाए मेरे ये सोच कर न किए अपने दर्द उस के सुपुर्द वो लालची है असासे न बेच खाए मेरे इधर किधर तू नया है यहाँ कि पागल है किसी ने क्या तुझे क़िस्से नहीं सुनाए मेरे वो आज़माए मेरे दोस्त को ज़रूर मगर उसे कहो कि तरीके न आज़माए मेरे

Umair Najmi59 Likes

Related Ghazal

चाँद सितारे फूल परिंदे शाम सवेरा एक तरफ़ सारी दुनिया उस का चर्बा उस का चेहरा एक‌ तरफ़ वो लड़कर भी सो जाए तो उस का माथा चूमूँ मैं उस सेे मुहब्बत एक तरफ़ है उस सेे झगड़ा एक तरफ़ जिस शय पर वो उँगली रख दे उस को वो दिलवानी है उस की ख़ुशियाँ सब से अव्वल सस्ता महँगा एक तरफ़ ज़ख़्मों पर मरहम लगवाओ लेकिन उस के हाथों से चारासाज़ी एक तरफ़ है उस का छूना एक तरफ़ सारी दुनिया जो भी बोले सब कुछ शोर शराबा है सब का कहना एक तरफ़ है उस का कहना एक तरफ़ उस ने सारी दुनिया माँगी मैं ने उस को माँगा है उस के सपने एक तरफ़ है मेरा सपना एक तरफ़

Varun Anand

406 likes

ये ग़म क्या दिल की आदत है नहीं तो किसी से कुछ शिकायत है नहीं तो है वो इक ख़्वाब-ए-बे-ताबीर उस को भुला देने की निय्यत है नहीं तो किसी के बिन किसी की याद के बिन जिए जाने की हिम्मत है नहीं तो किसी सूरत भी दिल लगता नहीं हाँ तो कुछ दिन से ये हालत है नहीं तो तेरे इस हाल पर है सब को हैरत तुझे भी इस पे हैरत है नहीं तो हम-आहंगी नहीं दुनिया से तेरी तुझे इस पर नदामत है नहीं तो हुआ जो कुछ यही मक़्सूम था क्या यही सारी हिकायत है नहीं तो अज़िय्यत-नाक उम्मीदों से तुझ को अमाँ पाने की हसरत है नहीं तो तू रहता है ख़याल-ओ-ख़्वाब में गुम तो इस की वज्ह फ़ुर्सत है नहीं तो सबब जो इस जुदाई का बना है वो मुझ सेे ख़ूब-सूरत है नहीं तो

Jaun Elia

355 likes

उसी जगह पर जहाँ कई रास्ते मिलेंगे पलट के आए तो सब सेे पहले तुझे मिलेंगे अगर कभी तेरे नाम पर जंग हो गई तो हम ऐसे बुज़दिल भी पहली सफ़ में खड़े मिलेंगे तुझे ये सड़कें मेरे तवस्सुत से जानती हैं तुझे हमेशा ये सब इशारे खुले मिलेंगे

Tehzeeb Hafi

465 likes

तुम्हें बस ये बताना चाहता हूँ मैं तुम से क्या छुपाना चाहता हूँ कभी मुझ से भी कोई झूठ बोलो मैं हाँ में हाँ मिलाना चाहता हूँ ये जो खिड़की है नक़्शे में तुम्हारे यहाँ मैं दर बनाना चाहता हूँ अदाकारी बहुत दुख दे रही है मैं सच-मुच मुस्कुराना चाहता हूँ परों में तीर है पंजों में तिनके मैं ये चिड़िया उड़ाना चाहता हूँ लिए बैठा हूँ घुँघरू फूल मोती तिरा हँसना बनाना चाहता हूँ अमीरी इश्क़ की तुम को मुबारक मैं बस खाना-कमाना चाहता हूँ मैं सारे शहर की बैसाखियों को तिरे दर पर नचाना चाहता हूँ मुझे तुम सेे बिछड़ना ही पड़ेगा मैं तुम को याद आना चाहता हूँ

Fahmi Badayuni

249 likes

मेरे बस में नहीं वरना क़ुदरत का लिखा हुआ काटता तेरे हिस्से में आए बुरे दिन कोई दूसरा काटता लारियों से ज़्यादा बहाव था तेरे हर इक लफ्ज़ में मैं इशारा नहीं काट सकता तेरी बात क्या काटता मैं ने भी ज़िंदगी और शब ए हिज्र काटी है सबकी तरह वैसे बेहतर तो ये था के मैं कम से कम कुछ नया काटता तेरे होते हुए मोमबत्ती बुझाई किसी और ने क्या ख़ुशी रह गई थी जन्मदिन की, मैं केक क्या काटता कोई भी तो नहीं जो मेरे भूखे रहने पे नाराज़ हो जेल में तेरी तस्वीर होती तो हँसकर सज़ा काटता

Tehzeeb Hafi

456 likes

More from Umair Najmi

तुम इस ख़राबे में चार छे दिन टहल गई हो सो ऐन-मुमकिन है दिल की हालत बदल गई हो तमाम दिन इस दुआ में कटता है कुछ दिनों से मैं जाऊँ कमरे में तो उदासी निकल गई हो किसी के आने पे ऐसे हलचल हुई है मुझ में ख़मोश जंगल में जैसे बंदूक़ चल गई हो ये न हो गर मैं हिलूँ तो गिरने लगे बुरादा दुखों की दीमक बदन की लकड़ी निगल गई हो ये छोटे छोटे कई हवादिस जो हो रहे हैं किसी के सर से बड़ी मुसीबत न टल गई हो हमारा मलबा हमारे क़दमों में आ गिरा है प्लेट में जैसे मोम-बत्ती पिघल गई हो

Umair Najmi

10 likes

मैं ने जो राह ली दुश्वार ज़ियादा निकली मेरे अंदाज़े से हर बार ज़ियादा निकली कोई रौज़न न झरोका न कोई दरवाज़ा मेरी ता'मीर में दीवार ज़ियादा निकली ये मिरी मौत के अस्बाब में लिखा हुआ है ख़ून में इश्क़ की मिक़दार ज़ियादा निकली कितनी जल्दी दिया घर वालों को फल और साया मुझ से तो पेड़ की रफ़्तार ज़ियादा निकली

Umair Najmi

10 likes

इक दिन ज़बाँ सुकूत की पूरी बनाऊँगा मैं गुफ़्तुगू को ग़ैर-ज़रूरी बनाऊँगा तस्वीर में बनाऊँगा दोनों के हाथ और दोनों में एक हाथ की दूरी बनाऊँगा मुद्दत समेत जुमला ज़वाबित हों तय-शुदा या'नी तअ'ल्लुक़ात उबूरी बनाऊँगा तुझ को ख़बर न होगी कि मैं आस-पास हूँ इस बार हाज़िरी को हुज़ूरी बनाऊँगा रंगों पे इख़्तियार अगर मिल सका कभी तेरी सियाह पुतलियाँ भूरी बनाऊँगा जारी है अपनी ज़ात पे तहक़ीक़ आज-कल मैं भी ख़ला पे एक थ्योरी बनाऊँगा मैं चाह कर वो शक्ल मुकम्मल न कर सका उस को भी लग रहा था अधूरी बनाऊँगा

Umair Najmi

20 likes

इक दिन ज़बाँ सुकूत की पूरी बनाऊँगा मैं गुफ़्तुगू को ग़ैर-ज़रूरी बनाऊँगा तस्वीर में बनाऊँगा दोनों के हाथ और दोनों में एक हाथ की दूरी बनाऊँगा मुद्दत समेत जुमला ज़वाबित हों तय-शुदा या'नी तअल्लुक़ात उबूरी बनाऊँगा तुझ को ख़बर न होगी कि मैं आस-पास हूँ इस बार हाज़िरी को हुज़ूरी बनाऊँगा रंगों पे इख़्तियार अगर मिल सका कभी तेरी सियाह पुतलियाँ भूरी बनाऊँगा जारी है अपनी ज़ात पे तहक़ीक़ आज-कल मैं भी ख़ला पे एक थ्योरी बनाऊँगा मैं चाह कर वो शक्ल मुकम्मल न कर सका उस को भी लग रहा था अधूरी बनाऊँगा

Umair Najmi

10 likes

मैं बरश छोड़ चुका आख़िरी तस्वीर के बा'द मुझ से कुछ बन नहीं पाया तिरी तस्वीर के बा'द मुश्तरक दोस्त भी छूटे हैं तुझे छोड़ने पर या'नी दीवार हटानी पड़ी तस्वीर के बा'द यार तस्वीर में तन्हा हूँ मगर लोग मिले कई तस्वीर से पहले कई तस्वीर के बा'द दूसरा इश्क़ मुयस्सर है मगर करता नहीं कौन देखेगा पुरानी नई तस्वीर के बा'द भेज देता हूँ मगर पहले बता दूँ तुझ को मुझ से मिलता नहीं कोई मिरी तस्वीर के बा'द ख़ुश्क दीवार में सीलन का सबब क्या होगा एक अदद ज़ंग लगी कील थी तस्वीर के बा'द

Umair Najmi

28 likes

Similar Writers

View All ›

Our suggestions based on Umair Najmi.

Similar Moods

View All ›

More moods that pair well with Umair Najmi's ghazal.