मैं ने जो राह ली दुश्वार ज़ियादा निकली मेरे अंदाज़े से हर बार ज़ियादा निकली कोई रौज़न न झरोका न कोई दरवाज़ा मेरी ता'मीर में दीवार ज़ियादा निकली ये मिरी मौत के अस्बाब में लिखा हुआ है ख़ून में इश्क़ की मिक़दार ज़ियादा निकली कितनी जल्दी दिया घर वालों को फल और साया मुझ से तो पेड़ की रफ़्तार ज़ियादा निकली
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तुम्हें बस ये बताना चाहता हूँ मैं तुम से क्या छुपाना चाहता हूँ कभी मुझ से भी कोई झूठ बोलो मैं हाँ में हाँ मिलाना चाहता हूँ ये जो खिड़की है नक़्शे में तुम्हारे यहाँ मैं दर बनाना चाहता हूँ अदाकारी बहुत दुख दे रही है मैं सच-मुच मुस्कुराना चाहता हूँ परों में तीर है पंजों में तिनके मैं ये चिड़िया उड़ाना चाहता हूँ लिए बैठा हूँ घुँघरू फूल मोती तिरा हँसना बनाना चाहता हूँ अमीरी इश्क़ की तुम को मुबारक मैं बस खाना-कमाना चाहता हूँ मैं सारे शहर की बैसाखियों को तिरे दर पर नचाना चाहता हूँ मुझे तुम सेे बिछड़ना ही पड़ेगा मैं तुम को याद आना चाहता हूँ
Fahmi Badayuni
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ज़बाँ तो खोल नज़र तो मिला जवाब तो दे मैं कितनी बार लुटा हूँ मुझे हिसाब तो दे तेरे बदन की लिखावट में है उतार चढ़ाव मैं तुझे कैसे पढूँगा मुझे किताब तो दे तेरा सवाल है साक़ी कि ज़िंदगी क्या है? जवाब देता हूँ पहले मुझे शराब तो दे
Rahat Indori
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उसी जगह पर जहाँ कई रास्ते मिलेंगे पलट के आए तो सब सेे पहले तुझे मिलेंगे अगर कभी तेरे नाम पर जंग हो गई तो हम ऐसे बुज़दिल भी पहली सफ़ में खड़े मिलेंगे तुझे ये सड़कें मेरे तवस्सुत से जानती हैं तुझे हमेशा ये सब इशारे खुले मिलेंगे
Tehzeeb Hafi
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सितम ढाते हुए सोचा करोगे हमारे साथ तुम ऐसा करोगे? अँगूठी तो मुझे लौटा रहे हो अँगूठी के निशाँ का क्या करोगे? मैं तुम सेे अब झगड़ता भी नहीं हूँ तो क्या इस बात पर झगड़ा करोगे? मेरा दामन तुम्हीं था में हुए हो मेरा दामन तुम्हीं मैला करोगे बताओ वा'दा कर के आओगे ना? के पिछली बार के जैसा करोगे? वो दुल्हन बन के रुख़्सत हो गई है कहाँ तक कार का पीछा करोगे? मुझे बस यूँँ ही तुम सेे पूछना था अगर मैं मर गया तो क्या करोगे?
Zubair Ali Tabish
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पागल कैसे हो जाते हैं देखो ऐसे हो जाते हैं ख़्वाबों का धंधा करती हो कितने पैसे हो जाते हैं दुनिया सा होना मुश्किल है तेरे जैसे हो जाते हैं मेरे काम ख़ुदा करता है तेरे वैसे हो जाते हैं
Ali Zaryoun
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इक दिन ज़बाँ सुकूत की पूरी बनाऊँगा मैं गुफ़्तुगू को ग़ैर-ज़रूरी बनाऊँगा तस्वीर में बनाऊँगा दोनों के हाथ और दोनों में एक हाथ की दूरी बनाऊँगा मुद्दत समेत जुमला ज़वाबित हों तय-शुदा या'नी तअल्लुक़ात उबूरी बनाऊँगा तुझ को ख़बर न होगी कि मैं आस-पास हूँ इस बार हाज़िरी को हुज़ूरी बनाऊँगा रंगों पे इख़्तियार अगर मिल सका कभी तेरी सियाह पुतलियाँ भूरी बनाऊँगा जारी है अपनी ज़ात पे तहक़ीक़ आज-कल मैं भी ख़ला पे एक थ्योरी बनाऊँगा मैं चाह कर वो शक्ल मुकम्मल न कर सका उस को भी लग रहा था अधूरी बनाऊँगा
Umair Najmi
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तुम इस ख़राबे में चार छे दिन टहल गई हो सो ऐन-मुमकिन है दिल की हालत बदल गई हो तमाम दिन इस दुआ में कटता है कुछ दिनों से मैं जाऊँ कमरे में तो उदासी निकल गई हो किसी के आने पे ऐसे हलचल हुई है मुझ में ख़मोश जंगल में जैसे बंदूक़ चल गई हो ये न हो गर मैं हिलूँ तो गिरने लगे बुरादा दुखों की दीमक बदन की लकड़ी निगल गई हो ये छोटे छोटे कई हवादिस जो हो रहे हैं किसी के सर से बड़ी मुसीबत न टल गई हो हमारा मलबा हमारे क़दमों में आ गिरा है प्लेट में जैसे मोम-बत्ती पिघल गई हो
Umair Najmi
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तुम को वेहशत तो सीखा दी गुजारें लाइक़ और कोई हुक्म कोई काम हमारे लाइक़ माजरत में तो किसी और के मसरफ में हुं ढूंढ देता हु मगर कोई तुम्हारे लाइक़ एक दो ज़ख़्मों की गहराई और आँखों के खंडर और कुछ ख़ास नहीं मुझ में नज़ारे लाइक़ घोंसला छाव हरा रंग समर कुछ भी नहीं देख मुझ जैसे शजर होते है आरे लाइक़ इस इलाक़े में उजालों की जगह कोई नहीं सिर्फ़ परचम है यहाँ चाँद सितारे लाइक़ मुझ निक्क में को चुना उस ने तरस खा के उमेर देखते रह गए हसरत से बेचारे लाइक़
Umair Najmi
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हर इक हज़ार में बस पाँच सात हैं हम लोग निसाब-ए-इश्क़ पे वाजिब ज़कात हैं हम लोग दबाओ में भी जमाअत कभी नहीं बदली शुरूअ' दिन से मोहब्बत के साथ हैं हम लोग जो सीखनी हो ज़बान-ए-सुकूत बिस्मिल्लाह ख़मोशियों की मुकम्मल लुग़ात हैं हम लोग कहानियों के वो किरदार जो लिखे न गए ख़बर से हज़्फ़-शुदा वाक़िआ''त हैं हम लोग ये इंतिज़ार हमें देख कर बनाया गया ज़ुहूर-ए-हिज्र से पहले की बात हैं हम लोग किसी को रास्ता दे दें किसी को पानी न दें कहीं पे नील कहीं पर फ़ुरात हैं हम लोग हमें जला के कोई शब गुज़ार सकता है सड़क पे बिखरे हुए काग़ज़ात हैं हम लोग
Umair Najmi
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दाएँ बाज़ू में गड़ा तीर नहीं खींच सका इस लिए ख़ोल से शमशीर नहीं खींच सका शोर इतना था कि आवाज़ भी डब्बे में रही भीड़ इतनी थी कि ज़ंजीर नहीं खींच सका हर नज़र से नज़र-अंदाज़-शुदा मंज़र हूँ वो मदारी हूँ जो रहगीर नहीं खींच सका मैं ने मेहनत से हथेली पे लकीरें खींचीं वो जिन्हें कातिब-ए-तक़दीर नहीं खींच सका मैं ने तस्वीर-कशी कर के जवाँ की औलाद उन के बचपन की तसावीर नहीं खींच सका मुझ पे इक हिज्र मुसल्लत है हमेशा के लिए ऐसा जिन है कि कोई पीर नहीं खींच सका तुम पे क्या ख़ाक असर होगा मिरे शे'रों का तुम को तो मीर-तक़ी-'मीर'' नहीं खींच सका
Umair Najmi
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