इक दिन ज़बाँ सुकूत की पूरी बनाऊँगा मैं गुफ़्तुगू को ग़ैर-ज़रूरी बनाऊँगा तस्वीर में बनाऊँगा दोनों के हाथ और दोनों में एक हाथ की दूरी बनाऊँगा मुद्दत समेत जुमला ज़वाबित हों तय-शुदा या'नी तअ'ल्लुक़ात उबूरी बनाऊँगा तुझ को ख़बर न होगी कि मैं आस-पास हूँ इस बार हाज़िरी को हुज़ूरी बनाऊँगा रंगों पे इख़्तियार अगर मिल सका कभी तेरी सियाह पुतलियाँ भूरी बनाऊँगा जारी है अपनी ज़ात पे तहक़ीक़ आज-कल मैं भी ख़ला पे एक थ्योरी बनाऊँगा मैं चाह कर वो शक्ल मुकम्मल न कर सका उस को भी लग रहा था अधूरी बनाऊँगा
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तुम्हें बस ये बताना चाहता हूँ मैं तुम से क्या छुपाना चाहता हूँ कभी मुझ से भी कोई झूठ बोलो मैं हाँ में हाँ मिलाना चाहता हूँ ये जो खिड़की है नक़्शे में तुम्हारे यहाँ मैं दर बनाना चाहता हूँ अदाकारी बहुत दुख दे रही है मैं सच-मुच मुस्कुराना चाहता हूँ परों में तीर है पंजों में तिनके मैं ये चिड़िया उड़ाना चाहता हूँ लिए बैठा हूँ घुँघरू फूल मोती तिरा हँसना बनाना चाहता हूँ अमीरी इश्क़ की तुम को मुबारक मैं बस खाना-कमाना चाहता हूँ मैं सारे शहर की बैसाखियों को तिरे दर पर नचाना चाहता हूँ मुझे तुम सेे बिछड़ना ही पड़ेगा मैं तुम को याद आना चाहता हूँ
Fahmi Badayuni
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कैसे उस ने ये सब कुछ मुझ सेे छुप कर बदला चेहरा बदला रस्ता बदला बा'द में घर बदला मैं उस के बारे में ये कहता था लोगों से मेरा नाम बदल देना वो शख़्स अगर बदला वो भी ख़ुश था उस ने दिल देकर दिल माँगा है मैं भी ख़ुश हूँ मैं ने पत्थर से पत्थर बदला मैं ने कहा क्या मेरी ख़ातिर ख़ुद को बदलोगे और फिर उस ने नज़रें बदलीं और नंबर बदला
Tehzeeb Hafi
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वो बे-वफ़ा है तो क्या मत कहो बुरा उस को कि जो हुआ सो हुआ ख़ुश रखे ख़ुदा उस को नज़र न आए तो उस की तलाश में रहना कहीं मिले तो पलट कर न देखना उस को वो सादा-ख़ू था ज़माने के ख़म समझता क्या हवा के साथ चला ले उड़ी हवा उस को वो अपने बारे में कितना है ख़ुश-गुमाँ देखो जब उस को मैं भी न देखूँ तो देखना उस को अभी से जाना भी क्या उस की कम-ख़याली पर अभी तो और बहुत होगा सोचना उस को उसे ये धुन कि मुझे कम से कम उदास रखे मिरी दु'आ कि ख़ुदा दे ये हौसला उस को पनाह ढूँढ़ रही है शब-ए-गिरफ़्ता-दिलाँ कोई बताओ मिरे घर का रास्ता उस को ग़ज़ल में तज़्किरा उस का न कर 'नसीर' कि अब भुला चुका वो तुझे तू भी भूल जा उस को
Naseer Turabi
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ख़ामोश लब हैं झुकी हैं पलकें, दिलों में उल्फ़त नई नई है अभी तक़ल्लुफ़ है गुफ़्तगू में, अभी मोहब्बत नई नई है अभी न आएँगी नींद तुम को, अभी न हम को सुकूँ मिलेगा अभी तो धड़केगा दिल ज़ियादा, अभी मुहब्बत नई नई है बहार का आज पहला दिन है, चलो चमन में टहल के आएँ फ़ज़ा में ख़ुशबू नई नई है गुलों में रंगत नई नई है जो ख़ानदानी रईस हैं वो मिज़ाज रखते हैं नर्म अपना तुम्हारा लहजा बता रहा है, तुम्हारी दौलत नई नई है ज़रा सा क़ुदरत ने क्या नवाज़ा के आके बैठे हो पहली सफ़ में अभी क्यूँ उड़ने लगे हवा में अभी तो शोहरत नई नई है बमों की बरसात हो रही है, पुराने जांबाज़ सो रहे हैं ग़ुलाम दुनिया को कर रहा है वो जिस की ताक़त नई नई है
Shabeena Adeeb
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अब के हम बिछड़े तो शायद कभी ख़्वाबों में मिलें जिस तरह सूखे हुए फूल किताबों में मिलें ढूँढ़ उजड़े हुए लोगों में वफ़ा के मोती ये ख़ज़ाने तुझे मुमकिन है ख़राबों में मिलें ग़म-ए-दुनिया भी ग़म-ए-यार में शामिल कर लो नशा बढ़ता है शराबें जो शराबों में मिलें तू ख़ुदा है न मिरा इश्क़ फ़रिश्तों जैसा दोनों इंसाँ हैं तो क्यूँँ इतने हिजाबों में मिलें आज हम दार पे खींचे गए जिन बातों पर क्या अजब कल वो ज़माने को निसाबों में मिलें अब न वो मैं न वो तू है न वो माज़ी है 'फ़राज़' जैसे दो शख़्स तमन्ना के सराबों में मिलें
Ahmad Faraz
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तुम इस ख़राबे में चार छे दिन टहल गई हो सो ऐन-मुमकिन है दिल की हालत बदल गई हो तमाम दिन इस दुआ में कटता है कुछ दिनों से मैं जाऊँ कमरे में तो उदासी निकल गई हो किसी के आने पे ऐसे हलचल हुई है मुझ में ख़मोश जंगल में जैसे बंदूक़ चल गई हो ये न हो गर मैं हिलूँ तो गिरने लगे बुरादा दुखों की दीमक बदन की लकड़ी निगल गई हो ये छोटे छोटे कई हवादिस जो हो रहे हैं किसी के सर से बड़ी मुसीबत न टल गई हो हमारा मलबा हमारे क़दमों में आ गिरा है प्लेट में जैसे मोम-बत्ती पिघल गई हो
Umair Najmi
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मैं ने जो राह ली दुश्वार ज़ियादा निकली मेरे अंदाज़े से हर बार ज़ियादा निकली कोई रौज़न न झरोका न कोई दरवाज़ा मेरी ता'मीर में दीवार ज़ियादा निकली ये मिरी मौत के अस्बाब में लिखा हुआ है ख़ून में इश्क़ की मिक़दार ज़ियादा निकली कितनी जल्दी दिया घर वालों को फल और साया मुझ से तो पेड़ की रफ़्तार ज़ियादा निकली
Umair Najmi
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इक दिन ज़बाँ सुकूत की पूरी बनाऊँगा मैं गुफ़्तुगू को ग़ैर-ज़रूरी बनाऊँगा तस्वीर में बनाऊँगा दोनों के हाथ और दोनों में एक हाथ की दूरी बनाऊँगा मुद्दत समेत जुमला ज़वाबित हों तय-शुदा या'नी तअल्लुक़ात उबूरी बनाऊँगा तुझ को ख़बर न होगी कि मैं आस-पास हूँ इस बार हाज़िरी को हुज़ूरी बनाऊँगा रंगों पे इख़्तियार अगर मिल सका कभी तेरी सियाह पुतलियाँ भूरी बनाऊँगा जारी है अपनी ज़ात पे तहक़ीक़ आज-कल मैं भी ख़ला पे एक थ्योरी बनाऊँगा मैं चाह कर वो शक्ल मुकम्मल न कर सका उस को भी लग रहा था अधूरी बनाऊँगा
Umair Najmi
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खेल दोनों का चले तीन का दाना न पड़े सीढ़ियाँ आती रहें साँप का ख़ाना न पड़े देख में'मार परिंदे भी रहें घर भी बने नक़्शा ऐसा हो कोई पेड़ गिराना न पड़े मेरे होंटों पे किसी लम्स की ख़्वाहिश है शदीद ऐसा कुछ कर मुझे सिगरेट को जलाना न पड़े इस तअल्लुक़ से निकलने का कोई रास्ता दे इस पहाड़ी पे भी बारूद लगाना न पड़े नम की तर्सील से आँखों की हरारत कम हो सर्द-ख़ानों में कोई ख़्वाब पुराना न पड़े रब्त की ख़ैर है बस तेरी अना बच जाए इस तरह जा कि तुझे लौट के आना न पड़े हिज्र ऐसा हो कि चेहरे पे नज़र आ जाए ज़ख़्म ऐसा हो कि दिख जाए दिखाना न पड़े
Umair Najmi
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तुम को वेहशत तो सीखा दी गुजारें लाइक़ और कोई हुक्म कोई काम हमारे लाइक़ माजरत में तो किसी और के मसरफ में हुं ढूंढ देता हु मगर कोई तुम्हारे लाइक़ एक दो ज़ख़्मों की गहराई और आँखों के खंडर और कुछ ख़ास नहीं मुझ में नज़ारे लाइक़ घोंसला छाव हरा रंग समर कुछ भी नहीं देख मुझ जैसे शजर होते है आरे लाइक़ इस इलाक़े में उजालों की जगह कोई नहीं सिर्फ़ परचम है यहाँ चाँद सितारे लाइक़ मुझ निक्क में को चुना उस ने तरस खा के उमेर देखते रह गए हसरत से बेचारे लाइक़
Umair Najmi
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