ghazalKuch Alfaaz

खेल दोनों का चले तीन का दाना न पड़े सीढ़ियाँ आती रहें साँप का ख़ाना न पड़े देख में'मार परिंदे भी रहें घर भी बने नक़्शा ऐसा हो कोई पेड़ गिराना न पड़े मेरे होंटों पे किसी लम्स की ख़्वाहिश है शदीद ऐसा कुछ कर मुझे सिगरेट को जलाना न पड़े इस तअल्लुक़ से निकलने का कोई रास्ता दे इस पहाड़ी पे भी बारूद लगाना न पड़े नम की तर्सील से आँखों की हरारत कम हो सर्द-ख़ानों में कोई ख़्वाब पुराना न पड़े रब्त की ख़ैर है बस तेरी अना बच जाए इस तरह जा कि तुझे लौट के आना न पड़े हिज्र ऐसा हो कि चेहरे पे नज़र आ जाए ज़ख़्म ऐसा हो कि दिख जाए दिखाना न पड़े

Umair Najmi17 Likes

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अब के हम बिछड़े तो शायद कभी ख़्वाबों में मिलें जिस तरह सूखे हुए फूल किताबों में मिलें ढूँढ़ उजड़े हुए लोगों में वफ़ा के मोती ये ख़ज़ाने तुझे मुमकिन है ख़राबों में मिलें ग़म-ए-दुनिया भी ग़म-ए-यार में शामिल कर लो नशा बढ़ता है शराबें जो शराबों में मिलें तू ख़ुदा है न मिरा इश्क़ फ़रिश्तों जैसा दोनों इंसाँ हैं तो क्यूँँ इतने हिजाबों में मिलें आज हम दार पे खींचे गए जिन बातों पर क्या अजब कल वो ज़माने को निसाबों में मिलें अब न वो मैं न वो तू है न वो माज़ी है 'फ़राज़' जैसे दो शख़्स तमन्ना के सराबों में मिलें

Ahmad Faraz

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बे-सबब उस के नाम की मैं ने काट तो ली थी ज़िंदगी मैं ने वो मुझे ख़्वाब में नज़र आया और तस्वीर खींच ली मैं ने आप का काम हो गया आक़ा लाश दरिया में फेंक दी मैं ने खेल तू इस लिए भी हारेगा चाल चलनी है आख़िरी मैं ने एक वो बे-हिजाब और उस पर डाल रक्खी थी रौशनी मैं ने

Zia Mazkoor

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आए दिन मुझ सेे ख़फ़ा रहता है दिल को इक डर सा लगा रहता है सारा दिन प्यार करेगा मुझ सेे जैसे तू घर पे बड़ा रहता है सब सेे कहती है तुम्हारा शाइ'र मेरे पहलू में पड़ा रहता है इश्क़ वो खेल है जिस में हर वक़्त जान का ख़तरा बना रहता है

Kushal Dauneria

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सुना है लोग उसे आँख भर के देखते हैं सो उस के शहर में कुछ दिन ठहर के देखते हैं सुना है रब्त है उस को ख़राब-हालों से सो अपने आप को बर्बाद कर के देखते हैं सुना है दर्द की गाहक है चश्म-ए-नाज़ उस की सो हम भी उस की गली से गुज़र के देखते हैं सुना है उस को भी है शे'र ओ शा'इरी से शग़फ़ सो हम भी मो'जिज़े अपने हुनर के देखते हैं सुना है बोले तो बातों से फूल झड़ते हैं ये बात है तो चलो बात कर के देखते हैं सुना है रात उसे चाँद तकता रहता है सितारे बाम-ए-फ़लक से उतर के देखते हैं सुना है दिन को उसे तितलियाँ सताती हैं सुना है रात को जुगनू ठहर के देखते हैं सुना है हश्र हैं उस की ग़ज़ाल सी आँखें सुना है उस को हिरन दश्त भर के देखते हैं सुना है रात से बढ़ कर हैं काकुलें उस की सुना है शाम को साए गुज़र के देखते हैं सुना है उस की सियह-चश्मगी क़यामत है सो उस को सुरमा-फ़रोश आह भर के देखते हैं सुना है उस के लबों से गुलाब जलते हैं सो हम बहार पे इल्ज़ाम धर के देखते हैं सुना है आइना तिमसाल है जबीं उस की जो सादा दिल हैं उसे बन-सँवर के देखते हैं सुना है जब से हमाइल हैं उस की गर्दन में मिज़ाज और ही लाल ओ गुहर के देखते हैं सुना है चश्म-ए-तसव्वुर से दश्त-ए-इम्काँ में पलंग ज़ाविए उस की कमर के देखते हैं सुना है उस के बदन की तराश ऐसी है कि फूल अपनी क़बाएँ कतर के देखते हैं वो सर्व-क़द है मगर बे-गुल-ए-मुराद नहीं कि उस शजर पे शगूफ़े समर के देखते हैं बस इक निगाह से लुटता है क़ाफ़िला दिल का सो रह-रवान-ए-तमन्ना भी डर के देखते हैं सुना है उस के शबिस्ताँ से मुत्तसिल है बहिश्त मकीं उधर के भी जल्वे इधर के देखते हैं रुके तो गर्दिशें उस का तवाफ़ करती हैं चले तो उस को ज़माने ठहर के देखते हैं किसे नसीब कि बे-पैरहन उसे देखे कभी कभी दर ओ दीवार घर के देखते हैं कहानियाँ ही सही सब मुबालग़े ही सही अगर वो ख़्वाब है ता'बीर कर के देखते हैं अब उस के शहर में ठहरें कि कूच कर जाएँ 'फ़राज़' आओ सितारे सफ़र के देखते हैं

Ahmad Faraz

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जो तेरे साथ रहते हुए सोगवार हो लानत हो ऐसे शख़्स पे और बेशुमार हो अब इतनी देर भी ना लगा, ये हो ना कहीं तू आ चुका हो और तेरा इंतिज़ार हो मैं फूल हूँ तो फिर तेरे बालो में क्यूँ नहीं हूँ तू तीर है तो मेरे कलेजे के पार हो एक आस्तीन चढ़ाने की आदत को छोड़ कर ‘हाफ़ी’ तुम आदमी तो बहुत शानदार हो कब तक किसी से कोई मोहब्बत से पेश आएँ उस को मेरे रवय्ये पर दुख है तो यार हो

Tehzeeb Hafi

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मैं ने जो राह ली दुश्वार ज़ियादा निकली मेरे अंदाज़े से हर बार ज़ियादा निकली कोई रौज़न न झरोका न कोई दरवाज़ा मेरी ता'मीर में दीवार ज़ियादा निकली ये मिरी मौत के अस्बाब में लिखा हुआ है ख़ून में इश्क़ की मिक़दार ज़ियादा निकली कितनी जल्दी दिया घर वालों को फल और साया मुझ से तो पेड़ की रफ़्तार ज़ियादा निकली

Umair Najmi

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इक दिन ज़बाँ सुकूत की पूरी बनाऊँगा मैं गुफ़्तुगू को ग़ैर-ज़रूरी बनाऊँगा तस्वीर में बनाऊँगा दोनों के हाथ और दोनों में एक हाथ की दूरी बनाऊँगा मुद्दत समेत जुमला ज़वाबित हों तय-शुदा या'नी तअल्लुक़ात उबूरी बनाऊँगा तुझ को ख़बर न होगी कि मैं आस-पास हूँ इस बार हाज़िरी को हुज़ूरी बनाऊँगा रंगों पे इख़्तियार अगर मिल सका कभी तेरी सियाह पुतलियाँ भूरी बनाऊँगा जारी है अपनी ज़ात पे तहक़ीक़ आज-कल मैं भी ख़ला पे एक थ्योरी बनाऊँगा मैं चाह कर वो शक्ल मुकम्मल न कर सका उस को भी लग रहा था अधूरी बनाऊँगा

Umair Najmi

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तुम इस ख़राबे में चार छे दिन टहल गई हो सो ऐन-मुमकिन है दिल की हालत बदल गई हो तमाम दिन इस दुआ में कटता है कुछ दिनों से मैं जाऊँ कमरे में तो उदासी निकल गई हो किसी के आने पे ऐसे हलचल हुई है मुझ में ख़मोश जंगल में जैसे बंदूक़ चल गई हो ये न हो गर मैं हिलूँ तो गिरने लगे बुरादा दुखों की दीमक बदन की लकड़ी निगल गई हो ये छोटे छोटे कई हवादिस जो हो रहे हैं किसी के सर से बड़ी मुसीबत न टल गई हो हमारा मलबा हमारे क़दमों में आ गिरा है प्लेट में जैसे मोम-बत्ती पिघल गई हो

Umair Najmi

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हर इक हज़ार में बस पाँच सात हैं हम लोग निसाब-ए-इश्क़ पे वाजिब ज़कात हैं हम लोग दबाओ में भी जमाअत कभी नहीं बदली शुरूअ' दिन से मोहब्बत के साथ हैं हम लोग जो सीखनी हो ज़बान-ए-सुकूत बिस्मिल्लाह ख़मोशियों की मुकम्मल लुग़ात हैं हम लोग कहानियों के वो किरदार जो लिखे न गए ख़बर से हज़्फ़-शुदा वाक़िआ''त हैं हम लोग ये इंतिज़ार हमें देख कर बनाया गया ज़ुहूर-ए-हिज्र से पहले की बात हैं हम लोग किसी को रास्ता दे दें किसी को पानी न दें कहीं पे नील कहीं पर फ़ुरात हैं हम लोग हमें जला के कोई शब गुज़ार सकता है सड़क पे बिखरे हुए काग़ज़ात हैं हम लोग

Umair Najmi

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मैं बरश छोड़ चुका आख़िरी तस्वीर के बा'द मुझ से कुछ बन नहीं पाया तिरी तस्वीर के बा'द मुश्तरक दोस्त भी छूटे हैं तुझे छोड़ने पर या'नी दीवार हटानी पड़ी तस्वीर के बा'द यार तस्वीर में तन्हा हूँ मगर लोग मिले कई तस्वीर से पहले कई तस्वीर के बा'द दूसरा इश्क़ मुयस्सर है मगर करता नहीं कौन देखेगा पुरानी नई तस्वीर के बा'द भेज देता हूँ मगर पहले बता दूँ तुझ को मुझ से मिलता नहीं कोई मिरी तस्वीर के बा'द ख़ुश्क दीवार में सीलन का सबब क्या होगा एक अदद ज़ंग लगी कील थी तस्वीर के बा'द

Umair Najmi

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