इक हुनर है जो कर गया हूँ मैं सब के दिल से उतर गया हूँ मैं कैसे अपनी हँसी को ज़ब्त करूँँ सुन रहा हूँ कि घर गया हूँ मैं क्या बताऊँ कि मर नहीं पाता जीते-जी जब से मर गया हूँ मैं अब है बस अपना सामना दर-पेश हर किसी से गुज़र गया हूँ मैं वही नाज़-ओ-अदा वही ग़म्ज़े सर-ब-सर आप पर गया हूँ मैं अजब इल्ज़ाम हूँ ज़माने का कि यहाँ सब के सर गया हूँ मैं कभी ख़ुद तक पहुँच नहीं पाया जब कि वाँ उम्र भर गया हूँ मैं तुम से जानाँ मिला हूँ जिस दिन से बे-तरह ख़ुद से डर गया हूँ मैं कू-ए-जानाँ में सोग बरपा है कि अचानक सुधर गया हूँ मैं
Related Ghazal
तुम्हें बस ये बताना चाहता हूँ मैं तुम से क्या छुपाना चाहता हूँ कभी मुझ से भी कोई झूठ बोलो मैं हाँ में हाँ मिलाना चाहता हूँ ये जो खिड़की है नक़्शे में तुम्हारे यहाँ मैं दर बनाना चाहता हूँ अदाकारी बहुत दुख दे रही है मैं सच-मुच मुस्कुराना चाहता हूँ परों में तीर है पंजों में तिनके मैं ये चिड़िया उड़ाना चाहता हूँ लिए बैठा हूँ घुँघरू फूल मोती तिरा हँसना बनाना चाहता हूँ अमीरी इश्क़ की तुम को मुबारक मैं बस खाना-कमाना चाहता हूँ मैं सारे शहर की बैसाखियों को तिरे दर पर नचाना चाहता हूँ मुझे तुम सेे बिछड़ना ही पड़ेगा मैं तुम को याद आना चाहता हूँ
Fahmi Badayuni
249 likes
ज़बाँ तो खोल नज़र तो मिला जवाब तो दे मैं कितनी बार लुटा हूँ मुझे हिसाब तो दे तेरे बदन की लिखावट में है उतार चढ़ाव मैं तुझे कैसे पढूँगा मुझे किताब तो दे तेरा सवाल है साक़ी कि ज़िंदगी क्या है? जवाब देता हूँ पहले मुझे शराब तो दे
Rahat Indori
190 likes
चला है सिलसिला कैसा ये रातों को मनाने का तुम्हें हक़ दे दिया किस ने दियों के दिल दुखाने का इरादा छोड़िए अपनी हदों से दूर जाने का ज़माना है ज़माने की निगाहों में न आने का कहाँ की दोस्ती किन दोस्तों की बात करते हो मियाँ दुश्मन नहीं मिलता कोई अब तो ठिकाने का निगाहों में कोई भी दूसरा चेहरा नहीं आया भरोसा ही कुछ ऐसा था तुम्हारे लौट आने का ये मैं ही था बचा के ख़ुद को ले आया किनारे तक समुंदर ने बहुत मौक़ा' दिया था डूब जाने का
Waseem Barelvi
103 likes
सितम ढाते हुए सोचा करोगे हमारे साथ तुम ऐसा करोगे? अँगूठी तो मुझे लौटा रहे हो अँगूठी के निशाँ का क्या करोगे? मैं तुम सेे अब झगड़ता भी नहीं हूँ तो क्या इस बात पर झगड़ा करोगे? मेरा दामन तुम्हीं था में हुए हो मेरा दामन तुम्हीं मैला करोगे बताओ वा'दा कर के आओगे ना? के पिछली बार के जैसा करोगे? वो दुल्हन बन के रुख़्सत हो गई है कहाँ तक कार का पीछा करोगे? मुझे बस यूँँ ही तुम सेे पूछना था अगर मैं मर गया तो क्या करोगे?
Zubair Ali Tabish
140 likes
तेरे पीछे होगी दुनिया पागल बन क्या बोला मैं ने कुछ समझा? पागल बन सहरा में भी ढूँढ़ ले दरिया पागल बन वरना मर जाएगा प्यासा पागल बन आधा दाना आधा पागल नइँ नइँ नइँ उस को पाना है तो पूरा पागल बन दानाई दिखलाने से कुछ हासिल नहीं पागल खाना है ये दुनिया पागल बन देखें तुझ को लोग तो पागल हो जाएँ इतना उम्दा इतना आला पागल बन लोगों से डर लगता है तो घर में बैठ जिगरा है तो मेरे जैसा पागल बन
Varun Anand
81 likes
More from Jaun Elia
अपनी मंज़िल का रास्ता भेजो जान हम को वहाँ बुला भेजो क्या हमारा नहीं रहा सावन ज़ुल्फ़ याँ भी कोई घटा भेजो नई कलियाँ जो अब खिली हैं वहाँ उन की ख़ुश्बू को इक ज़रा भेजो हम न जीते हैं और न मरते हैं दर्द भेजो न तुम दवा भेजो धूल उड़ती है जो उस आँगन में उस को भेजो सबा सबा भेजो ऐ फकीरो गली के उस गुल की तुम हमें अपनी ख़ाक-ए-पा भेजो शफ़क़-ए-शाम-ए-हिज्र के हाथों अपनी उतरी हुई क़बा भेजो कुछ तो रिश्ता है तुम से कम-बख़्तों कुछ नहीं कोई बद-दुआ' भेजो
Jaun Elia
29 likes
बड़ा एहसान हम फ़रमा रहे हैं कि उन के ख़त उन्हें लौटा रहे हैं नहीं तर्क-ए-मोहब्बत पर वो राज़ी क़यामत है कि हम समझा रहे हैं यक़ीं का रास्ता तय करने वाले बहुत तेज़ी से वापस आ रहे हैं ये मत भूलो कि ये लम्हात हम को बिछड़ने के लिए मिलवा रहे हैं तअ'ज्जुब है कि इश्क़-ओ-आशिक़ी से अभी कुछ लोग धोका खा रहे हैं तुम्हें चाहेंगे जब छिन जाओगी तुम अभी हम तुम को अर्ज़ां पा रहे हैं किसी सूरत उन्हें नफ़रत हो हम से हम अपने ऐब ख़ुद गिनवा रहे हैं वो पागल मस्त है अपनी वफ़ा में मिरी आँखों में आँसू आ रहे हैं दलीलों से उसे क़ाइल किया था दलीलें दे के अब पछता रहे हैं तिरी बाँहों से हिजरत करने वाले नए माहौल में घबरा रहे हैं ये जज़्ब-ए-इश्क़ है या जज़्बा-ए-रहम तिरे आँसू मुझे रुलवा रहे हैं अजब कुछ रब्त है तुम से कि तुम को हम अपना जान कर ठुकरा रहे हैं वफ़ा की यादगारें तक न होंगी मिरी जाँ बस कोई दिन जा रहे हैं
Jaun Elia
27 likes
घर से हम घर तलक गए होंगे अपने ही आप तक गए होंगे हम जो अब आदमी हैं पहले कभी जाम होंगे छलक गए होंगे वो भी अब हम से थक गया होगा हम भी अब उस से थक गए होंगे शब जो हम से हुआ मुआ'फ़ करो नहीं पी थी बहक गए होंगे कितने ही लोग हिर्स-ए-शोहरत में दार पर ख़ुद लटक गए होंगे शुक्र है इस निगाह-ए-कम का मियाँ पहले ही हम खटक गए होंगे हम तो अपनी तलाश में अक्सर अज़ समा-ता-समक गए होंगे उस का लश्कर जहां-त हाँ या'नी हम भी बस बे-कुमक गए होंगे 'जौन' अल्लाह और ये आलम बीच में हम अटक गए होंगे
Jaun Elia
20 likes
कोई हालत नहीं ये हालत है ये तो आशोब-नाक सूरत है अंजुमन में ये मेरी ख़ामोशी बुर्दबारी नहीं है वहशत है तुझ से ये गाह-गाह का शिकवा जब तलक है बसा ग़नीमत है ख़्वाहिशें दिल का साथ छोड़ गईं ये अज़िय्यत बड़ी अज़िय्यत है लोग मसरूफ़ जानते हैं मुझे याँ मिरा ग़म ही मेरी फ़ुर्सत है तंज़ पैराया-ए-तबस्सुम में इस तकल्लुफ़ की क्या ज़रूरत है हम ने देखा तो हम ने ये देखा जो नहीं है वो ख़ूब-सूरत है वार करने को जाँ-निसार आएँ ये तो ईसार है 'इनायत है गर्म-जोशी और इस क़दर क्या बात क्या तुम्हें मुझ से कुछ शिकायत है अब निकल आओ अपने अंदर से घर में सामान की ज़रूरत है आज का दिन भी 'ऐश से गुज़रा सर से पा तक बदन सलामत है
Jaun Elia
14 likes
सर ही अब फोड़िए नदामत में नींद आने लगी है फ़ुर्क़त में हैं दलीलें तिरे ख़िलाफ़ मगर सोचता हूँ तिरी हिमायत में रूह ने इश्क़ का फ़रेब दिया जिस्म को जिस्म की अदावत में अब फ़क़त आदतों की वर्ज़िश है रूह शामिल नहीं शिकायत में इश्क़ को दरमियाँ न लाओ कि मैं चीख़ता हूँ बदन की उसरत में ये कुछ आसान तो नहीं है कि हम रूठते अब भी हैं मुरव्वत में वो जो ता'मीर होने वाली थी लग गई आग उस इमारत में ज़िंदगी किस तरह बसर होगी दिल नहीं लग रहा मोहब्बत में हासिल-ए-कुन है ये जहान-ए-ख़राब यही मुमकिन था इतनी उजलत में फिर बनाया ख़ुदा ने आदम को अपनी सूरत पे ऐसी सूरत में और फिर आदमी ने ग़ौर किया छिपकिली की लतीफ़ सनअ'त में ऐ ख़ुदा जो कहीं नहीं मौजूद क्या लिखा है हमारी क़िस्मत में
Jaun Elia
32 likes
Similar Writers
Our suggestions based on Jaun Elia.
Similar Moods
More moods that pair well with Jaun Elia's ghazal.







