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दिल से तिरी निगाह जिगर तक उतर गई दोनों को इक अदा में रज़ा-मंद कर गई शक़ हो गया है सीना ख़ुशा लज़्ज़त-ए-फ़राग़ तकलीफ़-ए-पर्दा-दारी-ए-ज़ख़्म-ए-जिगर गई वो बादा-ए-शबाना की सरमस्तियाँ कहाँ उठिए बस अब कि लज़्ज़त-ए-ख़्वाब-ए-सहर गई उड़ती फिरे है ख़ाक मिरी कू-ए-यार में बारे अब ऐ हवा हवस-ए-बाल-ओ-पर गई देखो तो दिल-फ़रेबी-ए-अंदाज़-ए-नक़्श-ए-पा मौज-ए-ख़िराम-ए-यार भी क्या गुल कतर गई हर बुल-हवस ने हुस्न-परस्ती शिआ'र की अब आबरू-ए-शेवा-ए-अहल-ए-नज़र गई नज़्ज़ारे ने भी काम किया वाँ नक़ाब का मस्ती से हर निगह तिरे रुख़ पर बिखर गई फ़र्दा ओ दी का तफ़रक़ा यक बार मिट गया कल तुम गए कि हम पे क़यामत गुज़र गई मारा ज़माने ने असदुल्लाह ख़ाँ तुम्हें वो वलवले कहाँ वो जवानी किधर गई

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चला है सिलसिला कैसा ये रातों को मनाने का तुम्हें हक़ दे दिया किस ने दियों के दिल दुखाने का इरादा छोड़िए अपनी हदों से दूर जाने का ज़माना है ज़माने की निगाहों में न आने का कहाँ की दोस्ती किन दोस्तों की बात करते हो मियाँ दुश्मन नहीं मिलता कोई अब तो ठिकाने का निगाहों में कोई भी दूसरा चेहरा नहीं आया भरोसा ही कुछ ऐसा था तुम्हारे लौट आने का ये मैं ही था बचा के ख़ुद को ले आया किनारे तक समुंदर ने बहुत मौक़ा' दिया था डूब जाने का

Waseem Barelvi

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सीना दहक रहा हो तो क्या चुप रहे कोई क्यूँँ चीख़ चीख़ कर न गला छील ले कोई साबित हुआ सुकून-ए-दिल-ओ-जाँ कहीं नहीं रिश्तों में ढूँढ़ता है तो ढूँडा करे कोई तर्क-ए-तअल्लुक़ात कोई मसअला नहीं ये तो वो रास्ता है कि बस चल पड़े कोई दीवार जानता था जिसे मैं वो धूल थी अब मुझ को ए'तिमाद की दावत न दे कोई मैं ख़ुद ये चाहता हूँ कि हालात हों ख़राब मेरे ख़िलाफ़ ज़हर उगलता फिरे कोई ऐ शख़्स अब तो मुझ को सभी कुछ क़ुबूल है ये भी क़ुबूल है कि तुझे छीन ले कोई हाँ ठीक है मैं अपनी अना का मरीज़ हूँ आख़िर मेरे मिज़ाज में क्यूँँ दख़्ल दे कोई इक शख़्स कर रहा है अभी तक वफ़ा का ज़िक्र काश उस ज़बाँ-दराज़ का मुँह नोच ले कोई

Jaun Elia

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उसी जगह पर जहाँ कई रास्ते मिलेंगे पलट के आए तो सब सेे पहले तुझे मिलेंगे अगर कभी तेरे नाम पर जंग हो गई तो हम ऐसे बुज़दिल भी पहली सफ़ में खड़े मिलेंगे तुझे ये सड़कें मेरे तवस्सुत से जानती हैं तुझे हमेशा ये सब इशारे खुले मिलेंगे

Tehzeeb Hafi

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चाँद सितारे फूल परिंदे शाम सवेरा एक तरफ़ सारी दुनिया उस का चर्बा उस का चेहरा एक‌ तरफ़ वो लड़कर भी सो जाए तो उस का माथा चूमूँ मैं उस सेे मुहब्बत एक तरफ़ है उस सेे झगड़ा एक तरफ़ जिस शय पर वो उँगली रख दे उस को वो दिलवानी है उस की ख़ुशियाँ सब से अव्वल सस्ता महँगा एक तरफ़ ज़ख़्मों पर मरहम लगवाओ लेकिन उस के हाथों से चारासाज़ी एक तरफ़ है उस का छूना एक तरफ़ सारी दुनिया जो भी बोले सब कुछ शोर शराबा है सब का कहना एक तरफ़ है उस का कहना एक तरफ़ उस ने सारी दुनिया माँगी मैं ने उस को माँगा है उस के सपने एक तरफ़ है मेरा सपना एक तरफ़

Varun Anand

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ये ग़म क्या दिल की आदत है नहीं तो किसी से कुछ शिकायत है नहीं तो है वो इक ख़्वाब-ए-बे-ताबीर उस को भुला देने की निय्यत है नहीं तो किसी के बिन किसी की याद के बिन जिए जाने की हिम्मत है नहीं तो किसी सूरत भी दिल लगता नहीं हाँ तो कुछ दिन से ये हालत है नहीं तो तेरे इस हाल पर है सब को हैरत तुझे भी इस पे हैरत है नहीं तो हम-आहंगी नहीं दुनिया से तेरी तुझे इस पर नदामत है नहीं तो हुआ जो कुछ यही मक़्सूम था क्या यही सारी हिकायत है नहीं तो अज़िय्यत-नाक उम्मीदों से तुझ को अमाँ पाने की हसरत है नहीं तो तू रहता है ख़याल-ओ-ख़्वाब में गुम तो इस की वज्ह फ़ुर्सत है नहीं तो सबब जो इस जुदाई का बना है वो मुझ सेे ख़ूब-सूरत है नहीं तो

Jaun Elia

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रौंदी हुई है कौकबा-ए-शहरयार की इतराए क्यूँँ न ख़ाक सर-ए-रहगुज़ार की जब उस के देखने के लिए आएँ बादशाह लोगों में क्यूँँ नुमूद न हो लाला-ज़ार की भूके नहीं हैं सैर-ए-गुलिस्ताँ के हम वले क्यूँँकर न खाइए कि हवा है बहार की

Mirza Ghalib

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जुज़ क़ैस और कोई न आया ब-रू-ए-कार सहरा मगर ब-तंगी-ए-चश्म-ए-हसूद था आशुफ़्तगी ने नक़्श-ए-सुवैदा किया दुरुस्त ज़ाहिर हुआ कि दाग़ का सरमाया दूद था था ख़्वाब में ख़याल को तुझ से मुआ'मला जब आँख खुल गई न ज़ियाँ था न सूद था लेता हूँ मकतब-ए-ग़म-ए-दिल में सबक़ हनूज़ लेकिन यही कि रफ़्त गया और बूद था ढाँपा कफ़न ने दाग़-ए-उयूब-ए-बरहनगी मैं वर्ना हर लिबास में नंग-ए-वजूद था तेशे बग़ैर मर न सका कोहकन 'असद' सरगश्ता-ए-ख़ुमार-ए-रुसूम-ओ-क़ुयूद था आलम जहाँ ब-अर्ज़-ए-बिसात-ए-वजूद था जूँ सुब्ह चाक-ए-जेब मुझे तार-ओ-पूद था बाज़ी-ख़ुर-ए-फ़रेब है अहल-ए-नज़र का ज़ौक़ हंगामा गर्म-ए-हैरत-ए-बूद-ओ-नबूद था आलम तिलिस्म-ए-शहर-ए-ख़मोशी है सर-बसर या मैं ग़रीब-ए-किश्वर-ए-गुफ़्त-ओ-शुनूद था तंगी रफ़ीक़-ए-रह थी अदम या वजूद था मेरा सफ़र ब-ताला-ए-चश्म-ए-हसूद था तू यक-जहाँ क़माश-ए-हवस जम्अ'' कर कि मैं हैरत-मता-ए-आलम-ए-नुक़्सान-ओ-सूद था गर्दिश-मुहीत-ए-ज़ुल्म रहा जिस क़दर फ़लक मैं पाएमाल-ए-ग़म्ज़ा-ए-चश्म-ए-कबूद था पूछा था गरचे यार ने अहवाल-ए-दिल मगर किस को दिमाग़-ए-मिन्नत-ए-गुफ़्त-ओ-शुनूद था ख़ुर शबनम-आश्ना न हुआ वर्ना मैं 'असद' सर-ता-क़दम गुज़ारिश-ए-ज़ौक़-ए-सुजूद था

Mirza Ghalib

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हम रश्क को अपने भी गवारा नहीं करते मरते हैं वले उन की तमन्ना नहीं करते दर-पर्दा उन्हें ग़ैर से है रब्त-ए-निहानी ज़ाहिर का ये पर्दा है कि पर्दा नहीं करते ये बाइस-ए-नौमीदी-ए-अर्बाब-ए-हवस है 'ग़ालिब' को बुरा कहते हैं अच्छा नहीं करते

Mirza Ghalib

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दिल मिरा सोज़-ए-निहाँ से बे-मुहाबा जल गया आतिश-ए-ख़ामोश की मानिंद गोया जल गया दिल में ज़ौक़-ए-वस्ल ओ याद-ए-यार तक बाक़ी नहीं आग इस घर में लगी ऐसी कि जो था जल गया मैं अदम से भी परे हूँ वर्ना ग़ाफ़िल बार-हा मेरी आह-ए-आतिशीं से बाल-ए-अन्क़ा जल गया अर्ज़ कीजे जौहर-ए-अंदेशा की गर्मी कहाँ कुछ ख़याल आया था वहशत का कि सहरा जल गया दिल नहीं तुझ को दिखाता वर्ना दाग़ों की बहार इस चराग़ाँ का करूँँ क्या कार-फ़रमा जल गया मैं हूँ और अफ़्सुर्दगी की आरज़ू 'ग़ालिब' कि दिल देख कर तर्ज़-ए-तपाक-ए-अहल-ए-दुनिया जल गया ख़ानमान-ए-आशिक़ाँ दुकान-ए-आतिश-बाज़ है शो'ला-रू जब हो गए गर्म-ए-तमाशा जल गया ता कुजा अफ़सोस-ए-गरमी-हा-ए-सोहबत ऐ ख़याल दिल बा-सोज़-ए-आतिश-ए-दाग़-ए-तमन्ना जल गया है 'असद' बेगाना-ए-अफ़्सुर्दगी ऐ बेकसी दिल ज़-अंदाज़-ए-तपाक-ए-अहल-ए-दुनिया जल गया दूद मेरा सुंबुलिस्ताँ से करे है हम-सरी बस-कि शौक़-ए-आतिश-गुल से सरापा जल गया शम्अ-रूयाँ की सर-अंगुश्त-ए-हिनाई देख कर ग़ुंचा-ए-गुल पर-फ़िशाँ परवाना-आसा जल गया

Mirza Ghalib

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कहते तो हो तुम सब कि बुत-ए-ग़ालिया-मू आए यक मर्तबा घबरा के कहो कोई कि वो आए हूँ कशमकश-ए-नज़अ' में हाँ जज़्ब-ए-मोहब्बत कुछ कह न सकूँ पर वो मिरे पूछने को आए है साइक़ा ओ शो'ला ओ सीमाब का आलम आना ही समझ में मिरी आता नहीं गो आए ज़ाहिर है कि घबरा के न भागेंगे नकीरैन हाँ मुँह से मगर बादा-ए-दोशीना की बू आए जल्लाद से डरते हैं न वाइ'ज़ से झगड़ते हम समझे हुए हैं उसे जिस भेस में जो आए हाँ अहल-ए-तलब कौन सुने ताना-ए-ना-याफ़्त देखा कि वो मिलता नहीं अपने ही को खो आए अपना नहीं ये शेवा कि आराम से बैठें उस दर पे नहीं बार तो का'बे ही को हो आए की हम-नफ़सों ने असर-ए-गिर्या में तक़रीर अच्छे रहे आप इस से मगर मुझ को डुबो आए उस अंजुमन-ए-नाज़ की क्या बात है 'ग़ालिब' हम भी गए वाँ और तिरी तक़दीर को रो आए

Mirza Ghalib

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