दिल सी चीज़ के गाहक होंगे दो या एक हज़ार के बीच 'इंशा' जी क्या माल लिए बैठे हो तुम बाज़ार के बीच पीना-पिलाना ऐन गुनह है जी का लगाना ऐन हवस आप की बातें सब सच्ची हैं लेकिन भरी बहार के बीच ऐ सख़ियो ऐ ख़ुश-नज़रो यक गूना करम ख़ैरात करो नारा-ज़नाँ कुछ लोग फिरें हैं सुब्ह से शहर-ए-निगार के बीच ख़ार-ओ-ख़स-ओ-ख़ाशाक तो जानें एक तुझी को ख़बर न मिले ऐ गुल-ए-ख़ूबी हम तो अबस बदनाम हुए गुलज़ार के बीच मिन्नत-ए-क़ासिद कौन उठाए शिकवा-ए-दरबाँ कौन करे नामा-ए-शौक़ ग़ज़ल की सूरत छपने को दो अख़बार के बीच
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चला है सिलसिला कैसा ये रातों को मनाने का तुम्हें हक़ दे दिया किस ने दियों के दिल दुखाने का इरादा छोड़िए अपनी हदों से दूर जाने का ज़माना है ज़माने की निगाहों में न आने का कहाँ की दोस्ती किन दोस्तों की बात करते हो मियाँ दुश्मन नहीं मिलता कोई अब तो ठिकाने का निगाहों में कोई भी दूसरा चेहरा नहीं आया भरोसा ही कुछ ऐसा था तुम्हारे लौट आने का ये मैं ही था बचा के ख़ुद को ले आया किनारे तक समुंदर ने बहुत मौक़ा' दिया था डूब जाने का
Waseem Barelvi
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वैसे मैं ने दुनिया में क्या देखा है तुम कहते हो तो फिर अच्छा देखा है मैं उस को अपनी वहशत तोहफ़े में दूँ हाथ उठाए जिस ने सहरा देखा है बिन देखे उस की तस्वीर बना लूँगा आज तो मैं ने उस को इतना देखा है एक नज़र में मंज़र कब खुलते हैं दोस्त तू ने देखा भी है तो क्या देखा है इश्क़ में बंदा मर भी सकता है मैं ने दिल की दस्तावेज़ में लिखा देखा है मैं तो आँखें देख के ही बतला दूँगा तुम में से किस किस ने दरिया देखा है आगे सीधे हाथ पे एक तराई है मैं ने पहले भी ये रस्ता देखा है तुम को तो इस बाग़ का नाम पता होगा तुम ने तो इस शहर का नक़्शा देखा है
Tehzeeb Hafi
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बिछड़ कर उस का दिल लग भी गया तो क्या लगेगा वो थक जाएगा और मेरे गले से आ लगेगा मैं मुश्किल में तुम्हारे काम आऊँ या ना आऊँ मुझे आवाज़ दे लेना तुम्हें अच्छा लगेगा मैं जिस कोशिश से उस को भूल जाने में लगा हूँ ज़्यादा भी अगर लग जाए तो हफ़्ता लगेगा
Tehzeeb Hafi
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ये सात आठ पड़ोसी कहाँ से आए मेरे तुम्हारे दिल में तो कोई न था सिवाए मेरे किसी ने पास बिठाया बस आगे याद नहीं मुझे तो दोस्त वहाँ से उठा के लाए मेरे ये सोच कर न किए अपने दर्द उस के सुपुर्द वो लालची है असासे न बेच खाए मेरे इधर किधर तू नया है यहाँ कि पागल है किसी ने क्या तुझे क़िस्से नहीं सुनाए मेरे वो आज़माए मेरे दोस्त को ज़रूर मगर उसे कहो कि तरीके न आज़माए मेरे
Umair Najmi
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मुझ सेे मत पूछो कि मुझ को और क्या क्या याद है वो मेरे नज़दीक आया था बस इतना याद है यूँँ तो दश्ते-दिल में कितनों ने क़दम रक्खे मगर भूल जाने पर भी एक नक़्श-ए-कफ़-ए-पा याद है उस बदन की घाटियाँ तक नक़्श हैं दिल पर मेरे कोहसारों से समुंदर तक को दरिया याद है मुझ सेे वो काफ़िर मुसलमाँ तो न हो पाया कभी लेकिन उस को वो तरजु में के साथ क़लमा याद है
Tehzeeb Hafi
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और तो कोई बस न चलेगा हिज्र के दर्द के मारों का सुब्ह का होना दूभर कर दें रस्ता रोक सितारों का झूटे सिक्कों में भी उठा देते हैं ये अक्सर सच्चा माल शक्लें देख के सौदे करना काम है इन बंजारों का अपनी ज़बाँ से कुछ न कहेंगे चुप ही रहेंगे आशिक़ लोग तुम से तो इतना हो सकता है पूछो हाल बेचारों का जिस जिप्सी का ज़िक्र है तुम से दिल को उसी की खोज रही यूँँ तो हमारे शहर में अक्सर मेला लगा निगारों का एक ज़रा सी बात थी जिस का चर्चा पहुँचा गली गली हम गुमनामों ने फिर भी एहसान न माना यारों का दर्द का कहना चीख़ ही उठो दिल का कहना वज़्अ'' निभाओ सब कुछ सहना चुप चुप रहना काम है इज़्ज़त-दारों का 'इंशा' जी अब अजनबियों में चैन से बाक़ी उम्र कटे जिन की ख़ातिर बस्ती छोड़ी नाम न लो उन प्यारों का
Ibn E Insha
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सुनते हैं फिर छुप छुप उन के घर में आते जाते हो 'इंशा' साहब नाहक़ जी को वहशत में उलझाते हो दिल की बात छुपानी मुश्किल लेकिन ख़ूब छुपाते हो बन में दाना शहर के अंदर दीवाने कहलाते हो बेकल बेकल रहते हो पर महफ़िल के आदाब के साथ आँख चुरा कर देख भी लेते भोले भी बन जाते हो पीत में ऐसे लाख जतन हैं लेकिन इक दिन सब नाकाम आप जहाँ में रुस्वा होगे वाज़ हमें फ़रमाते हो हम से नाम जुनूँ का क़ाएम हम से दश्त की आबादी हम से दर्द का शिकवा करते हम को ज़ख़्म दिखाते हो
Ibn E Insha
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हम उन से अगर मिल बैठे हैं क्या दोश हमारा होता है कुछ अपनी जसारत होती है कुछ उन का इशारा होता है कटने लगीं रातें आँखों में देखा नहीं पलकों पर अक्सर या शाम-ए-ग़रीबाँ का जुगनू या सुब्ह का तारा होता है हम दिल को लिए हर देस फिरे इस जिंस के गाहक मिल न सके ऐ बंजारो हम लोग चले हम को तो ख़सारा होता है दफ़्तर से उठे कैफ़े में गए कुछ शे'र कहे कुछ कॉफ़ी पी पूछो जो मआश का 'इंशा'-जी यूँँ अपना गुज़ारा होता है
Ibn E Insha
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अपने हमराह जो आते हो इधर से पहले दश्त पड़ता है मियाँ इश्क़ में घर से पहले चल दिए उठ के सू-ए-शहर-ए-वफ़ा कू-ए-हबीब पूछ लेना था किसी ख़ाक-बसर से पहले इश्क़ पहले भी किया हिज्र का ग़म भी देखा इतने तड़पे हैं न घबराए न तरसे पहले जी बहलता ही नहीं अब कोई साअ'त कोई पल रात ढलती ही नहीं चार पहरस पहले हम किसी दर पे न ठिटके न कहीं दस्तक दी सैकड़ों दर थे मिरी जाँ तिरे दर से पहले चाँद से आँख मिली जी का उजाला जागा हम को सौ बार हुई सुब्ह सहरस पहले
Ibn E Insha
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शाम-ए-ग़म की सहर नहीं होती या हमीं को ख़बर नहीं होती हम ने सब दुख जहाँ के देखे हैं बेकली इस क़दर नहीं होती नाला यूँ ना-रसा नहीं रहता आह यूँ बे-असर नहीं होती चाँद है कहकशाॅं है तारे हैं कोई शय नामा-बर नहीं होती दोस्तो इश्क़ है ख़ता लेकिन क्या ख़ता दर-गुज़र नहीं होती रात आ कर गुज़र भी जाती है इक हमारी सहर नहीं होती बे-क़रारी सही नहीं जाती ज़िंदगी मुख़्तसर नहीं होती एक दिन देखने को आ जाते ये हवस उम्र भर नहीं होती हुस्न सब को ख़ुदा नहीं देता हर किसी की नज़र नहीं होती
Ibn E Insha
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