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और तो कोई बस न चलेगा हिज्र के दर्द के मारों का सुब्ह का होना दूभर कर दें रस्ता रोक सितारों का झूटे सिक्कों में भी उठा देते हैं ये अक्सर सच्चा माल शक्लें देख के सौदे करना काम है इन बंजारों का अपनी ज़बाँ से कुछ न कहेंगे चुप ही रहेंगे आशिक़ लोग तुम से तो इतना हो सकता है पूछो हाल बेचारों का जिस जिप्सी का ज़िक्र है तुम से दिल को उसी की खोज रही यूँँ तो हमारे शहर में अक्सर मेला लगा निगारों का एक ज़रा सी बात थी जिस का चर्चा पहुँचा गली गली हम गुमनामों ने फिर भी एहसान न माना यारों का दर्द का कहना चीख़ ही उठो दिल का कहना वज़्अ'' निभाओ सब कुछ सहना चुप चुप रहना काम है इज़्ज़त-दारों का 'इंशा' जी अब अजनबियों में चैन से बाक़ी उम्र कटे जिन की ख़ातिर बस्ती छोड़ी नाम न लो उन प्यारों का

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वो बे-वफ़ा है तो क्या मत कहो बुरा उस को कि जो हुआ सो हुआ ख़ुश रखे ख़ुदा उस को नज़र न आए तो उस की तलाश में रहना कहीं मिले तो पलट कर न देखना उस को वो सादा-ख़ू था ज़माने के ख़म समझता क्या हवा के साथ चला ले उड़ी हवा उस को वो अपने बारे में कितना है ख़ुश-गुमाँ देखो जब उस को मैं भी न देखूँ तो देखना उस को अभी से जाना भी क्या उस की कम-ख़याली पर अभी तो और बहुत होगा सोचना उस को उसे ये धुन कि मुझे कम से कम उदास रखे मिरी दु'आ कि ख़ुदा दे ये हौसला उस को पनाह ढूँढ़ रही है शब-ए-गिरफ़्ता-दिलाँ कोई बताओ मिरे घर का रास्ता उस को ग़ज़ल में तज़्किरा उस का न कर 'नसीर' कि अब भुला चुका वो तुझे तू भी भूल जा उस को

Naseer Turabi

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ये मैं ने कब कहा कि मेरे हक़ में फ़ैसला करे अगर वो मुझ से ख़ुश नहीं है तो मुझे जुदा करे मैं उस के साथ जिस तरह गुज़ारता हूँ ज़िंदगी उसे तो चाहिए कि मेरा शुक्रिया अदा करे मेरी दुआ है और इक तरह से बद-दुआ भी है ख़ुदा तुम्हें तुम्हारे जैसी बेटियाँ अता करे बना चुका हूँ मैं मोहब्बतों के दर्द की दवा अगर किसी को चाहिए तो मुझ सेे राब्ता करे

Tehzeeb Hafi

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सफ़र में धूप तो होगी जो चल सको तो चलो सभी हैं भीड़ में तुम भी निकल सको तो चलो किसी के वास्ते राहें कहाँ बदलती हैं तुम अपने आप को ख़ुद ही बदल सको तो चलो यहाँ किसी को कोई रास्ता नहीं देता मुझे गिरा के अगर तुम सँभल सको तो चलो कहीं नहीं कोई सूरज धुआँ धुआँ है फ़ज़ा ख़ुद अपने आप से बाहर निकल सको तो चलो यही है ज़िंदगी कुछ ख़्वाब चंद उम्मीदें इन्हीं खिलौनों से तुम भी बहल सको तो चलो

Nida Fazli

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उस के हाथों में जो ख़ंजर है ज़्यादा तेज है और फिर बचपन से ही उस का निशाना तेज है जब कभी उस पार जाने का ख़याल आता मुझे कोई आहिस्ता से कहता था की दरिया तेज है आज मिलना था बिछड़ जाने की निय्यत से हमें आज भी वो देर से पहुँचा है कितना तेज है अपना सब कुछ हार के लौट आए हो न मेरे पास मैं तुम्हें कहता भी रहता की दुनिया तेज है आज उस के गाल चू में हैं तो अंदाज़ा हुआ चाय अच्छी है मगर थोडा सा मीठा तेज है

Tehzeeb Hafi

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वो मुँह लगाता है जब कोई काम होता है जो उस का होता है समझो ग़ुलाम होता है किसी का हो के दुबारा न आना मेरी तरफ़ मोहब्बतों में हलाला हराम होता है इसे भी गिनते हैं हम लोग अहल-ए-ख़ाना में हमारे याँ तो शजर का भी नाम होता है तुझ ऐसे शख़्स के होते हैं ख़ास दोस्त बहुत तुझ ऐसा शख़्स बहुत जल्द आम होता है कभी लगी है तुम्हें कोई शाम आख़िरी शाम हमारे साथ ये हर एक शाम होता है

Umair Najmi

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अपने हमराह जो आते हो इधर से पहले दश्त पड़ता है मियाँ इश्क़ में घर से पहले चल दिए उठ के सू-ए-शहर-ए-वफ़ा कू-ए-हबीब पूछ लेना था किसी ख़ाक-बसर से पहले इश्क़ पहले भी किया हिज्र का ग़म भी देखा इतने तड़पे हैं न घबराए न तरसे पहले जी बहलता ही नहीं अब कोई साअ'त कोई पल रात ढलती ही नहीं चार पहरस पहले हम किसी दर पे न ठिटके न कहीं दस्तक दी सैकड़ों दर थे मिरी जाँ तिरे दर से पहले चाँद से आँख मिली जी का उजाला जागा हम को सौ बार हुई सुब्ह सहरस पहले

Ibn E Insha

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रात के ख़्वाब सुनाएँ किस को रात के ख़्वाब सुहाने थे धुँदले धुँदले चेहरे थे पर सब जाने-पहचाने थे ज़िद्दी वहशी अल्हड़ चंचल मीठे लोग रसीले लोग होंट उन के ग़ज़लों के मिसरे आँखों में अफ़्साने थे वहशत का उनवान हमारी उन में से जो नार बनी देखेंगे तो लोग कहेंगे 'इंशा'-जी दीवाने थे ये लड़की तो इन गलियों में रोज़ ही घूमा करती थी इस से उन को मिलना था तो इस के लाख बहाने थे हम को सारी रात जगाया जलते बुझते तारों ने हम क्यूँँ उन के दर पर उतरे कितने और ठिकाने थे

Ibn E Insha

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हम उन से अगर मिल बैठे हैं क्या दोश हमारा होता है कुछ अपनी जसारत होती है कुछ उन का इशारा होता है कटने लगीं रातें आँखों में देखा नहीं पलकों पर अक्सर या शाम-ए-ग़रीबाँ का जुगनू या सुब्ह का तारा होता है हम दिल को लिए हर देस फिरे इस जिंस के गाहक मिल न सके ऐ बंजारो हम लोग चले हम को तो ख़सारा होता है दफ़्तर से उठे कैफ़े में गए कुछ शे'र कहे कुछ कॉफ़ी पी पूछो जो मआश का 'इंशा'-जी यूँँ अपना गुज़ारा होता है

Ibn E Insha

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दिल इश्क़ में बे-पायाँ सौदा हो तो ऐसा हो दरिया हो तो ऐसा हो सहरा हो तो ऐसा हो इक ख़ाल-ए-सुवैदा में पहनाई-ए-दो-आलम फैला हो तो ऐसा हो सिमटा हो तो ऐसा हो ऐ क़ैस-ए-जुनूँ-पेशा 'इंशा' को कभी देखा वहशी हो तो ऐसा हो रुस्वा हो तो ऐसा हो दरिया ब-हुबाब-अंदर तूफ़ाँ ब-सहाब-अंदर महशर ब-हिजाब-अंदर होना हो तो ऐसा हो हम से नहीं रिश्ता भी हम से नहीं मिलता भी है पास वो बैठा भी धोका हो तो ऐसा हो वो भी रहा बेगाना हम ने भी न पहचाना हाँ ऐ दिल-ए-दीवाना अपना हो तो ऐसा हो इस दर्द में क्या क्या है रुस्वाई भी लज़्ज़त भी काँटा हो तो ऐसा हो चुभता हो तो ऐसा हो हम ने यही माँगा था उस ने यही बख़्शा है बंदा हो तो ऐसा हो दाता हो तो ऐसा हो

Ibn E Insha

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जोग बिजोग की बातें झूठी सब जी का बहलाना हो फिर भी हम से जाते जाते एक ग़ज़ल सुन जाना हो सारी दुनिया अक्ल की बैरी कौन यहाँ पर सयाना हो नाहक़ नाम धरें सब हम को दीवाना दीवाना हो तुम ने तो इक रीत बना ली सुन लेना शर्माना हो सब का एक न एक ठिकाना अपना कौन ठिकाना हो नगरी नगरी लाखों द्वारे हर द्वारे पर लाख सुखी लेकिन जब हम भूल चुके हैं दामन का फैलाना हो तेरे ये क्या जी में आई खींच लिए शर्मा कर होंठ हम को ज़हर पिलाने वाली अमृत भी पिलवाना हो हम भी झूठे तुम भी झूठे एक इसी का सच्चा नाम जिस से दीपक जलना सीखा परवाना मर जाना हो सीधे मन को आन दबोचे मीठी बातें सुंदर लोग 'मीर', 'नज़ीर', 'कबीर', और 'इंशा' सब का एक घराना हो

Ibn E Insha

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