ghazalKuch Alfaaz

दिल इश्क़ में बे-पायाँ सौदा हो तो ऐसा हो दरिया हो तो ऐसा हो सहरा हो तो ऐसा हो इक ख़ाल-ए-सुवैदा में पहनाई-ए-दो-आलम फैला हो तो ऐसा हो सिमटा हो तो ऐसा हो ऐ क़ैस-ए-जुनूँ-पेशा 'इंशा' को कभी देखा वहशी हो तो ऐसा हो रुस्वा हो तो ऐसा हो दरिया ब-हुबाब-अंदर तूफ़ाँ ब-सहाब-अंदर महशर ब-हिजाब-अंदर होना हो तो ऐसा हो हम से नहीं रिश्ता भी हम से नहीं मिलता भी है पास वो बैठा भी धोका हो तो ऐसा हो वो भी रहा बेगाना हम ने भी न पहचाना हाँ ऐ दिल-ए-दीवाना अपना हो तो ऐसा हो इस दर्द में क्या क्या है रुस्वाई भी लज़्ज़त भी काँटा हो तो ऐसा हो चुभता हो तो ऐसा हो हम ने यही माँगा था उस ने यही बख़्शा है बंदा हो तो ऐसा हो दाता हो तो ऐसा हो

Related Ghazal

उसी जगह पर जहाँ कई रास्ते मिलेंगे पलट के आए तो सब सेे पहले तुझे मिलेंगे अगर कभी तेरे नाम पर जंग हो गई तो हम ऐसे बुज़दिल भी पहली सफ़ में खड़े मिलेंगे तुझे ये सड़कें मेरे तवस्सुत से जानती हैं तुझे हमेशा ये सब इशारे खुले मिलेंगे

Tehzeeb Hafi

465 likes

यही अपनी कहानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले वो लड़की जाँ हमारी थी, मियाँ पहले बहुत पहले वहम मुझ को ये भाता है,अभी मेरी दिवानी है मगर मेरी दिवानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले रक़ीब आ कर बताते हैं यहाँ तिल है, वहाँ तिल है हमें ये जानकारी थी मियाँ पहले, बहुत पहले अदब से माँग कर माफ़ी भरी महफ़िल ये कहता हूँ वो लड़की ख़ानदानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले

Anand Raj Singh

526 likes

चाँद सितारे फूल परिंदे शाम सवेरा एक तरफ़ सारी दुनिया उस का चर्बा उस का चेहरा एक‌ तरफ़ वो लड़कर भी सो जाए तो उस का माथा चूमूँ मैं उस सेे मुहब्बत एक तरफ़ है उस सेे झगड़ा एक तरफ़ जिस शय पर वो उँगली रख दे उस को वो दिलवानी है उस की ख़ुशियाँ सब से अव्वल सस्ता महँगा एक तरफ़ ज़ख़्मों पर मरहम लगवाओ लेकिन उस के हाथों से चारासाज़ी एक तरफ़ है उस का छूना एक तरफ़ सारी दुनिया जो भी बोले सब कुछ शोर शराबा है सब का कहना एक तरफ़ है उस का कहना एक तरफ़ उस ने सारी दुनिया माँगी मैं ने उस को माँगा है उस के सपने एक तरफ़ है मेरा सपना एक तरफ़

Varun Anand

406 likes

ये ग़म क्या दिल की आदत है नहीं तो किसी से कुछ शिकायत है नहीं तो है वो इक ख़्वाब-ए-बे-ताबीर उस को भुला देने की निय्यत है नहीं तो किसी के बिन किसी की याद के बिन जिए जाने की हिम्मत है नहीं तो किसी सूरत भी दिल लगता नहीं हाँ तो कुछ दिन से ये हालत है नहीं तो तेरे इस हाल पर है सब को हैरत तुझे भी इस पे हैरत है नहीं तो हम-आहंगी नहीं दुनिया से तेरी तुझे इस पर नदामत है नहीं तो हुआ जो कुछ यही मक़्सूम था क्या यही सारी हिकायत है नहीं तो अज़िय्यत-नाक उम्मीदों से तुझ को अमाँ पाने की हसरत है नहीं तो तू रहता है ख़याल-ओ-ख़्वाब में गुम तो इस की वज्ह फ़ुर्सत है नहीं तो सबब जो इस जुदाई का बना है वो मुझ सेे ख़ूब-सूरत है नहीं तो

Jaun Elia

355 likes

मेरे बस में नहीं वरना क़ुदरत का लिखा हुआ काटता तेरे हिस्से में आए बुरे दिन कोई दूसरा काटता लारियों से ज़्यादा बहाव था तेरे हर इक लफ्ज़ में मैं इशारा नहीं काट सकता तेरी बात क्या काटता मैं ने भी ज़िंदगी और शब ए हिज्र काटी है सबकी तरह वैसे बेहतर तो ये था के मैं कम से कम कुछ नया काटता तेरे होते हुए मोमबत्ती बुझाई किसी और ने क्या ख़ुशी रह गई थी जन्मदिन की, मैं केक क्या काटता कोई भी तो नहीं जो मेरे भूखे रहने पे नाराज़ हो जेल में तेरी तस्वीर होती तो हँसकर सज़ा काटता

Tehzeeb Hafi

456 likes

More from Ibn E Insha

और तो कोई बस न चलेगा हिज्र के दर्द के मारों का सुब्ह का होना दूभर कर दें रस्ता रोक सितारों का झूटे सिक्कों में भी उठा देते हैं ये अक्सर सच्चा माल शक्लें देख के सौदे करना काम है इन बंजारों का अपनी ज़बाँ से कुछ न कहेंगे चुप ही रहेंगे आशिक़ लोग तुम से तो इतना हो सकता है पूछो हाल बेचारों का जिस जिप्सी का ज़िक्र है तुम से दिल को उसी की खोज रही यूँँ तो हमारे शहर में अक्सर मेला लगा निगारों का एक ज़रा सी बात थी जिस का चर्चा पहुँचा गली गली हम गुमनामों ने फिर भी एहसान न माना यारों का दर्द का कहना चीख़ ही उठो दिल का कहना वज़्अ'' निभाओ सब कुछ सहना चुप चुप रहना काम है इज़्ज़त-दारों का 'इंशा' जी अब अजनबियों में चैन से बाक़ी उम्र कटे जिन की ख़ातिर बस्ती छोड़ी नाम न लो उन प्यारों का

Ibn E Insha

0 likes

हम उन से अगर मिल बैठे हैं क्या दोश हमारा होता है कुछ अपनी जसारत होती है कुछ उन का इशारा होता है कटने लगीं रातें आँखों में देखा नहीं पलकों पर अक्सर या शाम-ए-ग़रीबाँ का जुगनू या सुब्ह का तारा होता है हम दिल को लिए हर देस फिरे इस जिंस के गाहक मिल न सके ऐ बंजारो हम लोग चले हम को तो ख़सारा होता है दफ़्तर से उठे कैफ़े में गए कुछ शे'र कहे कुछ कॉफ़ी पी पूछो जो मआश का 'इंशा'-जी यूँँ अपना गुज़ारा होता है

Ibn E Insha

0 likes

रात के ख़्वाब सुनाएँ किस को रात के ख़्वाब सुहाने थे धुँदले धुँदले चेहरे थे पर सब जाने-पहचाने थे ज़िद्दी वहशी अल्हड़ चंचल मीठे लोग रसीले लोग होंट उन के ग़ज़लों के मिसरे आँखों में अफ़्साने थे वहशत का उनवान हमारी उन में से जो नार बनी देखेंगे तो लोग कहेंगे 'इंशा'-जी दीवाने थे ये लड़की तो इन गलियों में रोज़ ही घूमा करती थी इस से उन को मिलना था तो इस के लाख बहाने थे हम को सारी रात जगाया जलते बुझते तारों ने हम क्यूँँ उन के दर पर उतरे कितने और ठिकाने थे

Ibn E Insha

2 likes

उस शाम वो रुख़्सत का समाँ याद रहेगा वो शहर वो कूचा वो मकाँ याद रहेगा वो टीस कि उभरी थी इधर याद रहेगी वो दर्द कि उट्ठा था यहाँ याद रहेगा हम शौक़ के शो'ले की लपक भूल भी जाएँ वो शम-ए-फ़सुर्दा का धुआँ याद रहेगा हाँ बज़्म-ए-शबाना में हमा-शौक़ जो उस दिन हम थे तिरी जानिब निगराँ याद रहेगा कुछ 'मीर' के अबयात थे कुछ 'फ़ैज़' के मिसरे इक दर्द का था जिन में बयाँ याद रहेगा आँखों में सुलगती हुई वहशत के जिलौ में वो हैरत ओ हसरत का जहाँ याद रहेगा जाँ-बख़्श सी उस बर्ग-ए-गुल-ए-तर की तरावत वो लम्स-ए-अज़ीज़-ए-दो-जहाँ याद रहेगा हम भूल सके हैं न तुझे भूल सकेंगे तू याद रहेगा हमें हाँ याद रहेगा

Ibn E Insha

0 likes

उस शाम वो रुख़्सत का समाँ याद रहेगा वो शहर वो कूचा वो मकाँ याद रहेगा वो टीस कि उभरी थी इधर याद रहेगी वो दर्द कि उट्ठा था यहाँ याद रहेगा हम शौक़ के शो'ले की लपक भूल भी जाएँ वो शम-ए-फ़सुर्दा का धुआँ याद रहेगा हाँ बज़्म-ए-शबाना में हमा-शौक़ जो उस दिन हम थे तिरी जानिब निगराँ याद रहेगा कुछ 'मीर' के अबयात थे कुछ 'फ़ैज़' के मिसरे इक दर्द का था जिन में बयाँ याद रहेगा आँखों में सुलगती हुई वहशत के जिलौ में वो हैरत ओ हसरत का जहाँ याद रहेगा जाँ-बख़्श सी उस बर्ग-ए-गुल-ए-तर की तरावत वो लम्स-ए-अज़ीज़-ए-दो-जहाँ याद रहेगा हम भूल सके हैं न तुझे भूल सकेंगे तू याद रहेगा हमें हाँ याद रहेगा

Ibn E Insha

1 likes

Similar Writers

View All ›

Our suggestions based on Ibn E Insha.

Similar Moods

View All ›

More moods that pair well with Ibn E Insha's ghazal.