उस के हाथों में जो ख़ंजर है ज़्यादा तेज है और फिर बचपन से ही उस का निशाना तेज है जब कभी उस पार जाने का ख़याल आता मुझे कोई आहिस्ता से कहता था की दरिया तेज है आज मिलना था बिछड़ जाने की निय्यत से हमें आज भी वो देर से पहुँचा है कितना तेज है अपना सब कुछ हार के लौट आए हो न मेरे पास मैं तुम्हें कहता भी रहता की दुनिया तेज है आज उस के गाल चू में हैं तो अंदाज़ा हुआ चाय अच्छी है मगर थोडा सा मीठा तेज है
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उसी जगह पर जहाँ कई रास्ते मिलेंगे पलट के आए तो सब सेे पहले तुझे मिलेंगे अगर कभी तेरे नाम पर जंग हो गई तो हम ऐसे बुज़दिल भी पहली सफ़ में खड़े मिलेंगे तुझे ये सड़कें मेरे तवस्सुत से जानती हैं तुझे हमेशा ये सब इशारे खुले मिलेंगे
Tehzeeb Hafi
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यही अपनी कहानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले वो लड़की जाँ हमारी थी, मियाँ पहले बहुत पहले वहम मुझ को ये भाता है,अभी मेरी दिवानी है मगर मेरी दिवानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले रक़ीब आ कर बताते हैं यहाँ तिल है, वहाँ तिल है हमें ये जानकारी थी मियाँ पहले, बहुत पहले अदब से माँग कर माफ़ी भरी महफ़िल ये कहता हूँ वो लड़की ख़ानदानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले
Anand Raj Singh
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क्यूँँ डरें ज़िन्दगी में क्या होगा कुछ न होगा तो तजरबा होगा हँसती आँखों में झाँक कर देखो कोई आँसू कहीं छुपा होगा इन दिनों ना-उमीद सा हूँ मैं शायद उस ने भी ये सुना होगा देख कर तुम को सोचता हूँ मैं क्या किसी ने तुम्हें छुआ होगा
Javed Akhtar
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मेरे बस में नहीं वरना क़ुदरत का लिखा हुआ काटता तेरे हिस्से में आए बुरे दिन कोई दूसरा काटता लारियों से ज़्यादा बहाव था तेरे हर इक लफ्ज़ में मैं इशारा नहीं काट सकता तेरी बात क्या काटता मैं ने भी ज़िंदगी और शब ए हिज्र काटी है सबकी तरह वैसे बेहतर तो ये था के मैं कम से कम कुछ नया काटता तेरे होते हुए मोमबत्ती बुझाई किसी और ने क्या ख़ुशी रह गई थी जन्मदिन की, मैं केक क्या काटता कोई भी तो नहीं जो मेरे भूखे रहने पे नाराज़ हो जेल में तेरी तस्वीर होती तो हँसकर सज़ा काटता
Tehzeeb Hafi
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चाँद सितारे फूल परिंदे शाम सवेरा एक तरफ़ सारी दुनिया उस का चर्बा उस का चेहरा एक तरफ़ वो लड़कर भी सो जाए तो उस का माथा चूमूँ मैं उस सेे मुहब्बत एक तरफ़ है उस सेे झगड़ा एक तरफ़ जिस शय पर वो उँगली रख दे उस को वो दिलवानी है उस की ख़ुशियाँ सब से अव्वल सस्ता महँगा एक तरफ़ ज़ख़्मों पर मरहम लगवाओ लेकिन उस के हाथों से चारासाज़ी एक तरफ़ है उस का छूना एक तरफ़ सारी दुनिया जो भी बोले सब कुछ शोर शराबा है सब का कहना एक तरफ़ है उस का कहना एक तरफ़ उस ने सारी दुनिया माँगी मैं ने उस को माँगा है उस के सपने एक तरफ़ है मेरा सपना एक तरफ़
Varun Anand
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अश्क ज़ाया' हो रहे थे देख कर रोता न था जिस जगह बनता था रोना मैं उधर रोता न था सिर्फ़ तेरी चुप ने मेरे गाल गीले कर दिए मैं तो वो हूँ जो किसी की मौत पर रोता न था मुझ पे कितने सानिहे गुज़रे पर उन आँखों को क्या मेरा दुख ये हैं कि मेरा हम सफ़र रोता न था मैं ने उस के वस्ल में भी हिज्र काटा है कहीं वो मेरे काँधे पे रख लेता था सर रोता न था प्यार तो पहले भी उस सेे था मगर इतना नहीं तब मैं उस को छू तो लेता था मगर रोता न था गिर्या-ओ-ज़ारी को भी इक ख़ास मौसम चाहिए मेरी आँखें देख लो मैं वक़्त पर रोता न था
Tehzeeb Hafi
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अश्क ज़ाएअ'' हो रहे थे देख कर रोता न था जिस जगह बनता था रोना मैं उधर रोता न था सिर्फ़ तेरी चुप ने मेरे गाल गीले कर दिए मैं तो वो हूँ जो किसी की मौत पर रोता न था मुझ पे कितने सानहे गुज़रे पर इन आँखों को क्या मेरा दुख ये है कि मेरा हम-सफ़र रोता न था मैं ने उस के वस्ल में भी हिज्र काटा है कहीं वो मिरे काँधे पे रख लेता था सर रोता न था प्यार तो पहले भी उस से था मगर इतना नहीं तब मैं उस को छू तो लेता था मगर रोता न था गिर्या-ओ-ज़ारी को भी इक ख़ास मौसम चाहिए मेरी आँखें देख लो मैं वक़्त पर रोता न था
Tehzeeb Hafi
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जब उस की तस्वीर बनाया करता था कमरा रंगों से भर जाया करता था पेड़ मुझे हसरत से देखा करते थे मैं जंगल में पानी लाया करता था थक जाता था बादल साया करते करते और फिर मैं बादल पे साया करता था बैठा रहता था साहिल पे सारा दिन दरिया मुझ से जान छुड़ाया करता था बिंत-ए-सहरा रूठा करती थी मुझ से मैं सहरा से रेत चुराया करता था
Tehzeeb Hafi
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आज जिन झीलों का बस काग़ज़ में नक़्शा रह गया एक मुद्दत तक मैं उन आँखों से बहता रह गया मैं उसे ना-क़ाबिल-ए-बर्दाश्त समझा था मगर वो मेरे दिल में रहा और अच्छा ख़ासा रह गया वो जो आधे थे तुझे मिल कर मुक़म्मल हो गए जो मुक़म्मल था वो तेरे ग़म में आधा रह गया
Tehzeeb Hafi
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मौसमों के तग़य्युर को भाँपा नहीं छतरियाँ खोल दीं ज़ख़्म भरने से पहले किसी ने मिरी पट्टियाँ खोल दीं हम मछेरों से पूछो समुंदर नहीं है ये इफ़रीत है तुम ने क्या सोच कर साहिलों से बँधी कश्तियाँ खोल दीं उस ने वा'दों के पर्बत से लटके हुओं को सहारा दिया उस की आवाज़ पर कोह-पैमाओं ने रस्सियाँ खोल दीं दश्त-ए-ग़ुर्बत में मैं और मिरा यार-ए-शब-ज़ाद बाहम मिले यार के पास जो कुछ भी था यार ने गठरियाँ खोल दीं कुछ बरस तो तिरी याद की रेल दिल से गुज़रती रही और फिर मैं ने थक हार के एक दिन पटरियाँ खोल दीं उस ने सहराओं की सैर करते हुए इक शजर के तले अपनी आँखों से ऐनक उतारी कि दो हिरनियाँ खोल दीं आज हम कर चुके अहद-ए-तर्क-ए-सुख़न पर रक़म दस्तख़त आज हम ने नए शाइ'रों के लिए भर्तियाँ खोल दीं
Tehzeeb Hafi
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