दीवार याद आ गई दर याद आ गया दो गाम ही चले थे कि घर याद आ गया कुछ कहना चाहते थे कि ख़ामोश हो गए दस्तार याद आ गई सर याद आ गया दुनिया की बे-रुख़ी का गिला कर रहे थे लोग हम को तिरा तपाक मगर याद आ गया फिर तीरगी-ए-राहगुज़र याद आ गई फिर वो चराग़-ए-राहगुज़र याद आ गया 'अजमल'-सिराज हम उसे भूल हुए तो हैं क्या जाने क्या करेंगे अगर याद आ गया
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ये ग़म क्या दिल की आदत है नहीं तो किसी से कुछ शिकायत है नहीं तो है वो इक ख़्वाब-ए-बे-ताबीर उस को भुला देने की निय्यत है नहीं तो किसी के बिन किसी की याद के बिन जिए जाने की हिम्मत है नहीं तो किसी सूरत भी दिल लगता नहीं हाँ तो कुछ दिन से ये हालत है नहीं तो तेरे इस हाल पर है सब को हैरत तुझे भी इस पे हैरत है नहीं तो हम-आहंगी नहीं दुनिया से तेरी तुझे इस पर नदामत है नहीं तो हुआ जो कुछ यही मक़्सूम था क्या यही सारी हिकायत है नहीं तो अज़िय्यत-नाक उम्मीदों से तुझ को अमाँ पाने की हसरत है नहीं तो तू रहता है ख़याल-ओ-ख़्वाब में गुम तो इस की वज्ह फ़ुर्सत है नहीं तो सबब जो इस जुदाई का बना है वो मुझ सेे ख़ूब-सूरत है नहीं तो
Jaun Elia
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मेरे बस में नहीं वरना क़ुदरत का लिखा हुआ काटता तेरे हिस्से में आए बुरे दिन कोई दूसरा काटता लारियों से ज़्यादा बहाव था तेरे हर इक लफ्ज़ में मैं इशारा नहीं काट सकता तेरी बात क्या काटता मैं ने भी ज़िंदगी और शब ए हिज्र काटी है सबकी तरह वैसे बेहतर तो ये था के मैं कम से कम कुछ नया काटता तेरे होते हुए मोमबत्ती बुझाई किसी और ने क्या ख़ुशी रह गई थी जन्मदिन की, मैं केक क्या काटता कोई भी तो नहीं जो मेरे भूखे रहने पे नाराज़ हो जेल में तेरी तस्वीर होती तो हँसकर सज़ा काटता
Tehzeeb Hafi
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तेरी मुश्किल न बढ़ाऊँगा चला जाऊँगा अश्क आँखों में छुपाऊँगा चला जाऊँगा अपनी दहलीज़ पे कुछ देर पड़ा रहने दे जैसे ही होश में आऊँगा चला जाऊँगा ख़्वाब लेने कोई आए कि न आए कोई मैं तो आवाज़ लगाऊँगा चला जाऊँगा चंद यादें मुझे बच्चों की तरह प्यारी हैं उन को सीने से लगाऊँगा चला जाऊँगा मुद्दतों बा'द मैं आया हूँ पुराने घर में ख़ुद को जी भर के रुलाऊँगा चला जाऊँगा इस जज़ीरे में ज़ियादा नहीं रहना अब तो आजकल नाव बनाऊँगा चला जाऊँगा मौसम-ए-गुल की तरह लौट के आऊँगा 'हसन' हर तरफ़ फूल खिलाऊँगा चला जाऊँगा
Hasan Abbasi
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बात करनी है बात कौन करे दर्द से दो दो हाथ कौन करे हम सितारे तुम्हें बुलाते हैं चाँद न हो तो रात कौन करे अब तुझे रब कहें या बुत समझें इश्क़ में ज़ात-पात कौन करे ज़िंदगी भर की थे कमाई तुम इस से ज़्यादा ज़कात कौन करे
Kumar Vishwas
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बस इक उसी पे तो पूरी तरह अयाॅं हूँ मैं वो कह रहा है मुझे रायगाॅं तो हाँ हूँ मैं जिसे दिखाई दूँ मेरी तरफ़ इशारा करे मुझे दिखाई नहीं दे रहा कहाॅं हूँ मैं इधर-उधर से नमी का रिसाव रहता है सड़क से नीचे बनाया गया मकाॅं हूँ मैं किसी ने पूछा कि तुम कौन हो तो भूल गया अभी किसी ने बताया तो था फ़लाॅं हूँ मैं मैं ख़ुद को तुझ से मिटाऊॅंगा एहतियात के साथ तू बस निशान लगा दे जहाॅं जहाॅं हूँ मैं मैं किस से पूछूॅं ये रस्ता दुरुस्त है कि ग़लत जहाॅं से कोई गुज़रता नहीं वहाॅं हूँ मैं
Umair Najmi
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बुझ गया रात वो सितारा भी हाल अच्छा नहीं हमारा भी ये जो हम खोए खोए रहते हैं इस में कुछ दख़्ल है तुम्हारा भी डूबना ज़ात के समुंदर में है ये तूफ़ान भी किनारा भी अब मुझे नींद ही नहीं आती ख़्वाब है ख़्वाब का सहारा भी लोग जीते हैं किस तरह 'अजमल' हम से होता नहीं गुज़ारा भी
Ajmal Siraj
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तेरे सिवा किसी की तमन्ना करूँँगा मैं ऐसा कभी हुआ है जो ऐसा करूँँगा मैं गो ग़म अज़ीज़ है मुझे तेरे फ़िराक़ का फिर भी इस इम्तिहान का शिकवा करूँँगा मैं आँखों को अश्क ओ ख़ूँ भी फ़राहम करूँँगा मैं दिल के लिए भी दर्द मुहय्या करूँँगा मैं राहत भी रंज, रंज भी राहत हो जब तो फिर क्या एतिबार-ए-ख़्वाहिश-ए-दुनिया करूँँगा मैं रक्खा है क्या जहान में ये और बात है ये और बात है कि तक़ाज़ा करूँँगा मैं ये रहगुज़र कि जा-ए-क़याम-ओ-क़रार थी या'नी अब उस गली से भी गुज़रा करूँँगा मैं या'नी कुछ इस तरह कि तुझे भी ख़बर न हो इस एहतियात से तुझे देखा करूँँगा मैं है देखने की चीज़ तो ये इल्तिफ़ात भी देखोगे तुम गुरेज़ भी ऐसा करूँँगा मैं हैरान ओ दिल-शिकस्ता हूँ इस हाल-ए-ज़ार पर कब जानता था अपना तमाशा करूँँगा मैं हाँ खींच लूँगा वक़्त की ज़ंजीर पाँव से अब के बहार आई तो ऐसा करूँँगा मैं
Ajmal Siraj
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शाम अपनी बे-मज़ा जाती है रोज़ और सितम ये है कि आ जाती है रोज़ कोई दिन आसाँ नहीं जाता मिरा कोई मुश्किल आज़मा जाती है रोज़ मुझ से पूछे कोई क्या है ज़िंदगी मेरे सर से ये बला जाती है रोज़ जाने किस की सुर्ख़-रूई के लिए ख़ूँ में ये धरती नहा जाती है रोज़ गीत गाते हैं परिंदे सुब्ह ओ शाम या समाअ'त चहचहा जाती है रोज़ देखने वालों को 'अजमल' ज़िंदगी रंग कितने ही दिखा जाती है रोज़
Ajmal Siraj
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क्या कहेगा कभी मिलने भी अगर आएगा वो अब वफ़ादारी की क़स्में तो नहीं खाएगा वो हम समझते थे कि हम उस को भुला सकते हैं वो समझता था हमें भूल नहीं पाएगा वो कितना सोचा था पर इतना तो नहीं सोचा था याद बन जाएगा वो ख़्वाब नज़र आएगा वो सब के होते हुए इक रोज़ वो तन्हा होगा फिर वो ढूँढेगा हमें और नहीं पाएगा वो इत्तिफ़ाक़न जो कभी सामने आया 'अजमल' अब वो तन्हा तो न होगा जो ठहर जाएगा वो
Ajmal Siraj
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मैं ने ऐ दिल तुझे सीने से लगाया हुआ है और तू है कि मिरी जान को आया हुआ है बस इसी बोझ से दोहरी हुई जाती है कमर ज़िंदगी का जो ये एहसान उठाया हुआ है क्या हुआ गर नहीं बादल ये बरसने वाला ये भी कुछ कम तो नहीं है जो ये आया हुआ है राह चलती हुई इस राह-गुज़र पर 'अजमल' हम समझते हैं क़दम हम ने जमाया हुआ है हम ये समझे थे कि हम भूल गए हैं उस को आज बे-तरह हमें याद जो आया हुआ है वो किसी रोज़ हवाओं की तरह आएगा राह में जिस की दिया हम ने जलाया हुआ है कौन बतलाए उसे अपना यक़ीं है कि नहीं वो जिसे हम ने ख़ुदा अपना बनाया हुआ है यूँँही दीवाना बना फिरता है वर्ना 'अजमल' दिल में बैठा हुआ है ज़ेहन पे छाया हुआ है
Ajmal Siraj
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