ghazalKuch Alfaaz

मैं ने ऐ दिल तुझे सीने से लगाया हुआ है और तू है कि मिरी जान को आया हुआ है बस इसी बोझ से दोहरी हुई जाती है कमर ज़िंदगी का जो ये एहसान उठाया हुआ है क्या हुआ गर नहीं बादल ये बरसने वाला ये भी कुछ कम तो नहीं है जो ये आया हुआ है राह चलती हुई इस राह-गुज़र पर 'अजमल' हम समझते हैं क़दम हम ने जमाया हुआ है हम ये समझे थे कि हम भूल गए हैं उस को आज बे-तरह हमें याद जो आया हुआ है वो किसी रोज़ हवाओं की तरह आएगा राह में जिस की दिया हम ने जलाया हुआ है कौन बतलाए उसे अपना यक़ीं है कि नहीं वो जिसे हम ने ख़ुदा अपना बनाया हुआ है यूँँही दीवाना बना फिरता है वर्ना 'अजमल' दिल में बैठा हुआ है ज़ेहन पे छाया हुआ है

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तुम्हें बस ये बताना चाहता हूँ मैं तुम से क्या छुपाना चाहता हूँ कभी मुझ से भी कोई झूठ बोलो मैं हाँ में हाँ मिलाना चाहता हूँ ये जो खिड़की है नक़्शे में तुम्हारे यहाँ मैं दर बनाना चाहता हूँ अदाकारी बहुत दुख दे रही है मैं सच-मुच मुस्कुराना चाहता हूँ परों में तीर है पंजों में तिनके मैं ये चिड़िया उड़ाना चाहता हूँ लिए बैठा हूँ घुँघरू फूल मोती तिरा हँसना बनाना चाहता हूँ अमीरी इश्क़ की तुम को मुबारक मैं बस खाना-कमाना चाहता हूँ मैं सारे शहर की बैसाखियों को तिरे दर पर नचाना चाहता हूँ मुझे तुम सेे बिछड़ना ही पड़ेगा मैं तुम को याद आना चाहता हूँ

Fahmi Badayuni

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ज़बाँ तो खोल नज़र तो मिला जवाब तो दे मैं कितनी बार लुटा हूँ मुझे हिसाब तो दे तेरे बदन की लिखावट में है उतार चढ़ाव मैं तुझे कैसे पढूँगा मुझे किताब तो दे तेरा सवाल है साक़ी कि ज़िंदगी क्या है? जवाब देता हूँ पहले मुझे शराब तो दे

Rahat Indori

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चाँद सितारे फूल परिंदे शाम सवेरा एक तरफ़ सारी दुनिया उस का चर्बा उस का चेहरा एक‌ तरफ़ वो लड़कर भी सो जाए तो उस का माथा चूमूँ मैं उस सेे मुहब्बत एक तरफ़ है उस सेे झगड़ा एक तरफ़ जिस शय पर वो उँगली रख दे उस को वो दिलवानी है उस की ख़ुशियाँ सब से अव्वल सस्ता महँगा एक तरफ़ ज़ख़्मों पर मरहम लगवाओ लेकिन उस के हाथों से चारासाज़ी एक तरफ़ है उस का छूना एक तरफ़ सारी दुनिया जो भी बोले सब कुछ शोर शराबा है सब का कहना एक तरफ़ है उस का कहना एक तरफ़ उस ने सारी दुनिया माँगी मैं ने उस को माँगा है उस के सपने एक तरफ़ है मेरा सपना एक तरफ़

Varun Anand

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उसी जगह पर जहाँ कई रास्ते मिलेंगे पलट के आए तो सब सेे पहले तुझे मिलेंगे अगर कभी तेरे नाम पर जंग हो गई तो हम ऐसे बुज़दिल भी पहली सफ़ में खड़े मिलेंगे तुझे ये सड़कें मेरे तवस्सुत से जानती हैं तुझे हमेशा ये सब इशारे खुले मिलेंगे

Tehzeeb Hafi

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क्यूँँ डरें ज़िन्दगी में क्या होगा कुछ न होगा तो तजरबा होगा हँसती आँखों में झाँक कर देखो कोई आँसू कहीं छुपा होगा इन दिनों ना-उमीद सा हूँ मैं शायद उस ने भी ये सुना होगा देख कर तुम को सोचता हूँ मैं क्या किसी ने तुम्हें छुआ होगा

Javed Akhtar

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दीवार याद आ गई दर याद आ गया दो गाम ही चले थे कि घर याद आ गया कुछ कहना चाहते थे कि ख़ामोश हो गए दस्तार याद आ गई सर याद आ गया दुनिया की बे-रुख़ी का गिला कर रहे थे लोग हम को तिरा तपाक मगर याद आ गया फिर तीरगी-ए-राहगुज़र याद आ गई फिर वो चराग़-ए-राहगुज़र याद आ गया 'अजमल'-सिराज हम उसे भूल हुए तो हैं क्या जाने क्या करेंगे अगर याद आ गया

Ajmal Siraj

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बुझ गया रात वो सितारा भी हाल अच्छा नहीं हमारा भी ये जो हम खोए खोए रहते हैं इस में कुछ दख़्ल है तुम्हारा भी डूबना ज़ात के समुंदर में है ये तूफ़ान भी किनारा भी अब मुझे नींद ही नहीं आती ख़्वाब है ख़्वाब का सहारा भी लोग जीते हैं किस तरह 'अजमल' हम से होता नहीं गुज़ारा भी

Ajmal Siraj

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तेरे सिवा किसी की तमन्ना करूँँगा मैं ऐसा कभी हुआ है जो ऐसा करूँँगा मैं गो ग़म अज़ीज़ है मुझे तेरे फ़िराक़ का फिर भी इस इम्तिहान का शिकवा करूँँगा मैं आँखों को अश्क ओ ख़ूँ भी फ़राहम करूँँगा मैं दिल के लिए भी दर्द मुहय्या करूँँगा मैं राहत भी रंज, रंज भी राहत हो जब तो फिर क्या एतिबार-ए-ख़्वाहिश-ए-दुनिया करूँँगा मैं रक्खा है क्या जहान में ये और बात है ये और बात है कि तक़ाज़ा करूँँगा मैं ये रहगुज़र कि जा-ए-क़याम-ओ-क़रार थी या'नी अब उस गली से भी गुज़रा करूँँगा मैं या'नी कुछ इस तरह कि तुझे भी ख़बर न हो इस एहतियात से तुझे देखा करूँँगा मैं है देखने की चीज़ तो ये इल्तिफ़ात भी देखोगे तुम गुरेज़ भी ऐसा करूँँगा मैं हैरान ओ दिल-शिकस्ता हूँ इस हाल-ए-ज़ार पर कब जानता था अपना तमाशा करूँँगा मैं हाँ खींच लूँगा वक़्त की ज़ंजीर पाँव से अब के बहार आई तो ऐसा करूँँगा मैं

Ajmal Siraj

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शाम अपनी बे-मज़ा जाती है रोज़ और सितम ये है कि आ जाती है रोज़ कोई दिन आसाँ नहीं जाता मिरा कोई मुश्किल आज़मा जाती है रोज़ मुझ से पूछे कोई क्या है ज़िंदगी मेरे सर से ये बला जाती है रोज़ जाने किस की सुर्ख़-रूई के लिए ख़ूँ में ये धरती नहा जाती है रोज़ गीत गाते हैं परिंदे सुब्ह ओ शाम या समाअ'त चहचहा जाती है रोज़ देखने वालों को 'अजमल' ज़िंदगी रंग कितने ही दिखा जाती है रोज़

Ajmal Siraj

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हम अपने-आप में रहते हैं दम में दम जैसे हमारे साथ हों दो-चार भी जो हम जैसे किसे दिमाग़ जुनूँ की मिज़ाज-पुर्सी का सुनेगा कौन गुज़रती है शाम-ए-ग़म जैसे भला हुआ कि तिरा नक़्श-ए-पा नज़र आया ख़िरद को रास्ता समझे हुए थे हम जैसे मिरी मिसाल तो ऐसी है जैसे ख़्वाब कोई मिरा वजूद समझ लीजिए अदम जैसे अब आप ख़ुद ही बताएँ ये ज़िंदगी क्या है करम भी उस ने किए हैं मगर सितम जैसे

Ajmal Siraj

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