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बस इक उसी पे तो पूरी तरह अयाॅं हूँ मैं वो कह रहा है मुझे रायगाॅं तो हाँ हूँ मैं जिसे दिखाई दूँ मेरी तरफ़ इशारा करे मुझे दिखाई नहीं दे रहा कहाॅं हूँ मैं इधर-उधर से नमी का रिसाव रहता है सड़क से नीचे बनाया गया मकाॅं हूँ मैं किसी ने पूछा कि तुम कौन हो तो भूल गया अभी किसी ने बताया तो था फ़लाॅं हूँ मैं मैं ख़ुद को तुझ से मिटाऊॅंगा एहतियात के साथ तू बस निशान लगा दे जहाॅं जहाॅं हूँ मैं मैं किस से पूछूॅं ये रस्ता दुरुस्त है कि ग़लत जहाॅं से कोई गुज़रता नहीं वहाॅं हूँ मैं

Umair Najmi55 Likes

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चादर की इज़्ज़त करता हूँ और पर्दे को मानता हूँ हर पर्दा पर्दा नहीं होता इतना मैं भी जानता हूँ सारे मर्द एक जैसे हैं तुम ने कैसे कह डाला मैं भी तो एक मर्द हूँ तुम को ख़ुद से बेहतर मानता हूँ मैं ने उस सेे प्यार किया है मिल्कियत का दावा नहीं वो जिस के भी साथ है मैं उस को भी अपना मानता हूँ चादर की इज़्ज़त करता हूँ और पर्दे को मानता हूँ हर पर्दा पर्दा नहीं होता इतना मैं भी जानता हूँ

Ali Zaryoun

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यही अपनी कहानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले वो लड़की जाँ हमारी थी, मियाँ पहले बहुत पहले वहम मुझ को ये भाता है,अभी मेरी दिवानी है मगर मेरी दिवानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले रक़ीब आ कर बताते हैं यहाँ तिल है, वहाँ तिल है हमें ये जानकारी थी मियाँ पहले, बहुत पहले अदब से माँग कर माफ़ी भरी महफ़िल ये कहता हूँ वो लड़की ख़ानदानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले

Anand Raj Singh

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चला है सिलसिला कैसा ये रातों को मनाने का तुम्हें हक़ दे दिया किस ने दियों के दिल दुखाने का इरादा छोड़िए अपनी हदों से दूर जाने का ज़माना है ज़माने की निगाहों में न आने का कहाँ की दोस्ती किन दोस्तों की बात करते हो मियाँ दुश्मन नहीं मिलता कोई अब तो ठिकाने का निगाहों में कोई भी दूसरा चेहरा नहीं आया भरोसा ही कुछ ऐसा था तुम्हारे लौट आने का ये मैं ही था बचा के ख़ुद को ले आया किनारे तक समुंदर ने बहुत मौक़ा' दिया था डूब जाने का

Waseem Barelvi

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चाँद सितारे फूल परिंदे शाम सवेरा एक तरफ़ सारी दुनिया उस का चर्बा उस का चेहरा एक‌ तरफ़ वो लड़कर भी सो जाए तो उस का माथा चूमूँ मैं उस सेे मुहब्बत एक तरफ़ है उस सेे झगड़ा एक तरफ़ जिस शय पर वो उँगली रख दे उस को वो दिलवानी है उस की ख़ुशियाँ सब से अव्वल सस्ता महँगा एक तरफ़ ज़ख़्मों पर मरहम लगवाओ लेकिन उस के हाथों से चारासाज़ी एक तरफ़ है उस का छूना एक तरफ़ सारी दुनिया जो भी बोले सब कुछ शोर शराबा है सब का कहना एक तरफ़ है उस का कहना एक तरफ़ उस ने सारी दुनिया माँगी मैं ने उस को माँगा है उस के सपने एक तरफ़ है मेरा सपना एक तरफ़

Varun Anand

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क्यूँँ डरें ज़िन्दगी में क्या होगा कुछ न होगा तो तजरबा होगा हँसती आँखों में झाँक कर देखो कोई आँसू कहीं छुपा होगा इन दिनों ना-उमीद सा हूँ मैं शायद उस ने भी ये सुना होगा देख कर तुम को सोचता हूँ मैं क्या किसी ने तुम्हें छुआ होगा

Javed Akhtar

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मैं ने जो राह ली दुश्वार ज़ियादा निकली मेरे अंदाज़े से हर बार ज़ियादा निकली कोई रौज़न न झरोका न कोई दरवाज़ा मेरी ता'मीर में दीवार ज़ियादा निकली ये मिरी मौत के अस्बाब में लिखा हुआ है ख़ून में इश्क़ की मिक़दार ज़ियादा निकली कितनी जल्दी दिया घर वालों को फल और साया मुझ से तो पेड़ की रफ़्तार ज़ियादा निकली

Umair Najmi

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इक दिन ज़बाँ सुकूत की पूरी बनाऊँगा मैं गुफ़्तुगू को ग़ैर-ज़रूरी बनाऊँगा तस्वीर में बनाऊँगा दोनों के हाथ और दोनों में एक हाथ की दूरी बनाऊँगा मुद्दत समेत जुमला ज़वाबित हों तय-शुदा या'नी तअल्लुक़ात उबूरी बनाऊँगा तुझ को ख़बर न होगी कि मैं आस-पास हूँ इस बार हाज़िरी को हुज़ूरी बनाऊँगा रंगों पे इख़्तियार अगर मिल सका कभी तेरी सियाह पुतलियाँ भूरी बनाऊँगा जारी है अपनी ज़ात पे तहक़ीक़ आज-कल मैं भी ख़ला पे एक थ्योरी बनाऊँगा मैं चाह कर वो शक्ल मुकम्मल न कर सका उस को भी लग रहा था अधूरी बनाऊँगा

Umair Najmi

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तुम इस ख़राबे में चार छे दिन टहल गई हो सो ऐन-मुमकिन है दिल की हालत बदल गई हो तमाम दिन इस दुआ में कटता है कुछ दिनों से मैं जाऊँ कमरे में तो उदासी निकल गई हो किसी के आने पे ऐसे हलचल हुई है मुझ में ख़मोश जंगल में जैसे बंदूक़ चल गई हो ये न हो गर मैं हिलूँ तो गिरने लगे बुरादा दुखों की दीमक बदन की लकड़ी निगल गई हो ये छोटे छोटे कई हवादिस जो हो रहे हैं किसी के सर से बड़ी मुसीबत न टल गई हो हमारा मलबा हमारे क़दमों में आ गिरा है प्लेट में जैसे मोम-बत्ती पिघल गई हो

Umair Najmi

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इक दिन ज़बाँ सुकूत की पूरी बनाऊँगा मैं गुफ़्तुगू को ग़ैर-ज़रूरी बनाऊँगा तस्वीर में बनाऊँगा दोनों के हाथ और दोनों में एक हाथ की दूरी बनाऊँगा मुद्दत समेत जुमला ज़वाबित हों तय-शुदा या'नी तअ'ल्लुक़ात उबूरी बनाऊँगा तुझ को ख़बर न होगी कि मैं आस-पास हूँ इस बार हाज़िरी को हुज़ूरी बनाऊँगा रंगों पे इख़्तियार अगर मिल सका कभी तेरी सियाह पुतलियाँ भूरी बनाऊँगा जारी है अपनी ज़ात पे तहक़ीक़ आज-कल मैं भी ख़ला पे एक थ्योरी बनाऊँगा मैं चाह कर वो शक्ल मुकम्मल न कर सका उस को भी लग रहा था अधूरी बनाऊँगा

Umair Najmi

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हर इक हज़ार में बस पाँच सात हैं हम लोग निसाब-ए-इश्क़ पे वाजिब ज़कात हैं हम लोग दबाओ में भी जमाअत कभी नहीं बदली शुरूअ' दिन से मोहब्बत के साथ हैं हम लोग जो सीखनी हो ज़बान-ए-सुकूत बिस्मिल्लाह ख़मोशियों की मुकम्मल लुग़ात हैं हम लोग कहानियों के वो किरदार जो लिखे न गए ख़बर से हज़्फ़-शुदा वाक़िआ''त हैं हम लोग ये इंतिज़ार हमें देख कर बनाया गया ज़ुहूर-ए-हिज्र से पहले की बात हैं हम लोग किसी को रास्ता दे दें किसी को पानी न दें कहीं पे नील कहीं पर फ़ुरात हैं हम लोग हमें जला के कोई शब गुज़ार सकता है सड़क पे बिखरे हुए काग़ज़ात हैं हम लोग

Umair Najmi

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