do-rangi khuub naiin yak-rang ho ja sarapa mom ho ya sang ho ja tujhe jyuun ghhuncha gar hai dard ki bu lahu ka ghunt pi dil-tang ho ja kaha kis tarah dil ne tujh kuun ai ghham ki dil ki aarsi par zang ho ja yahi aahon ke taron men sada hai ki bar-e-ghham siin kham jyuun chang ho ja dua hai ai rah-e-ghham tul-e-umr ka qadam par hai to sau farsang ho ja gale men daal rusvai ki alfi alif khinch aah ka be-nang ho ja birah ki aag men sabit-qadam chal 'siraj' ab shama ka ham-rang ho ja do-rangi khub nain yak-rang ho ja sarapa mom ho ya sang ho ja tujhe jyun ghuncha gar hai dard ki bu lahu ka ghunt pi dil-tang ho ja kaha kis tarah dil ne tujh kun ai gham ki dil ki aarsi par zang ho ja yahi aahon ke taron mein sada hai ki bar-e-gham sin kham jyun chang ho ja dua hai ai rah-e-gham tul-e-umr ka qadam par hai to sau farsang ho ja gale mein dal ruswai ki alfi alif khinch aah ka be-nang ho ja birah ki aag mein sabit-qadam chal 'siraj' ab shama ka ham-rang ho ja
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आँखों में रहा दिल में उतर कर नहीं देखा कश्ती के मुसाफ़िर ने समुंदर नहीं देखा बे-वक़्त अगर जाऊँगा सब चौंक पड़ेंगे इक उम्र हुई दिन में कभी घर नहीं देखा जिस दिन से चला हूँ मिरी मंज़िल पे नज़र है आँखों ने कभी मील का पत्थर नहीं देखा ये फूल मुझे कोई विरासत में मिले हैं तुम ने मिरा काँटों भरा बिस्तर नहीं देखा यारों की मोहब्बत का यक़ीं कर लिया मैं ने फूलों में छुपाया हुआ ख़ंजर नहीं देखा महबूब का घर हो कि बुज़ुर्गों की ज़मीनें जो छोड़ दिया फिर उसे मुड़ कर नहीं देखा ख़त ऐसा लिखा है कि नगीने से जड़े हैं वो हाथ कि जिस ने कोई ज़ेवर नहीं देखा पत्थर मुझे कहता है मिरा चाहने वाला मैं मोम हूँ उस ने मुझे छू कर नहीं देखा
Bashir Badr
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पुराने दाँव पर हर दिन नए आँसू लगाता है वो अब भी इक फटे रूमाल पर ख़ुश्बू लगाता है उसे कह दो कि ये ऊँचाइयाँ मुश्किल से मिलती हैं वो सूरज के सफ़र में मोम के बाज़ू लगाता है मैं काली रात के तेज़ाब से सूरज बनाता हूँ मिरी चादर में ये पैवंद इक जुगनू लगाता है यहाँ लछमन की रेखा है न सीता है मगर फिर भी बहुत फेरे हमारे घर के इक साधू लगाता है नमाज़ें मुस्तक़िल पहचान बन जाती है चेहरों की तिलक जिस तरह माथे पर कोई हिन्दू लगाता है न जाने ये अनोखा फ़र्क़ इस में किस तरह आया वो अब कॉलर में फूलों की जगह बिच्छू लगाता है अँधेरे और उजाले में ये समझौता ज़रूरी है निशाने हम लगाते हैं ठिकाने तू लगाता है
Rahat Indori
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मेरी तक़दीर में जलना है तो जल जाऊँगा तेरा वा'दा तो नहीं हूँ जो बदल जाऊँगा सोज़ भर दो मिरे सपने में ग़म-ए-उल्फ़त का मैं कोई मोम नहीं हूँ जो पिघल जाऊँगा दर्द कहता है ये घबरा के शब-ए-फ़ुर्क़त में आह बन कर तिरे पहलू से निकल जाऊँगा मुझ को समझाओ न 'साहिर' मैं इक दिन ख़ुद ही ठोकरें खा के मोहब्बत में सँभल जाऊँगा
Sahir Ludhianvi
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मिरे दिल की राख कुरेद मत इसे मुस्कुरा के हवा न दे ये चराग़ फिर भी चराग़ है कहीं तेरा हाथ जला न दे नए दौर के नए ख़्वाब हैं नए मौसमों के गुलाब हैं ये मोहब्बतों के चराग़ हैं इन्हें नफ़रतों की हवा न दे ज़रा देख चाँद की पत्तियों ने बिखर बिखर के तमाम शब तिरा नाम लिक्खा है रेत पर कोई लहर आ के मिटा न दे मैं उदासियाँ न सजा सकूँ कभी जिस्म-ओ-जाँ के मज़ार पर न दिए जलें मिरी आँख में मुझे इतनी सख़्त सज़ा न दे मिरे साथ चलने के शौक़ में बड़ी धूप सर पे उठाएगा तिरा नाक नक़्शा है मोम का कहीं ग़म की आग घुला न दे मैं ग़ज़ल की शबनमी आँख से ये दुखों के फूल चुना करूँँ मिरी सल्तनत मिरा फ़न रहे मुझे ताज-ओ-तख़्त ख़ुदा न दे
Bashir Badr
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अंदर का ज़हर चूम लिया धुल के आ गए कितने शरीफ़ लोग थे सब खुल के आ गए सूरज से जंग जीतने निकले थे बेवक़ूफ़ सारे सिपाही मोम के थे घुल के आ गए मस्जिद में दूर दूर कोई दूसरा न था हम आज अपने आप से मिल-जुल के आ गए नींदों से जंग होती रहेगी तमाम उम्र आँखों में बंद ख़्वाब अगर खुल के आ गए सूरज ने अपनी शक्ल भी देखी थी पहली बार आईने को मज़े भी तक़ाबुल के आ गए अनजाने साए फिरने लगे हैं इधर उधर मौसम हमारे शहर में काबुल के आ गए
Rahat Indori
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