dukh-dard ke maron se mira zikr na karna ghar jaao to yaron se mira zikr na karna vo zabt na kar paengi ankhon ke samundar tum rah-guzaron se mira zikr na karna phulon ke nasheman men raha huun main sada se dekho kabhi kharon se mira zikr na karna shayad ye andhere hi mujhe raah dikhaen ab chand sitaron se mira zikr na karna vo meri kahani ko ghhalat rang na de den afsana-nigaron se mira zikr na karna shayad vo mire haal pe be-sakhta ro den is baar baharon se mira zikr na karna le jaenge gahrai men tum ko bhi baha kar dariya ke kinaron se mira zikr na karna vo shakhs mile to use har baat batana tum sirf isharon se mira zikr na karna dukh-dard ke maron se mera zikr na karna ghar jao to yaron se mera zikr na karna wo zabt na kar paengi aankhon ke samundar tum rah-guzaron se mera zikr na karna phulon ke nasheman mein raha hun main sada se dekho kabhi kharon se mera zikr na karna shayad ye andhere hi mujhe rah dikhaen ab chand sitaron se mera zikr na karna wo meri kahani ko ghalat rang na de den afsana-nigaron se mera zikr na karna shayad wo mere haal pe be-sakhta ro den is bar bahaaron se mera zikr na karna le jaenge gahrai mein tum ko bhi baha kar dariya ke kinaron se mera zikr na karna wo shakhs mile to use har baat batana tum sirf ishaaron se mera zikr na karna
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तेरे पीछे होगी दुनिया पागल बन क्या बोला मैं ने कुछ समझा? पागल बन सहरा में भी ढूँढ़ ले दरिया पागल बन वरना मर जाएगा प्यासा पागल बन आधा दाना आधा पागल नइँ नइँ नइँ उस को पाना है तो पूरा पागल बन दानाई दिखलाने से कुछ हासिल नहीं पागल खाना है ये दुनिया पागल बन देखें तुझ को लोग तो पागल हो जाएँ इतना उम्दा इतना आला पागल बन लोगों से डर लगता है तो घर में बैठ जिगरा है तो मेरे जैसा पागल बन
Varun Anand
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बैठे हैं चैन से कहीं जाना तो है नहीं हम बे-घरों का कोई ठिकाना तो है नहीं तुम भी हो बीते वक़्त के मानिंद हू-ब-हू तुम ने भी याद आना है आना तो है नहीं अहद-ए-वफ़ा से किस लिए ख़ाइफ़ हो मेरी जान कर लो कि तुम ने अहद निभाना तो है नहीं वो जो हमें अज़ीज़ है कैसा है कौन है क्यूँँ पूछते हो हम ने बताना तो है नहीं दुनिया हम अहल-ए-इश्क़ पे क्यूँँ फेंकती है जाल हम ने तिरे फ़रेब में आना तो है नहीं वो इश्क़ तो करेगा मगर देख भाल के 'फ़ारिस' वो तेरे जैसा दिवाना तो है नहीं
Rehman Faris
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चल दिए फेर कर नज़र तुम भी ग़ैर तो ग़ैर थे मगर तुम भी ये गली मेरे दिलरुबा की है दोस्तों ख़ैरियत इधर तुम भी मुझ पे लोगों के साथ हँसते हो लोग रोएँगे ख़ास कर तुम भी मुझ को ठुकरा दिया है दुनिया ने मैं तो मर जाऊँगा अगर तुम भी उस की गाड़ी तो जा चुकी 'ताबिश' अब उठो जाओ अपने घर तुम भी
Zubair Ali Tabish
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इक पल में इक सदी का मज़ा हम से पूछिए दो दिन की ज़िंदगी का मज़ा हम से पूछिए भूले हैं रफ़्ता रफ़्ता उन्हें मुद्दतों में हम क़िस्तों में ख़ुद-कुशी का मज़ा हम से पूछिए आग़ाज़-ए-आशिक़ी का मज़ा आप जानिए अंजाम-ए-आशिक़ी का मज़ा हम से पूछिए जलते दियों में जलते घरों जैसी ज़ौ कहाँ सरकार रौशनी का मज़ा हम से पूछिए वो जान ही गए कि हमें उन सेे प्यार है आँखों की मुख़बिरी का मज़ा हम सेे पूछिए हँसने का शौक़ हम को भी था आप की तरह हँसिए मगर हँसी का मज़ा हम से पूछिए हम तौबा कर के मर गए बे-मौत ऐ 'ख़ुमार' तौहीन-ए-मय-कशी का मज़ा हम से पूछिए
Khumar Barabankvi
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कितने ऐश से रहते होंगे कितने इतराते होंगे जाने कैसे लोग वो होंगे जो उस को भाते होंगे शाम हुए ख़ुश-बाश यहाँ के मेरे पास आ जाते हैं मेरे बुझने का नज़्ज़ारा करने आ जाते होंगे वो जो न आने वाला है ना उस से मुझ को मतलब था आने वालों से क्या मतलब आते हैं आते होंगे उस की याद की बाद-ए-सबा में और तो क्या होता होगा यूँँही मेरे बाल हैं बिखरे और बिखर जाते होंगे यारो कुछ तो ज़िक्र करो तुम उस की क़यामत बाँहों का वो जो सिमटते होंगे उन में वो तो मर जाते होंगे मेरा साँस उखड़ते ही सब बैन करेंगे रोएँगे या'नी मेरे बा'द भी या'नी साँस लिए जाते होंगे
Jaun Elia
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हज़ारों दुख पड़ें सहना मोहब्बत मर नहीं सकती है तुम से बस यही कहना मोहब्बत मर नहीं सकती तिरा हर बार मेरे ख़त को पढ़ना और रो देना मिरा हर बार लिख देना मोहब्बत मर नहीं सकती किया था हम ने कैम्पस की नदी पर इक हसीं वा'दा भले हम को पड़े मरना मोहब्बत मर नहीं सकती पुराने अहद को जब ज़िंदा करने का ख़याल आए मुझे बस इतना लिख देना मोहब्बत मर नहीं सकती वो तेरा हिज्र की शब फ़ोन रखने से ज़रा पहले बहुत रोते हुए कहना मोहब्बत मर नहीं सकती गए लम्हात फ़ुर्सत के कहाँ से ढूँड कर लाऊँ वो पहरों हाथ पर लिखना मोहब्बत मर नहीं सकती
Wasi Shah
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समुंदर में उतरता हूँ तो आँखें भीग जाती हैं तिरी आँखों को पढ़ता हूँ तो आँखें भीग जाती हैं तुम्हारा नाम लिखने की इजाज़त छिन गई जब से कोई भी लफ़्ज़ लिखता हूँ तो आँखें भीग जाती हैं तिरी यादों की ख़ुश्बू खिड़कियों में रक़्स करती है तिरे ग़म में सुलगता हूँ तो आँखें भीग जाती हैं न जाने हो गया हूँ इस क़दर हस्सास मैं कब से किसी से बात करता हूँ तो आँखें भीग जाती हैं मैं सारा दिन बहुत मसरूफ़ रहता हूँ मगर ज्यूँँ ही क़दम चौखट पे रखता हूँ तो आँखें भीग जाती हैं हर इक मुफ़्लिस के माथे पर अलम की दास्तानें हैं कोई चेहरा भी पढ़ता हूँ तो आँखें भीग जाती हैं बड़े लोगों के ऊँचे बद-नुमा और सर्द महलों को ग़रीब आँखों से तकता हूँ तो आँखें भीग जाती हैं तिरे कूचे से अब मेरा तअ'ल्लुक़ वाजिबी सा है मगर जब भी गुज़रता हूँ तो आँखें भीग जाती हैं हज़ारों मौसमों की हुक्मरानी है मिरे दिल पर 'वसी' मैं जब भी हँसता हूँ तो आँखें भीग जाती हैं
Wasi Shah
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