ghazalKuch Alfaaz

एक भयानक तूफ़ाँ आया पूरा छप्पर उड़ा दिया लेकिन फिर मेरी हिम्मत ने सारा मंज़र उड़ा दिया जितना पैसा लाई थी वो हफ़्तों तक बर्तन धोके उस के शौहर ने इक दिन में दारू पी कर उड़ा दिया हार गए जब दुनिया के सब वीर बहादुर और राजा इक लड़के ने धनुष उठाया और स्वयंवर उड़ा दिया हैरानी से दंग हुए तब जादू देख रहे सब लोग एक कबूतर ने ग़ुस्से में जब जादूगर उड़ा दिया डूब चुके थे उस की आँखों में हम इतने, मत पूछो क्या बतलाएँ चिड़िया उड़ में हम ने बन्दर उड़ा दिया

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तुम अगर सीखना चाहो मुझे बतला देना आम सा फ़न तो कोई है नहीं तोहफ़ा देना एक ही शख़्स है जिस को ये हुनर आता है रूठ जाने पे फ़ज़ा और भी महका देना हुस्न दुनिया में इसी काम को भेजा गया है के जहाँ आग लगी हो उसे भड़का देना उन बुजुर्गो का यही काम हुआ करता था जहाँ ख़ूबी नज़र आई उसे चमका देना दिल बताता है मुझे अक्ल की बातें क्या क्या बंदा पूछे के तेरा है कोई लेना देना और कुछ याद न रहता था लड़ाई में उसे हाँ मगर मेरे गुजिश्ता का हवाला देना उस की फ़ितरत में न था तर्क-ए-त'अल्लुक़ लेकिन दूसरे शख़्स को इस नहद पे पहुँचा देना जानता था कि बहुत ख़ाक उड़ाएगा मेरी कोई आसान नहीं था उसे रस्ता देना क्या पता ख़ुद से छिड़ी जंग कहाँ ले जाए जब भी याद आऊँ मेरी जान का सदका देना

Jawwad Sheikh

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ख़ुशबू की तरह आया वो तेज़ हवाओं में माँगा था जिसे हम ने दिन रात दु'आओं में तुम छत पे नहीं आए मैं घर से नहीं निकला ये चाँद बहुत भटका सावन की घटाओं में इस शहर में इक लड़की बिल्कुल है ग़ज़ल जैसी बिजली सी घटाओं में ख़ुशबू सी अदाओं में मौसम का इशारा है ख़ुश रहने दो बच्चों को मासूम मोहब्बत है फूलों की ख़ताओं में हम चाँद सितारों की राहों के मुसाफ़िर हैं हम रात चमकते हैं तारीक ख़लाओं में भगवान ही भेजेंगे चावल से भरी थाली मज़लूम परिंदों की मासूम सभाओं में दादा बड़े भोले थे सब से यही कहते थे कुछ ज़हर भी होता है अंग्रेज़ी दवाओं में

Bashir Badr

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गाहे गाहे बस अब यही हो क्या तुम से मिल कर बहुत ख़ुशी हो क्या मिल रही हो बड़े तपाक के साथ मुझ को यकसर भुला चुकी हो क्या याद हैं अब भी अपने ख़्वाब तुम्हें मुझ से मिल कर उदास भी हो क्या बस मुझे यूँँही इक ख़याल आया सोचती हो तो सोचती हो क्या अब मिरी कोई ज़िंदगी ही नहीं अब भी तुम मेरी ज़िंदगी हो क्या क्या कहा इश्क़ जावेदानी है! आख़िरी बार मिल रही हो क्या हाँ फ़ज़ा याँ की सोई सोई सी है तो बहुत तेज़ रौशनी हो क्या मेरे सब तंज़ बे-असर ही रहे तुम बहुत दूर जा चुकी हो क्या दिल में अब सोज़-ए-इंतिज़ार नहीं शम-ए-उम्मीद बुझ गई हो क्या इस समुंदर पे तिश्ना-काम हूँ मैं बान तुम अब भी बह रही हो क्या

Jaun Elia

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किया बादलों में सफ़र ज़िंदगी भर ज़मीं पर बनाया न घर ज़िंदगी भर सभी ज़िंदगी के मज़े लूटते हैं न आया हमें ये हुनर ज़िंदगी भर मोहब्बत रही चार दिन ज़िंदगी में रहा चार दिन का असर ज़िंदगी भर

Anwar Shaoor

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जागना और जगा के सो जाना रात को दिन बना के सो जाना टेक्स्ट करना तमाम रात उस को उँगलियों को दबा के सो जाना आज फिर देर से घर आया हूँ आज फिर मुँह बना के सो जाना

Ali Zaryoun

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चमचमाती कार में उस की बिदाई हो गई पर यक़ीन आता नहीं है बेवफ़ाई हो गई पार्क में सब दोस्त मेरे राह देखें हैं मेरी अब तो जाने दो मुझे अब तो पढ़ाई हो गई आदमी को और बच्चों को पता चलता नहीं रोटी सब्ज़ी कब बनी और कब सफ़ाई हो गई आओ बैठो अब सुनो तारीफ़ मेरी दोस्तों जिस ने छोड़ा है मुझे उस की बुराई हो गई आख़री चोटी से गिरकर हम मरे हैं इश्क़ की हम समझते थे हिमालय की चढ़ाई हो गई

Tanoj Dadhich

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कल उस की आरती मैं ने उतारी मगर मत पूछना कैसे उतारी गले तक आ गई थी बात मेरे सो पानी पी लिया, नीचे उतारी उसे भी मौत ने कुछ दिन पुकारा वो जिस ने लाश पंखे से उतारी

Tanoj Dadhich

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कल तक जो शख़्स साथ मेरे था चला गया ऐसा लगा कि आँख में तिनका चला गया मिलने वो आए और अकेले ही आए हैं या'नी कि कैच छूट के चौका चला गया मैं बोल जब रहा था नहीं रोक पाए वो सो रात भर मैं शे'र सुनाता चला गया कमज़ोरियाँ बता के उसे सोचता हूँ मैं आटे में पानी हद से ज़ियादा चला गया बे-फ़िक्र था 'तनोज' ख़बर ही नहीं हुई वो पास आया, दिल को निकाला, चला गया

Tanoj Dadhich

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डरता नहीं हूँ मैं किसी भी इम्तिहान से दूँगा सभी जवाब मगर इत्मीनान से लौट आती है सदा यूँँ मेरे जिस्म से मेरी जैसे कि लौट आई हो ख़ाली मकान से उस ने लिया गुलाब मगर कुछ नहीं कहा निकला नहीं है तीर अभी भी कमान से लंकेश को हराया था सीता बचाई थी बनता था घर को लौटना पुष्पक विमान से ख़ुद का ही आसमान है काफ़ी 'तनोज' को जलता नहीं वो और किसी की उड़ान से

Tanoj Dadhich

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कई लोगों से बेहतर हँस रहा है अगर तू अपने ऊपर हँस रहा है दशानन के अहम को तोड़ कर के बहुत छोटा सा बंदर हँस रहा है मुझे कोई नहीं ख़त भेजता अब मेरी छत का कबूतर हँस रहा है मुक़द्दर पर ये मेहनत हँस रही है ? या मेहनत पर मुक़द्दर हँस रहा है ? हज़ारों ग़म हैं उस की ज़िन्दगी में मगर फिर भी सुख़न-वर हँस रहा है कहा मैं ने कि दुनिया जीतनी है न जाने क्यूँ सिकन्दर हँस रहा है

Tanoj Dadhich

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