ghazalKuch Alfaaz

एक गुड़िया की कई कठ-पुतलियों में जान है आज शाइ'र ये तमाशा देख कर हैरान है ख़ास सड़कें बंद हैं तब से मरम्मत के लिए ये हमारे वक़्त की सब से सही पहचान है एक बूढ़ा आदमी है मुल्क में या यूँँ कहो इस अँधेरी कोठरी में एक रौशन-दान है मस्लहत-आमेज़ होते हैं सियासत के क़दम तू न समझेगा सियासत तू अभी नादान है कल नुमाइश में मिला वो चीथड़े पहने हुए मैं ने पूछा नाम तो बोला कि हिंदुस्तान है

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वो बे-वफ़ा है तो क्या मत कहो बुरा उस को कि जो हुआ सो हुआ ख़ुश रखे ख़ुदा उस को नज़र न आए तो उस की तलाश में रहना कहीं मिले तो पलट कर न देखना उस को वो सादा-ख़ू था ज़माने के ख़म समझता क्या हवा के साथ चला ले उड़ी हवा उस को वो अपने बारे में कितना है ख़ुश-गुमाँ देखो जब उस को मैं भी न देखूँ तो देखना उस को अभी से जाना भी क्या उस की कम-ख़याली पर अभी तो और बहुत होगा सोचना उस को उसे ये धुन कि मुझे कम से कम उदास रखे मिरी दु'आ कि ख़ुदा दे ये हौसला उस को पनाह ढूँढ़ रही है शब-ए-गिरफ़्ता-दिलाँ कोई बताओ मिरे घर का रास्ता उस को ग़ज़ल में तज़्किरा उस का न कर 'नसीर' कि अब भुला चुका वो तुझे तू भी भूल जा उस को

Naseer Turabi

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ख़ामोश लब हैं झुकी हैं पलकें, दिलों में उल्फ़त नई नई है अभी तक़ल्लुफ़ है गुफ़्तगू में, अभी मोहब्बत नई नई है अभी न आएँगी नींद तुम को, अभी न हम को सुकूँ मिलेगा अभी तो धड़केगा दिल ज़ियादा, अभी मुहब्बत नई नई है बहार का आज पहला दिन है, चलो चमन में टहल के आएँ फ़ज़ा में ख़ुशबू नई नई है गुलों में रंगत नई नई है जो ख़ानदानी रईस हैं वो मिज़ाज रखते हैं नर्म अपना तुम्हारा लहजा बता रहा है, तुम्हारी दौलत नई नई है ज़रा सा क़ुदरत ने क्या नवाज़ा के आके बैठे हो पहली सफ़ में अभी क्यूँ उड़ने लगे हवा में अभी तो शोहरत नई नई है बमों की बरसात हो रही है, पुराने जांबाज़ सो रहे हैं ग़ुलाम दुनिया को कर रहा है वो जिस की ताक़त नई नई है

Shabeena Adeeb

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तुम्हें बस ये बताना चाहता हूँ मैं तुम से क्या छुपाना चाहता हूँ कभी मुझ से भी कोई झूठ बोलो मैं हाँ में हाँ मिलाना चाहता हूँ ये जो खिड़की है नक़्शे में तुम्हारे यहाँ मैं दर बनाना चाहता हूँ अदाकारी बहुत दुख दे रही है मैं सच-मुच मुस्कुराना चाहता हूँ परों में तीर है पंजों में तिनके मैं ये चिड़िया उड़ाना चाहता हूँ लिए बैठा हूँ घुँघरू फूल मोती तिरा हँसना बनाना चाहता हूँ अमीरी इश्क़ की तुम को मुबारक मैं बस खाना-कमाना चाहता हूँ मैं सारे शहर की बैसाखियों को तिरे दर पर नचाना चाहता हूँ मुझे तुम सेे बिछड़ना ही पड़ेगा मैं तुम को याद आना चाहता हूँ

Fahmi Badayuni

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कैसे उस ने ये सब कुछ मुझ सेे छुप कर बदला चेहरा बदला रस्ता बदला बा'द में घर बदला मैं उस के बारे में ये कहता था लोगों से मेरा नाम बदल देना वो शख़्स अगर बदला वो भी ख़ुश था उस ने दिल देकर दिल माँगा है मैं भी ख़ुश हूँ मैं ने पत्थर से पत्थर बदला मैं ने कहा क्या मेरी ख़ातिर ख़ुद को बदलोगे और फिर उस ने नज़रें बदलीं और नंबर बदला

Tehzeeb Hafi

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ज़बाँ तो खोल नज़र तो मिला जवाब तो दे मैं कितनी बार लुटा हूँ मुझे हिसाब तो दे तेरे बदन की लिखावट में है उतार चढ़ाव मैं तुझे कैसे पढूँगा मुझे किताब तो दे तेरा सवाल है साक़ी कि ज़िंदगी क्या है? जवाब देता हूँ पहले मुझे शराब तो दे

Rahat Indori

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ये शफ़क़ शाम हो रही है अब और हर गाम हो रही है अब जिस तबाही से लोग बचते थे वो सर-ए-आम हो रही है अब अज़मत-ए-मुल्क इस सियासत के हाथ नीलाम हो रही है अब शब ग़नीमत थी लोग कहते हैं सुब्ह बदनाम हो रही है अब जो किरन थी किसी दरीचे की मरक़ज-ए-बाम हो रही है अब तिश्ना-लब तेरी फुसफुसाहट भी एक पैग़ाम हो रही है अब

Dushyant Kumar

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वो आदमी नहीं है मुकम्मल बयान है माथे पे उस के चोट का गहरा निशान है वो कर रहे हैं इश्क़ पे संजीदा गुफ़्तुगू मैं क्या बताऊँ मेरा कहीं और ध्यान है सामान कुछ नहीं है फटे-हाल है मगर झोले में उस के पास कोई संविधान है उस सर-फिरे को यूँँ नहीं बहला सकेंगे आप वो आदमी नया है मगर सावधान है फिस्ले जो उस जगह तो लुढ़कते चले गए हम को पता नहीं था कि इतनी ढलान है देखे हैं हम ने दौर कई अब ख़बर नहीं पावँ तले ज़मीन है या आसमान है वो आदमी मिला था मुझे उस की बात से ऐसा लगा कि वो भी बहुत बे-ज़बान है

Dushyant Kumar

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जाने किस किस का ख़याल आया है इस समुंदर में उबाल आया है एक बच्चा था हवा का झोंका साफ़ पानी को खँगाल आया है एक ढेला तो वहीं अटका था एक तू और उछाल आया है कल तो निकला था बहुत सज-धज के आज लौटा तो निढाल आया है ये नज़र है कि कोई मौसम है ये सबा है कि वबाल आया है हम ने सोचा था जवाब आएगा एक बेहूदा सवाल आया है

Dushyant Kumar

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लफ़्ज़ एहसास-से छाने लगे, ये तो हद है लफ़्ज़ माने भी छुपाने लगे, ये तो हद है आप दीवार उठाने के लिए आए थे आप दीवार उठाने लगे, ये तो हद है ख़ामुशी शोर से सुनते थे कि घबराती है ख़ामुशी शोर मचाने लगे, ये तो हद है आदमी होंठ चबाए तो समझ आता है आदमी छाल चबाने लगे, ये तो हद है जिस्म पहरावों में छुप जाते थे, पहरावों में जिस्म नंगे नज़र आने लगे, ये तो हद है लोग तहज़ीब-ओ-तमद्दुन के सलीक़े सीखे लोग रोते हुए गाने लगे, ये तो हद है

Dushyant Kumar

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रोज़ जब रात को बारह का गजर होता है यातनाओं के अँधेरे में सफ़र होता है कोई रहने की जगह है मिरे सपनों के लिए वो घरौंदा ही सही मिट्टी का भी घर होता है सिर से सीने में कभी पेट से पाँव में कभी इक जगह हो तो कहें दर्द इधर होता है ऐसा लगता है कि उड़ कर भी कहाँ पहुँचेंगे हाथ में जब कोई टूटा हुआ पर होता है सैर के वास्ते सड़कों पे निकल आते थे अब तो आकाश से पथराव का डर होता है

Dushyant Kumar

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