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लफ़्ज़ एहसास-से छाने लगे, ये तो हद है लफ़्ज़ माने भी छुपाने लगे, ये तो हद है आप दीवार उठाने के लिए आए थे आप दीवार उठाने लगे, ये तो हद है ख़ामुशी शोर से सुनते थे कि घबराती है ख़ामुशी शोर मचाने लगे, ये तो हद है आदमी होंठ चबाए तो समझ आता है आदमी छाल चबाने लगे, ये तो हद है जिस्म पहरावों में छुप जाते थे, पहरावों में जिस्म नंगे नज़र आने लगे, ये तो हद है लोग तहज़ीब-ओ-तमद्दुन के सलीक़े सीखे लोग रोते हुए गाने लगे, ये तो हद है

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चला है सिलसिला कैसा ये रातों को मनाने का तुम्हें हक़ दे दिया किस ने दियों के दिल दुखाने का इरादा छोड़िए अपनी हदों से दूर जाने का ज़माना है ज़माने की निगाहों में न आने का कहाँ की दोस्ती किन दोस्तों की बात करते हो मियाँ दुश्मन नहीं मिलता कोई अब तो ठिकाने का निगाहों में कोई भी दूसरा चेहरा नहीं आया भरोसा ही कुछ ऐसा था तुम्हारे लौट आने का ये मैं ही था बचा के ख़ुद को ले आया किनारे तक समुंदर ने बहुत मौक़ा' दिया था डूब जाने का

Waseem Barelvi

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तमाशा-ए-दैर-ओ-हरम देखते हैं तुझे हर बहाने से हम देखते हैं हमारी तरफ़ अब वो कम देखते हैं वो नज़रें नहीं जिन को हम देखते हैं ज़माने के क्या क्या सितम देखते हैं हमीं जानते हैं जो हम देखते हैं

Dagh Dehlvi

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इतना मजबूर न कर बात बनाने लग जाएँ हम तेरे सर की क़सम झूठ ही खाने लग जाएँ इतने सन्नाटे पिए मेरी समा'अत ने कि अब सिर्फ़ आवाज़ पे चाहूँ तो निशाने लग जाएँ चलिए कुछ और नहीं आह-शुमारी ही सही हम किसी काम तो इस दिल के बहाने लग जाएँ हम वो गुम-गश्त-ए-मोहब्बत हैं कि तुम तो क्या हो ख़ुद को हम ढूँडने निकलें तो ज़माने लग जाएँ ख़्वाब कुछ ऐसे दिखाए हैं फ़क़ीरी ने मुझे जिन की ता'बीर में शाहों के ख़ज़ाने लग जाएँ मैं अगर अपनी जवानी के सुना दूँ क़िस्से ये जो लौंडे हैं मिरे पाँव दबाने लग जाएँ

Mehshar Afridi

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झुक के चलता हूँ कि क़द उस के बराबर न लगे दूसरा ये कि उसे राह में ठोकर न लगे ये तेरे साथ तअ'ल्लुक़ का बड़ा फ़ाइदा है आदमी हो भी तो औक़ात से बाहर न लगे नीम तारीक सा माहौल है दरकार मुझे ऐसा माहौल जहाँ आँख लगे डर न लगे माँओं ने चूमना होते हैं बुरीदा सर भी उस से कहना कि कोई ज़ख़्म जबीं पर न लगे ये तलबगार निगाहों के तक़ाज़े हर सू कोई तो ऐसी जगह हो जो मुझे घर न लगे ये जो आईना है देखूँ तो ख़ला दिखता है इस जगह कुछ भी न लगवाऊँ तो बेहतर न लगे तुम ने छोड़ा तो किसी और से टकराऊँगा मैं कैसे मुमकिन है कि अंधे का कहीं सर न लगे

Umair Najmi

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ये शाहज़ादी की एक अदा है कमी नहीं है वो बोलने जब लगे तो फिर सोचती नहीं है कोई जो पूछे ख़मोश क्यूँँ हो तो हम बताएँ हमारी नाराज़गी है ये ख़ामुशी नहीं है ख़ला का चेहरा मुसव्विरों ने परख लिया है पर उस की तस्वीर इनसे अब तक बनी नहीं है कल उस की आँखों में फिर से आँसू थे मुझ को ले कर तो आग अब तक दहक रही है बुझी नहीं है मुझी को महफ़िल में ढूँढ़ने वो हुआ था दाख़िल मुझी पे उस की निगाह अब तक पड़ी नहीं है

Vikram Gaur Vairagi

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ये शफ़क़ शाम हो रही है अब और हर गाम हो रही है अब जिस तबाही से लोग बचते थे वो सर-ए-आम हो रही है अब अज़मत-ए-मुल्क इस सियासत के हाथ नीलाम हो रही है अब शब ग़नीमत थी लोग कहते हैं सुब्ह बदनाम हो रही है अब जो किरन थी किसी दरीचे की मरक़ज-ए-बाम हो रही है अब तिश्ना-लब तेरी फुसफुसाहट भी एक पैग़ाम हो रही है अब

Dushyant Kumar

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अगर ख़ुदा न करे सच ये ख़्वाब हो जाए तिरी सहर हो मिरा आफ़्ताब हो जाए हुज़ूर आरिज़-ओ-रुख़्सार क्या तमाम बदन मिरी सुनो तो मुजस्सम गुलाब हो जाए उठा के फेंक दो खिड़की से साग़र-ओ-मीना ये तिश्नगी जो तुम्हें दस्तियाब हो जाए वो बात कितनी भली है जो आप करते हैं सुनो तो सीने की धड़कन रबाब हो जाए बहुत क़रीब न आओ यक़ीं नहीं होगा ये आरज़ू भी अगर कामयाब हो जाए ग़लत कहूँ तो मिरी आक़िबत बिगड़ती है जो सच कहूँ तो ख़ुदी बे-नक़ाब हो जाए

Dushyant Kumar

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जाने किस किस का ख़याल आया है इस समुंदर में उबाल आया है एक बच्चा था हवा का झोंका साफ़ पानी को खँगाल आया है एक ढेला तो वहीं अटका था एक तू और उछाल आया है कल तो निकला था बहुत सज-धज के आज लौटा तो निढाल आया है ये नज़र है कि कोई मौसम है ये सबा है कि वबाल आया है हम ने सोचा था जवाब आएगा एक बेहूदा सवाल आया है

Dushyant Kumar

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वो आदमी नहीं है मुकम्मल बयान है माथे पे उस के चोट का गहरा निशान है वो कर रहे हैं इश्क़ पे संजीदा गुफ़्तुगू मैं क्या बताऊँ मेरा कहीं और ध्यान है सामान कुछ नहीं है फटे-हाल है मगर झोले में उस के पास कोई संविधान है उस सर-फिरे को यूँँ नहीं बहला सकेंगे आप वो आदमी नया है मगर सावधान है फिस्ले जो उस जगह तो लुढ़कते चले गए हम को पता नहीं था कि इतनी ढलान है देखे हैं हम ने दौर कई अब ख़बर नहीं पावँ तले ज़मीन है या आसमान है वो आदमी मिला था मुझे उस की बात से ऐसा लगा कि वो भी बहुत बे-ज़बान है

Dushyant Kumar

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तुम को निहारता हूँ सुब्ह से ऋतम्बरा अब शाम हो रही है मगर मन नहीं भरा ख़रगोश बन के दौड़ रहे हैं तमाम ख़्वाब फिरता है चांदनी में कोई सच डरा-डरा पौधे झुलस गए हैं मगर एक बात है मेरी नज़र में अब भी चमन है हरा-भरा लंबी सुरंग-से है तेरी ज़िन्दगी तो बोल मैं जिस जगह खड़ा हूंवहांहै कोई सिरा माथे पे हाथ रख के बहुत सोचते हो तुम गंगा क़सम बताओ हमें क्या है माजरा

Dushyant Kumar

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