ghazalKuch Alfaaz

रोज़ जब रात को बारह का गजर होता है यातनाओं के अँधेरे में सफ़र होता है कोई रहने की जगह है मिरे सपनों के लिए वो घरौंदा ही सही मिट्टी का भी घर होता है सिर से सीने में कभी पेट से पाँव में कभी इक जगह हो तो कहें दर्द इधर होता है ऐसा लगता है कि उड़ कर भी कहाँ पहुँचेंगे हाथ में जब कोई टूटा हुआ पर होता है सैर के वास्ते सड़कों पे निकल आते थे अब तो आकाश से पथराव का डर होता है

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चला है सिलसिला कैसा ये रातों को मनाने का तुम्हें हक़ दे दिया किस ने दियों के दिल दुखाने का इरादा छोड़िए अपनी हदों से दूर जाने का ज़माना है ज़माने की निगाहों में न आने का कहाँ की दोस्ती किन दोस्तों की बात करते हो मियाँ दुश्मन नहीं मिलता कोई अब तो ठिकाने का निगाहों में कोई भी दूसरा चेहरा नहीं आया भरोसा ही कुछ ऐसा था तुम्हारे लौट आने का ये मैं ही था बचा के ख़ुद को ले आया किनारे तक समुंदर ने बहुत मौक़ा' दिया था डूब जाने का

Waseem Barelvi

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दिल जब ख़ाली हो जाता है और भी भारी हो जाता है जब तू साक़ी हो जाता है इश्क़ शराबी हो जाता है मैं जब तक कुछ तय करता हूँ सब कुछ माज़ी हो जाता है उस के छूते ही क़िस्मत का ताला चाभी हो जाता है पहले तू काफ़ी होता था अब नाकाफ़ी हो जाता है

Fahmi Badayuni

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कितने ऐश से रहते होंगे कितने इतराते होंगे जाने कैसे लोग वो होंगे जो उस को भाते होंगे शाम हुए ख़ुश-बाश यहाँ के मेरे पास आ जाते हैं मेरे बुझने का नज़्ज़ारा करने आ जाते होंगे वो जो न आने वाला है ना उस से मुझ को मतलब था आने वालों से क्या मतलब आते हैं आते होंगे उस की याद की बाद-ए-सबा में और तो क्या होता होगा यूँँही मेरे बाल हैं बिखरे और बिखर जाते होंगे यारो कुछ तो ज़िक्र करो तुम उस की क़यामत बाँहों का वो जो सिमटते होंगे उन में वो तो मर जाते होंगे मेरा साँस उखड़ते ही सब बैन करेंगे रोएँगे या'नी मेरे बा'द भी या'नी साँस लिए जाते होंगे

Jaun Elia

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फिर मिरी याद आ रही होगी फिर वो दीपक बुझा रही होगी फिर मिरे फेसबुक पे आ कर वो ख़ुद को बैनर बना रही होगी अपने बेटे का चूम कर माथा मुझ को टीका लगा रही होगी फिर उसी ने उसे छुआ होगा फिर उसी से निभा रही होगी जिस्म चादर सा बिछ गया होगा रूह सिलवट हटा रही होगी फिर से इक रात कट गई होगी फिर से इक रात आ रही होगी

Kumar Vishwas

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अब मजीद उस सेे ये रिश्ता नहीं रखा जाता जिस से इक शख़्स का परदा नहीं रखा जाता एक तो बस में नहीं तुझ से मुहब्बत न करूँ और फिर हाथ भी हल्का नहीं रखा जाता पढ़ने जाता हूँ तो तस्में नहीं बांदे जाते घर पलटता हूँ तो बस्ता नहीं रखा जाता दर-ओ-दीवार पे जंगल का गुमाँ होता है मुझ से अब घर में परिंदा नहीं रखा जाता

Tehzeeb Hafi

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जाने किस किस का ख़याल आया है इस समुंदर में उबाल आया है एक बच्चा था हवा का झोंका साफ़ पानी को खँगाल आया है एक ढेला तो वहीं अटका था एक तू और उछाल आया है कल तो निकला था बहुत सज-धज के आज लौटा तो निढाल आया है ये नज़र है कि कोई मौसम है ये सबा है कि वबाल आया है हम ने सोचा था जवाब आएगा एक बेहूदा सवाल आया है

Dushyant Kumar

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ये शफ़क़ शाम हो रही है अब और हर गाम हो रही है अब जिस तबाही से लोग बचते थे वो सर-ए-आम हो रही है अब अज़मत-ए-मुल्क इस सियासत के हाथ नीलाम हो रही है अब शब ग़नीमत थी लोग कहते हैं सुब्ह बदनाम हो रही है अब जो किरन थी किसी दरीचे की मरक़ज-ए-बाम हो रही है अब तिश्ना-लब तेरी फुसफुसाहट भी एक पैग़ाम हो रही है अब

Dushyant Kumar

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एक गुड़िया की कई कठ-पुतलियों में जान है आज शाइ'र ये तमाशा देख कर हैरान है ख़ास सड़कें बंद हैं तब से मरम्मत के लिए ये हमारे वक़्त की सब से सही पहचान है एक बूढ़ा आदमी है मुल्क में या यूँँ कहो इस अँधेरी कोठरी में एक रौशन-दान है मस्लहत-आमेज़ होते हैं सियासत के क़दम तू न समझेगा सियासत तू अभी नादान है कल नुमाइश में मिला वो चीथड़े पहने हुए मैं ने पूछा नाम तो बोला कि हिंदुस्तान है

Dushyant Kumar

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होने लगी है जिस्म में जुम्बिश तो देखिए इस पर कटे परिंदे की कोशिश तो देखिए गूँगे निकल पड़े हैं ज़बाँ की तलाश में सरकार के ख़िलाफ़ ये साज़िश तो देखिए बरसात आ गई तो दरकने लगी ज़मीन सूखा मचा रही है ये बारिश तो देखिए उन की अपील है कि उन्हें हम मदद करें चाक़ू की पसलियों से गुज़ारिश तो देखिए जिस ने नज़र उठाई वही शख़्स गुम हुआ इस जिस्म के तिलिस्म की बंदिश तो देखिए

Dushyant Kumar

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तुम को निहारता हूँ सुब्ह से ऋतम्बरा अब शाम हो रही है मगर मन नहीं भरा ख़रगोश बन के दौड़ रहे हैं तमाम ख़्वाब फिरता है चांदनी में कोई सच डरा-डरा पौधे झुलस गए हैं मगर एक बात है मेरी नज़र में अब भी चमन है हरा-भरा लंबी सुरंग-से है तेरी ज़िन्दगी तो बोल मैं जिस जगह खड़ा हूंवहांहै कोई सिरा माथे पे हाथ रख के बहुत सोचते हो तुम गंगा क़सम बताओ हमें क्या है माजरा

Dushyant Kumar

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