घर की बुनियादें दीवारें बाम-ओ-दर थे बाबू जी सब को बाँध के रखने वाला ख़ास हुनर थे बाबू जी तीन मोहल्लों में उन जैसी क़द काठी का कोई न था अच्छे-ख़ासे ऊँचे पूरे क़द-आवर थे बाबू जी अब तो उस सूने माथे पर कोरे-पन की चादर है अम्मा जी की सारी सज-धज सब ज़ेवर थे बाबू जी भीतर से ख़ालिस जज़्बाती और ऊपर से ठेठ पिता अलग अनूठा अनबूझा सा इक तेवर थे बाबू जी कभी बड़ा सा हाथ-ख़र्च थे कभी हथेली की सूजन मेरे मन का आधा साहस आधा डर थे बाबू जी
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रोना-धोना सिर्फ़ दिखावा होता है कौन मिरे जाने से तन्हा होता है उस की टीस नहीं जाती है सारी उमर पहला धोका पहला धोका होता है नाम भी उस का याद नहीं रख पाते हम गलियाँ गलियाँ जिसेपुकारा होता है सारी बातें याद हमें आ जाती है लेकिन जब वो उठने वाला होता है मर जाता है तन्ज़ भरे इक जुमले से कोई-कोई तो इतना ज़िन्दा होता है आँसू भी हम खर्च वहीं पर करते हैं जहाँ कोई दिल रखने वाला होता है बे-मतलब की भीड़ लगाने वालों से जाने वाला और अकेला होता है घर में इसे महसूस करो या सहरा में सन्नाटा तो बस सन्नाटा होता है अच्छे चेहरे अच्छे चेहरे होते हैं उन में भी इक अपना वाला होता है
Shariq Kaifi
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जला कर दिल उजाला हो गया क्या मेरा ज़र्रा सितारा हो गया क्या नई चीज़ों को घर में रखने वाले मैं कुछ ज़्यादा पुराना हो गया क्या घरों से भागने वाले बताएँ मोहब्बत से गुज़ारा हो गया क्या
Kushal Dauneria
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मुझ से निकल के मेरे किसी आईने में आ ऐ रब्ब ए खुश-जमाल कभी राब्ते में आ तुझ से गुज़र के अपनी ख़बर लेनी है मुझे दीवारें जिस्म ओ जान मेरे रास्ते में आ यक बारगी जो फिर गई नजरें तो फिर गई अब चाहे ख़्वाब में कि किसी रतजगे में आ सब तोड़ ताड़ तुझ से कड़ी जोड़ लूंगा मैं इक बार मेरे पास किसी सिलसिले में आ हल हो गया ना मुझ में हमेशा के वास्ते किस ने कहा था तुझ से कि मुझ मसअले में आ रक्खें तुझे हथेली पर कब तक सँभाल कर चल अश्क ए ना-मुराद निकल आबले में आ फिर देखता हूँ कैसे निकलते है तेरे बल 'अम्मार' इस बदन से निकल कर खुले में आ
Ammar Iqbal
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ख़ुद अपने ख़ून में पहले नहाएा जाता है वक़ार ख़ुद नहीं बनता बनाया जाता है कभी कभी जो परिंदे भी अन-सुना कर दें तो हाल दिल का शजर को सुनाया जाता है हमारी प्यास को ज़ंजीर बाँधी जाती है तुम्हारे वास्ते दरिया बहाएा जाता है नवाज़ता है वो जब भी अज़ीज़ों को अपने तो सब से बा'द में हम को बुलाया जाता है हमीं तलाश के देते हैं रास्ता सब को हमीं को बा'द में रास्ता दिखाया जाता है
Varun Anand
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हौसले ज़िंदगी के देखते हैं चलिए कुछ रोज़ जी के देखते हैं नींद पिछली सदी की ज़ख़्मी है ख़्वाब अगली सदी के देखते हैं रोज़ हम इक अँधेरी धुँद के पार क़ाफ़िले रौशनी के देखते हैं धूप इतनी कराहती क्यूँँ है छाँव के ज़ख़्म सी के देखते हैं टुकटुकी बाँध ली है आँखों ने रास्ते वापसी के देखते हैं पानियों से तो प्यास बुझती नहीं आइए ज़हर पी के देखते हैं
Rahat Indori
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ठीक हुआ जो बिक गए सैनिक मुट्ठी भर दीनारों में वैसे भी तो ज़ंग लगा था पुश्तैनी हथियारों में सर्द नसों में चलते चलते गर्म लहू जब बर्फ़ हुआ चार पड़ोसी जिस्म उठा कर झोंक आए अंगारों में खेतों को मुट्ठी में भरना अब तक सीख नहीं पाया यूँँ तो मेरा जीवन बीता सामंती अय्यारों में कैसे उस के चाल-चलन में अंग्रेज़ी अंदाज़ न हो आख़िर उस ने साँसें लीं हैं पच्छिम के दरबारों में नज़दीकी अक्सर दूरी का कारन भी बन जाती है सोच-समझ कर घुलना-मिलना अपने रिश्ते-दारों में चाँद अगर पूरा चमके तो उस के दाग़ खटकते हैं एक न एक बुराई तय है सारे इज़्ज़त-दारों में
Aalok Shrivastav
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ये और बात दूर रहे मंज़िलों से हम बच कर चले हमेशा मगर क़ाफ़िलों से हम होने को फिर शिकार नई उलझनों से हम मिलते हैं रोज़ अपने कई दोस्तों से हम बरसों फ़रेब खाते रहे दूसरों से हम अपनी समझ में आए बड़ी मुश्किलों से हम मंज़िल की है तलब तो हमें साथ ले चलो वाक़िफ़ हैं ख़ूब राह की बारीकियों से हम जिन के परों पे सुब्ह की ख़ुशबू के रंग हैं बचपन उधार लाए हैं उन तितलियों से हम कुछ तो हमारे बीच कभी दूरियाँ भी हों तंग आ गए हैं रोज़ की नज़दीकियों से हम गुज़रें हमारे घर की किसी रहगुज़र से वो पर्दे हटाएँ देखें उन्हें खिड़कियों से हम जब भी कहा कि याद हमारी कहाँ उन्हें पकड़े गए हैं ठीक तभी हिचकियों से हम
Aalok Shrivastav
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हमेशा ज़िंदगी की हर कमी को जीते रहते हैं जिसे हम जी नहीं पाए उसी को जीते रहते हैं हमारे दुख की बारिश को कोई दामन नहीं मिलता हमारी आँख के बादल नमी को जीते रहते हैं किसी के साथ हैं रस्में किसी के साथ हैं क़स में किसी के साथ जीना है किसी को जीते रहते हैं हमें मालूम है इक दिन भरोसा टूट जाएगा मगर फिर भी सराबों में नदी को जीते रहते हैं हमारे साथ चलती है तुम्हारे प्यार की ख़ुशबू लगाई थी जो तुम ने उस लगी को जीते रहते हैं चहकते घर महकते खेत और वो गाँव की गलियाँ जिन्हें हम छोड़ आए उन सभी को जीते रहते है ख़ुदा के नाम-लेवा हम भी हैं तुम भी हो और वो भी मगर अफ़सोस सब अपनी ख़ुदी को जीते रहते हैं
Aalok Shrivastav
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अगर सफ़र में मिरे साथ मेरा यार चले तवाफ़ करता हुआ मौसम-ए-बहार चले लगा के वक़्त को ठोकर जो ख़ाकसार चले यक़ीं के क़ाफ़िले हमराह बे-शुमार चले नवाज़ना है तो फिर इस तरह नवाज़ मुझे कि मेरे बअ'द मिरा ज़िक्र बार बार चले ये जिस्म क्या है कोई पैरहन उधार का है यहीं सँभाल के पहना यहीं उतार चले ये जुगनुओं से भरा आसमाँ जहाँ तक है वहाँ तलक तिरी नज़रों का इक़्तिदार चले यही तो एक तमन्ना है इस मुसाफ़िर की जो तुम नहीं तो सफ़र में तुम्हारा प्यार चले
Aalok Shrivastav
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मुझे सिरे से पकड़ कर उधेड़ देती है मैं एक झूट वो सच्चे सुबूत जैसी है मैं रोज़ रोज़ तबस्सुम में छुपता फिरता हूँ उदासी है कि मुझे रोज़ ढूँढ़ लेती है ज़रूर कुछ तो बनाएगी ज़िंदगी मुझ को क़दम क़दम पे मिरा इम्तिहान लेती है जो एक फूल खिला है सहर की पलकों पर तुम्हारे जिस्म की ख़ुशबू उसी के जैसी है वो रौशनी जो सितारों का ख़ास ज़ेवर है अमीक़ आँखों में अक्सर दिखाई देती है
Aalok Shrivastav
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