ghazalKuch Alfaaz

हम पर तुम्हारी चाह का इल्ज़ाम ही तो है दुश्नाम तो नहीं है ये इकराम ही तो है करते हैं जिस पे ता'न कोई जुर्म तो नहीं शौक़-ए-फ़ुज़ूल ओ उल्फ़त-ए-नाकाम ही तो है दिल मुद्दई के हर्फ़-ए-मलामत से शाद है ऐ जान-ए-जांये हर्फ़ तिरा नाम ही तो है दिल ना-उमीद तो नहीं नाकाम ही तो है लंबी है ग़म की शाम मगर शाम ही तो है आख़िर तो एक रोज़ करेगी नज़र वफ़ा वो यार-ए-ख़ुश-ख़िसाल सर-ए-बाम ही तो है भीगी है रात 'फ़ैज़' ग़ज़ल इब्तिदा करो वक़्त-ए-सरोद दर्द का हंगाम ही तो है

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तुम्हें बस ये बताना चाहता हूँ मैं तुम से क्या छुपाना चाहता हूँ कभी मुझ से भी कोई झूठ बोलो मैं हाँ में हाँ मिलाना चाहता हूँ ये जो खिड़की है नक़्शे में तुम्हारे यहाँ मैं दर बनाना चाहता हूँ अदाकारी बहुत दुख दे रही है मैं सच-मुच मुस्कुराना चाहता हूँ परों में तीर है पंजों में तिनके मैं ये चिड़िया उड़ाना चाहता हूँ लिए बैठा हूँ घुँघरू फूल मोती तिरा हँसना बनाना चाहता हूँ अमीरी इश्क़ की तुम को मुबारक मैं बस खाना-कमाना चाहता हूँ मैं सारे शहर की बैसाखियों को तिरे दर पर नचाना चाहता हूँ मुझे तुम सेे बिछड़ना ही पड़ेगा मैं तुम को याद आना चाहता हूँ

Fahmi Badayuni

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बैठे हैं चैन से कहीं जाना तो है नहीं हम बे-घरों का कोई ठिकाना तो है नहीं तुम भी हो बीते वक़्त के मानिंद हू-ब-हू तुम ने भी याद आना है आना तो है नहीं अहद-ए-वफ़ा से किस लिए ख़ाइफ़ हो मेरी जान कर लो कि तुम ने अहद निभाना तो है नहीं वो जो हमें अज़ीज़ है कैसा है कौन है क्यूँँ पूछते हो हम ने बताना तो है नहीं दुनिया हम अहल-ए-इश्क़ पे क्यूँँ फेंकती है जाल हम ने तिरे फ़रेब में आना तो है नहीं वो इश्क़ तो करेगा मगर देख भाल के 'फ़ारिस' वो तेरे जैसा दिवाना तो है नहीं

Rehman Faris

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मेरे बस में नहीं वरना क़ुदरत का लिखा हुआ काटता तेरे हिस्से में आए बुरे दिन कोई दूसरा काटता लारियों से ज़्यादा बहाव था तेरे हर इक लफ्ज़ में मैं इशारा नहीं काट सकता तेरी बात क्या काटता मैं ने भी ज़िंदगी और शब ए हिज्र काटी है सबकी तरह वैसे बेहतर तो ये था के मैं कम से कम कुछ नया काटता तेरे होते हुए मोमबत्ती बुझाई किसी और ने क्या ख़ुशी रह गई थी जन्मदिन की, मैं केक क्या काटता कोई भी तो नहीं जो मेरे भूखे रहने पे नाराज़ हो जेल में तेरी तस्वीर होती तो हँसकर सज़ा काटता

Tehzeeb Hafi

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ख़ामोश लब हैं झुकी हैं पलकें, दिलों में उल्फ़त नई नई है अभी तक़ल्लुफ़ है गुफ़्तगू में, अभी मोहब्बत नई नई है अभी न आएँगी नींद तुम को, अभी न हम को सुकूँ मिलेगा अभी तो धड़केगा दिल ज़ियादा, अभी मुहब्बत नई नई है बहार का आज पहला दिन है, चलो चमन में टहल के आएँ फ़ज़ा में ख़ुशबू नई नई है गुलों में रंगत नई नई है जो ख़ानदानी रईस हैं वो मिज़ाज रखते हैं नर्म अपना तुम्हारा लहजा बता रहा है, तुम्हारी दौलत नई नई है ज़रा सा क़ुदरत ने क्या नवाज़ा के आके बैठे हो पहली सफ़ में अभी क्यूँ उड़ने लगे हवा में अभी तो शोहरत नई नई है बमों की बरसात हो रही है, पुराने जांबाज़ सो रहे हैं ग़ुलाम दुनिया को कर रहा है वो जिस की ताक़त नई नई है

Shabeena Adeeb

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ये मैं ने कब कहा कि मेरे हक़ में फ़ैसला करे अगर वो मुझ से ख़ुश नहीं है तो मुझे जुदा करे मैं उस के साथ जिस तरह गुज़ारता हूँ ज़िंदगी उसे तो चाहिए कि मेरा शुक्रिया अदा करे मेरी दुआ है और इक तरह से बद-दुआ भी है ख़ुदा तुम्हें तुम्हारे जैसी बेटियाँ अता करे बना चुका हूँ मैं मोहब्बतों के दर्द की दवा अगर किसी को चाहिए तो मुझ सेे राब्ता करे

Tehzeeb Hafi

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अब के बरस दस्तूर-ए-सितम में क्या क्या बाब ईज़ाद हुए जो क़ातिल थे मक़्तूल हुए जो सैद थे अब सय्याद हुए पहले भी ख़िज़ाँ में बाग़ उजड़े पर यूँँ नहीं जैसे अब के बरस सारे बूटे पत्ता पत्ता रविश रविश बर्बाद हुए पहले भी तवाफ़-ए-शम्-ए-वफ़ा थी रस्म मोहब्बत वालों की हम तुम से पहले भी यहाँ 'मंसूर' हुए 'फ़रहाद' हुए इक गुल के मुरझाने पर क्या गुलशन में कोहराम मचा इक चेहरा कुम्हला जाने से कितने दिल नाशाद हुए 'फ़ैज़' न हम 'यूसुफ़' न कोई 'याक़ूब' जो हम को याद करे अपनी क्या कनआँ में रहे या मिस्र में जा आबाद हुए

Faiz Ahmad Faiz

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गर्मी-ऐ-शौक़-ऐ-नज़ारा का असर तो देखो गुल खिले जाते हैं वो साया-ए-तर तो देखो ऐसे नादाँ भी न थे जाँ से गुज़रने वाले नासेहो पंद-गरो राह-गुज़र तो देखो वो तो वो है तुम्हें हो जाएगी उल्फ़त मुझ से इक नज़र तुम मिरा महबूब-ए-नज़र तो देखो वो जो अब चाक गरेबाँ भी नहीं करते हैं देखने वालो कभी उन का जिगर तो देखो दामन-ए-दर्द को गुलज़ार बना रक्खा है आओ इक दिन दिल-ए-पुर-ख़ूँ का हुनर तो देखो सुब्ह की तरह झमकता है शब-ए-ग़म का उफ़ुक़ 'फ़ैज़' ताबिंदगी-ए-दीदा-ए-तर तो देखो

Faiz Ahmad Faiz

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बात बस से निकल चली है दिल की हालत सँभल चली है अब जुनूँ हद से बढ़ चला है अब तबीअ'त बहल चली है अश्क ख़ूनाब हो चले हैं ग़म की रंगत बदल चली है या यूँँही बुझ रही हैं शमएँ या शब-ए-हिज्र टल चली है लाख पैग़ाम हो गए हैं जब सबा एक पल चली है जाओ अब सो रहो सितारो दर्द की रात ढल चली है

Faiz Ahmad Faiz

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क़र्ज़-ए-निगाह-ए-यार अदा कर चुके हैं हम सब कुछ निसार-ए-राह-ए-वफ़ा कर चुके हैं हम कुछ इम्तिहान-ए-दस्त-ए-जफ़ा कर चुके हैं हम कुछ उन की दस्तरस का पता कर चुके हैं हम अब एहतियात की कोई सूरत नहीं रही क़ातिल से रस्म-ओ-राह सिवा कर चुके हैं हम देखें है कौन कौन ज़रूरत नहीं रही कू-ए-सितम में सब को ख़फ़ा कर चुके हैं हम अब अपना इख़्तियार है चाहे जहाँ चलें रहबर से अपनी राह जुदा कर चुके हैं हम उन की नज़र में क्या करें फीका है अब भी रंग जितना लहू था सर्फ़-ए-क़बा कर चुके हैं हम कुछ अपने दिल की ख़ू का भी शुक्राना चाहिए सौ बार उन की ख़ू का गिला कर चुके हैं हम

Faiz Ahmad Faiz

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सभी कुछ है तेरा दिया हुआ सभी राहतें सभी कुल्फ़तें कभी सोहबतें कभी फ़ुर्क़तें कभी दूरियाँ कभी क़ुर्बतें ये सुख़न जो हम ने रक़म किए ये हैं सब वरक़ तिरी याद के कोई लम्हा सुब्ह-ए-विसाल का कोई शाम-ए-हिज्र की मुद्दतें जो तुम्हारी मान लें नासेहा तो रहेगा दामन-ए-दिल में क्या न किसी अदू की अदावतें न किसी सनम की मुरव्वतें चलो आओ तुम को दिखाएँ हम जो बचा है मक़्तल-ए-शहर में ये मज़ार अहल-ए-सफ़ा के हैं ये हैं अहल-ए-सिद्क़ की तुर्बतें मिरी जान आज का ग़म न कर कि न जाने कातिब-ए-वक़्त ने किसी अपने कल में भी भूल कर कहीं लिख रखी हों मसर्रतें

Faiz Ahmad Faiz

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