ghazalKuch Alfaaz

हंगामा-ए-आफ़ात इधर भी है उधर भी बर्बादी-ए-हालात इधर भी है उधर भी होंटों पे तबस्सुम कभी पलकों पे सितारे ये दिल की करामात इधर भी है उधर भी बेचैन अगर मैं हूँ तो वो भी हैं परेशाँ दर-पर्दा कोई बात इधर भी है उधर भी आशुफ़्तगी-ए-क़ल्ब-ओ-नज़र छुप न सकेगी इक महशर-ए-जज़्बात इधर भी है उधर भी हर चंद तकल्लुफ़ है मुलाक़ात में लेकिन अरमान-ए-मुलाक़ात इधर भी है उधर भी मुजरिम किसे गर्दानिये कहिए किसे मासूम इक सैल-ए-शिकायात इधर भी है उधर भी क्यूँँकर कभी निकलेगी कोई सुल्ह की सूरत इक तल्ख़ी-जज़्बात इधर भी है उधर भी उन को भी कोई रंज है मुझ को भी कोई ग़म इक फ़िक्र सी दिन रात इधर भी है उधर भी अफ़्सोस भरी बज़्म में भी मिल नहीं सकते कुछ पास-ए-रिवायात इधर भी है उधर भी जो तर्क-ए-तअ'ल्लुक़ पे भी जाती नहीं दिल से वो दिल की लगी बात इधर भी है उधर भी नाले भी शरर-बार हैं नग़्में भी शरर-बार इक आतिश-ए-जज़्बात इधर भी है उधर भी 'अख़्गर' ही का दामन नहीं नमनाक शब-ए-ग़म आँखों की ये बरसात इधर भी है उधर भी

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सो रहेंगे के जागते रहेंगे हम तेरे ख़्वाब देखते रहेंगे तू कही और ही ढूंढता रहेंगा हम कही और ही खिले रहेंगे राहगीरों ने राह बदलनी है पेड़ अपनी जगह खड़े रहेंगे सभी मौसम है दस्तरस में तेरी तू ने चाहा तो हम हरे रहेंगे लौटना कब है तू ने पर तुझ को आदतन ही पुकारते रहेंगे तुझ को पाने में मसअला ये है तुझ को खोने के वसवसे रहेंगे तू इधर देख मुझ सेे बातें कर यार चश्में तो फूटते रहेंगे एक मुद्दत हुई है तुझ सेे मिले तू तो कहता था राब्ते रहेंगे

Tehzeeb Hafi

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आँखों के साथ उसे मिरा हँसना नहीं पसंद दरिया हो या हो घाव उसे गहरा नहीं पसंद तारीख़ आ चुकी है उधर कार्ड छप गए अब कब कहेगी तुझ को वो लड़का नहीं पसंद तुम को तो मुझ से गुफ़्तुगू करना पसंद था अब क्यूँ मिरी मज़ार पे रुकना नहीं पसंद कपड़ों से इत्र तक या किताबों से हार तक वो बोले तो सही कि उसे क्या नहीं पसंद इक दिन पड़ा मिला था मुझे रास्तों पे और इक दिन सुना उसे मिरा छूना नहीं पसंद

Kushal Dauneria

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बुलाती है मगर जाने का नहीं ये दुनिया है इधर जाने का नहीं मेरे बेटे किसी से इश्क़ कर मगर हद से गुज़र जाने का नहीं ज़मीं भी सर पे रखनी हो तो रखो चले हो तो ठहर जाने का नहीं सितारे नोच कर ले जाऊँगा मैं ख़ाली हाथ घर जाने का नहीं वबा फैली हुई है हर तरफ़ अभी माहौल मर जाने का नहीं वो गर्दन नापता है नाप ले मगर जालिम से डर जाने का नहीं

Rahat Indori

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ये सात आठ पड़ोसी कहाँ से आए मेरे तुम्हारे दिल में तो कोई न था सिवाए मेरे किसी ने पास बिठाया बस आगे याद नहीं मुझे तो दोस्त वहाँ से उठा के लाए मेरे ये सोच कर न किए अपने दर्द उस के सुपुर्द वो लालची है असासे न बेच खाए मेरे इधर किधर तू नया है यहाँ कि पागल है किसी ने क्या तुझे क़िस्से नहीं सुनाए मेरे वो आज़माए मेरे दोस्त को ज़रूर मगर उसे कहो कि तरीके न आज़माए मेरे

Umair Najmi

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कोई उम्मीद बर नहीं आती कोई सूरत नज़र नहीं आती मौत का एक दिन मुअय्यन है नींद क्यूँँ रात भर नहीं आती आगे आती थी हाल-ए-दिल पे हँसी अब किसी बात पर नहीं आती जानता हूँ सवाब-ए-ताअत-ओ-ज़ोहद पर तबीअत इधर नहीं आती है कुछ ऐसी ही बात जो चुप हूँ वर्ना क्या बात कर नहीं आती क्यूँँ न चीख़ूँ कि याद करते हैं मेरी आवाज़ गर नहीं आती दाग़-ए-दिल गर नज़र नहीं आता बू भी ऐ चारा-गर नहीं आती हम वहाँ हैं जहाँ से हम को भी कुछ हमारी ख़बर नहीं आती मरते हैं आरज़ू में मरने की मौत आती है पर नहीं आती का'बा किस मुँह से जाओगे 'ग़ालिब' शर्म तुम को मगर नहीं आती

Mirza Ghalib

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