हर-चंद ग़म-ओ-दर्द की क़ीमत भी बहुत थी लेना ही पड़ा दिल को ज़रूरत भी बहुत थी ज़ालिम था वो और ज़ुल्म की आदत भी बहुत थी मजबूर थे हम उस से मोहब्बत भी बहुत थी गो तर्क-ए-तअ'ल्लुक़ में सुहूलत भी बहुत थी लेकिन न हुआ हम से कि ग़ैरत भी बहुत थी उस बुत के सितम सह के दिखा ही दिया हम ने गो अपनी तबीअ'त में बग़ावत भी बहुत थी वाक़िफ़ ही न था रम्ज़-ए-मोहब्बत से वो वर्ना दिल के लिए थोड़ी सी इनायत ही बहुत थी यूँँ ही नहीं मशहूर-ए-ज़माना मिरा क़ातिल उस शख़्स को इस फ़न में महारत भी बहुत थी क्या दाैर-ए-ग़ज़ल था कि लहू दिल में बहुत था और दिल को लहू करने के फ़ुर्सत भी बहुत थी हर शाम सुनाते थे हसीनों को ग़ज़ल हम जब माल बहुत था तो सख़ावत भी बहुत थी बुलवा के हम 'आजिज़' को पशेमाँ भी बहुत हैं क्या कीजिए कम-बख़्त की शोहरत भी बहुत थी
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किसी लिबास की ख़ुशबू जब उड़ के आती है तेरे बदन की जुदाई बहुत सताती है तेरे गुलाब तरसते हैं तेरी ख़ुशबू को तेरी सफ़ेद चमेली तुझे बुलाती है तेरे बग़ैर मुझे चैन कैसे पड़ता हैं मेरे बगैर तुझे नींद कैसे आती है
Jaun Elia
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मुझे उदास कर गए हो ख़ुश रहो मिरे मिज़ाज पर गए हो ख़ुश रहो मिरे लिए न रुक सके तो क्या हुआ जहाँ कहीं ठहर गए हो ख़ुश रहो ख़ुशी हुई है आज तुम को देख कर बहुत निखर सँवर गए हो ख़ुश रहो उदास हो किसी की बे-वफ़ाई पर वफ़ा कहीं तो कर गए हो ख़ुश रहो गली में और लोग भी थे आश्ना हमें सलाम कर गए हो ख़ुश रहो तुम्हें तो मेरी दोस्ती पे नाज़ था इसी से अब मुकर गए हो ख़ुश रहो किसी की ज़िन्दगी बनो कि बंदगी मिरे लिए तो मर गए हो ख़ुश रहो
Fazil Jamili
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तो क्या ये आख़िरी ख़्वाहिश है अच्छा भूल जाऊँ जहाँ भी जो भी है तेरे अलावा भूल जाऊँ तो क्या ये दूसरा ही इश्क़ असली इश्क़ समझूँ तो पहला तजरबे की देन में था भूल जाऊँ तो क्या इतना ही आसाँ है किसी को भूल जाना कि बस बातों ही बातों में भुलाता भूल जाऊँ कभी कहता हूँ उस को याद रखना ठीक होगा मगर फिर सोचता हूँ फ़ाएदा क्या भूल जाऊँ ये कोई क़त्ल थोड़ी है कि बात आई गई हो मैं और अपना नज़र-अंदाज़ होना भूल जाऊँ है इतनी जुज़इयात इस सानहे की पूछिए मत मैं क्या क्या याद रक्खूँ और क्या क्या भूल जाऊँ कोई कब तक किसी की बे-वफ़ाई याद रक्खे बहुत मुमकिन है मैं भी रफ़्ता रफ़्ता भूल जाऊँ तो क्या ये कह के ख़ुद को मुतमइन कर लोगे 'जव्वाद' कि वो है भी इसी लाइक़ लिहाज़ा भूल जाऊँ
Jawwad Sheikh
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वो एक पक्षी जो गुंजन कर रहा है वो मुझ में प्रेम सृजन कर रहा है बहुत दिन हो गए है तुम सेे बिछड़े तुम्हें मिलने को अब मन कर रहा है नदी के शांत तट पर बैठ कर मन तेरी यादें विसर्जन कर रहा है
Azhar Iqbal
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पत्थर पहले ख़ुद को पत्थर करता है उस के बा'द ही कुछ कारीगर करता है एक ज़रा सी कश्ती ने ललकारा है अब देखें क्या ढोंग समुंदर करता है कान लगा कर मौसम की बातें सुनिए क़ुदरत का सब हाल उजागर करता है उस की बातों में रस कैसे पैदा हो बात बहुत ही सोच-समझकर करता है जिस को देखो 'दानिश' का दीवाना है क्या वो कोई जादू-मंतर करता है
Madan Mohan Danish
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धड़कता जाता है दिल मुस्कुराने वालों का उठा नहीं है अभी ए'तिबार नालों का ये मुख़्तसर सी है रूदाद-ए-सुब्ह-ए-मय-ख़ाना ज़मीं पे ढेर था टूटे हुए पियालों का ये ख़ौफ़ है कि सबा लड़खड़ा के गिर न पड़े पयाम ले के चली है शिकस्ता-हालों का न आएँ अहल-ए-ख़िरद वादी-ए-जुनूँ की तरफ़ यहाँ गुज़र नहीं दामन बचाने वालों का लिपट लिपट के गले मिल रहे थे ख़ंजर से बड़े ग़ज़ब का कलेजा था मरने वालों का
Kaleem Aajiz
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शाने का बहुत ख़ून-ए-जिगर जाए है प्यारे तब ज़ुल्फ़ कहीं ता-ब-कमर जाए है प्यारे जिस दिन कोई ग़म मुझ पे गुज़र जाए है प्यारे चेहरा तिरा उस रोज़ निखर जाए है प्यारे इक घर भी सलामत नहीं अब शहर-ए-वफ़ा में तू आग लगाने को किधर जाए है प्यारे रहने दे जफ़ाओं की कड़ी धूप में मुझ को साए में तो हर शख़्स ठहर जाए है प्यारे वो बात ज़रा सी जिसे कहते हैं ग़म-ए-दिल समझाने में इक उम्र गुज़र जाए है प्यारे हर-चंद कोई नाम नहीं मेरी ग़ज़ल में तेरी ही तरफ़ सब की नज़र जाए प्यारे
Kaleem Aajiz
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मिरी शाएरी में न रक़्स-ए-जाम न मय की रंग-फ़िशानियाँ वही दुख-भरों की हिकायतें वही दिल-जलों की कहानियाँ ये जो आह-ओ-नाला-ओ-दर्द हैं किसी बे-वफ़ा की निशानियाँ यही मेरे दिन के रफ़ीक़ हैं यही मेरी रात की रानियाँ ये मिरी ज़बाँ पे ग़ज़ल नहीं मैं सुना रहा हूँ कहानियाँ कि किसी के अहद-ए-शबाब पर मिटीं कैसी कैसी जवानियाँ कभी आँसुओं को सुखा गईं मिरे सोज़-ए-दिल की हरारतें कभी दिल की नाव डुबो गईं मिरे आँसुओं की रवानियाँ अभी उस को इस की ख़बर कहाँ कि क़दम कहाँ है नज़र कहाँ अभी मस्लहत का गुज़र कहाँ कि नई नई हैं जवानियाँ ये बयान-ए-हाल ये गुफ़्तुगू है मिरा निचोड़ा हुआ लहू अभी सुन लो मुझ से कि फिर कभू न सुनोगे ऐसी कहानियाँ
Kaleem Aajiz
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क्या ग़म है अगर शिकवा-ए-ग़म आम है प्यारे तू दिल को दुखा तेरा यही काम है प्यारे तेरे ही तबस्सुम का सहर नाम है प्यारे तू खोल दे गेसू तो अभी शाम है प्यारे इस वक़्त तिरा जान-ए-जहाँ नाम है प्यारे जो काम तू कर दे वो बड़ा काम है प्यारे जब प्यार किया चैन से क्या काम है प्यारे इस में तो तड़पने ही में आराम है प्यारे छूटी है न छूटेगी कभी प्यार की आदत मैं ख़ूब समझता हूँ जो अंजाम है प्यारे ऐ काश मिरी बात समझ में तिरी आए मेरी जो ग़ज़ल है मिरा पैग़ाम है प्यारे मैं हूँ जहाँ सौ फ़िक्र में सौ रंज में सौ दर्द तू है जहाँ आराम ही आराम है प्यारे गो मैं ने कभी अपनी ज़बाँ पर नहीं लाया सब जान रहे हैं तिरा क्या नाम है प्यारे हम दिल को लगा कर भी खटकते हैं दिलों में तू दिल को दिखा कर भी दिल-आराम है प्यारे कहता हूँ ग़ज़ल और रहा करता हूँ सरशार मेरा यही शीशा है यही जाम है प्यारे
Kaleem Aajiz
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मेरी सुब्ह-ए-ग़म बला से कभी शाम तक न पहुंचे मुझे डर ये है बुराई तेरे नाम तक न पहुंचे मेरे पास क्या वो आते मेरा दर्द क्या मिटाते मेरा हाल देखने को लब-ए-बाम तक न पहुंचे हो किसी का मुझ पे एहसांये नहीं पसंद मुझ को तेरी सुब्ह की तजल्ली मेरी शाम तक न पहुंचे तेरी बेरुख़ी पे ज़ालिम मेरा जी ये चाहता है कि वफ़ा का मेरे लब पर कभी नाम तक न पहुंचे मैं फ़ुग़ान-ए-बे-असर का कभी मोतरिफ़ नहीं हूँ वो सदा ही क्या जो उन के दर-ओ-बाम तक न पहुंचे वो सनम बिगड़ के मुझ से मेरा क्या बिगाड़ लेगा कभी राज़ खोल दूँ मैं तो सलाम तक न पहुंचे मुझे लज़्ज़त-ए-असीरी का सबक़ पढ़ा रहे हैं जो निकल के आशियांसे कभी दाम तक न पहुंचे उन्हें मेहरबांसमझ लें मुझे क्या ग़रज़ पड़ी है वो करम का हाथ ही क्या जो अवाम तक न पहुंचे हुए फ़ैज़-ए-मय-कदास सभी फ़ैज़याब लेकिन जो ग़रीब तिश्ना-लब थे वही जाम तक न पहुंचे जिसे मैं ने जगमगाया उसी अंजुमन में साक़ी मेरा ज़िक्र तक न आए मेरा नाम तक न पहुंचे तुम्हें याद ही न आऊंये है और बात वर्ना मैं नहीं हूंदूर इतना कि सलाम तक न पहुंचे
Kaleem Aajiz
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