ghazalKuch Alfaaz

शाने का बहुत ख़ून-ए-जिगर जाए है प्यारे तब ज़ुल्फ़ कहीं ता-ब-कमर जाए है प्यारे जिस दिन कोई ग़म मुझ पे गुज़र जाए है प्यारे चेहरा तिरा उस रोज़ निखर जाए है प्यारे इक घर भी सलामत नहीं अब शहर-ए-वफ़ा में तू आग लगाने को किधर जाए है प्यारे रहने दे जफ़ाओं की कड़ी धूप में मुझ को साए में तो हर शख़्स ठहर जाए है प्यारे वो बात ज़रा सी जिसे कहते हैं ग़म-ए-दिल समझाने में इक उम्र गुज़र जाए है प्यारे हर-चंद कोई नाम नहीं मेरी ग़ज़ल में तेरी ही तरफ़ सब की नज़र जाए प्यारे

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यही अपनी कहानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले वो लड़की जाँ हमारी थी, मियाँ पहले बहुत पहले वहम मुझ को ये भाता है,अभी मेरी दिवानी है मगर मेरी दिवानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले रक़ीब आ कर बताते हैं यहाँ तिल है, वहाँ तिल है हमें ये जानकारी थी मियाँ पहले, बहुत पहले अदब से माँग कर माफ़ी भरी महफ़िल ये कहता हूँ वो लड़की ख़ानदानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले

Anand Raj Singh

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जो तेरे साथ रहते हुए सोगवार हो लानत हो ऐसे शख़्स पे और बेशुमार हो अब इतनी देर भी ना लगा, ये हो ना कहीं तू आ चुका हो और तेरा इंतिज़ार हो मैं फूल हूँ तो फिर तेरे बालो में क्यूँ नहीं हूँ तू तीर है तो मेरे कलेजे के पार हो एक आस्तीन चढ़ाने की आदत को छोड़ कर ‘हाफ़ी’ तुम आदमी तो बहुत शानदार हो

Tehzeeb Hafi

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चाँद सितारे फूल परिंदे शाम सवेरा एक तरफ़ सारी दुनिया उस का चर्बा उस का चेहरा एक‌ तरफ़ वो लड़कर भी सो जाए तो उस का माथा चूमूँ मैं उस सेे मुहब्बत एक तरफ़ है उस सेे झगड़ा एक तरफ़ जिस शय पर वो उँगली रख दे उस को वो दिलवानी है उस की ख़ुशियाँ सब से अव्वल सस्ता महँगा एक तरफ़ ज़ख़्मों पर मरहम लगवाओ लेकिन उस के हाथों से चारासाज़ी एक तरफ़ है उस का छूना एक तरफ़ सारी दुनिया जो भी बोले सब कुछ शोर शराबा है सब का कहना एक तरफ़ है उस का कहना एक तरफ़ उस ने सारी दुनिया माँगी मैं ने उस को माँगा है उस के सपने एक तरफ़ है मेरा सपना एक तरफ़

Varun Anand

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तुम्हें बस ये बताना चाहता हूँ मैं तुम से क्या छुपाना चाहता हूँ कभी मुझ से भी कोई झूठ बोलो मैं हाँ में हाँ मिलाना चाहता हूँ ये जो खिड़की है नक़्शे में तुम्हारे यहाँ मैं दर बनाना चाहता हूँ अदाकारी बहुत दुख दे रही है मैं सच-मुच मुस्कुराना चाहता हूँ परों में तीर है पंजों में तिनके मैं ये चिड़िया उड़ाना चाहता हूँ लिए बैठा हूँ घुँघरू फूल मोती तिरा हँसना बनाना चाहता हूँ अमीरी इश्क़ की तुम को मुबारक मैं बस खाना-कमाना चाहता हूँ मैं सारे शहर की बैसाखियों को तिरे दर पर नचाना चाहता हूँ मुझे तुम सेे बिछड़ना ही पड़ेगा मैं तुम को याद आना चाहता हूँ

Fahmi Badayuni

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किसी लिबास की ख़ुशबू जब उड़ के आती है तेरे बदन की जुदाई बहुत सताती है तेरे गुलाब तरसते हैं तेरी ख़ुशबू को तेरी सफ़ेद चमेली तुझे बुलाती है तेरे बग़ैर मुझे चैन कैसे पड़ता हैं मेरे बगैर तुझे नींद कैसे आती है

Jaun Elia

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मेरी सुब्ह-ए-ग़म बला से कभी शाम तक न पहुंचे मुझे डर ये है बुराई तेरे नाम तक न पहुंचे मेरे पास क्या वो आते मेरा दर्द क्या मिटाते मेरा हाल देखने को लब-ए-बाम तक न पहुंचे हो किसी का मुझ पे एहसांये नहीं पसंद मुझ को तेरी सुब्ह की तजल्ली मेरी शाम तक न पहुंचे तेरी बेरुख़ी पे ज़ालिम मेरा जी ये चाहता है कि वफ़ा का मेरे लब पर कभी नाम तक न पहुंचे मैं फ़ुग़ान-ए-बे-असर का कभी मोतरिफ़ नहीं हूँ वो सदा ही क्या जो उन के दर-ओ-बाम तक न पहुंचे वो सनम बिगड़ के मुझ से मेरा क्या बिगाड़ लेगा कभी राज़ खोल दूँ मैं तो सलाम तक न पहुंचे मुझे लज़्ज़त-ए-असीरी का सबक़ पढ़ा रहे हैं जो निकल के आशियांसे कभी दाम तक न पहुंचे उन्हें मेहरबांसमझ लें मुझे क्या ग़रज़ पड़ी है वो करम का हाथ ही क्या जो अवाम तक न पहुंचे हुए फ़ैज़-ए-मय-कदास सभी फ़ैज़याब लेकिन जो ग़रीब तिश्ना-लब थे वही जाम तक न पहुंचे जिसे मैं ने जगमगाया उसी अंजुमन में साक़ी मेरा ज़िक्र तक न आए मेरा नाम तक न पहुंचे तुम्हें याद ही न आऊंये है और बात वर्ना मैं नहीं हूंदूर इतना कि सलाम तक न पहुंचे

Kaleem Aajiz

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धड़कता जाता है दिल मुस्कुराने वालों का उठा नहीं है अभी ए'तिबार नालों का ये मुख़्तसर सी है रूदाद-ए-सुब्ह-ए-मय-ख़ाना ज़मीं पे ढेर था टूटे हुए पियालों का ये ख़ौफ़ है कि सबा लड़खड़ा के गिर न पड़े पयाम ले के चली है शिकस्ता-हालों का न आएँ अहल-ए-ख़िरद वादी-ए-जुनूँ की तरफ़ यहाँ गुज़र नहीं दामन बचाने वालों का लिपट लिपट के गले मिल रहे थे ख़ंजर से बड़े ग़ज़ब का कलेजा था मरने वालों का

Kaleem Aajiz

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मुझे इस का कोई गिला नहीं कि बहार ने मुझे क्या दिया तिरी आरज़ू तो निकाल दी तिरा हौसला तो बढ़ा दिया गो सितम ने तेरे हर इक तरह मुझे ना-उमीद बना दिया ये मिरी वफ़ा का कमाल है कि निबाह कर के दिखा दिया कोई बज़्म हो कोई अंजुमन ये शिआ'र अपना क़दीम है जहाँ रौशनी की कमी मिली वहीं इक चराग़ जला दिया तुझे अब भी मेरे ख़ुलूस का न यक़ीन आए तो क्या करूँँ तिरे गेसुओं को सँवार कर तुझे आइना भी दिखा दिया मेरी शाइ'री में तिरे सिवा कोई माजरा है न मुद्दआ' जो तिरी नज़र का फ़साना था वो मिरी ग़ज़ल ने सुना दिया ये ग़रीब 'आजिज़'-ए-बे-वतन ये ग़ुबार-ए-ख़ातिर-ए-अंजुमन ये ख़राब जिस के लिए हुआ उसी बे-वफ़ा ने भुला दिया

Kaleem Aajiz

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मैं रोऊँ हूँ रोना मुझे भाए है किसी का भला इस में क्या जाए है दिल आए है फिर दिल में दर्द आए है यूँँ ही बात में बात बढ़ जाए है कोई देर से हाथ फैलाए है वो ना-मेहरबाँ आए है जाए है मोहब्बत में दिल जाए गर जाए है जो खोए नहीं है वो क्या पाए है जुनूँ सब इशारे में कह जाए है मगर अक़्ल को कब समझ आए है पुकारूँ हूँ लेकिन न बाज़ आए है ये दुनिया कहाँ डूबने जाए है ख़मोशी में हर बात बन जाए है जो बोले है दीवाना कहलाए है क़यामत जहाँ आएगी आएगी यहाँ सुब्ह आए है शाम आए है जुनूँ ख़त्म दार-ओ-रसन पर नहीं ये रस्ता बहुत दूर तक जाए है

Kaleem Aajiz

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मुँह फ़क़ीरों से न फेरा चाहिए ये तो पूछा चाहिए क्या चाहिए चाह का मेआ'र ऊँचा चाहिए जो न चाहें उन को चाहा चाहिए कौन चाहे है किसी को बे-ग़रज़ चाहने वालों से भागा चाहिए हम तो कुछ चाहे हैं तुम चाहो हो कुछ वक़्त क्या चाहे है देखा चाहिए चाहते हैं तेरे ही दामन की ख़ैर हम हैं दीवाने हमें क्या चाहिए बे-रुख़ी भी नाज़ भी अंदाज़ भी चाहिए लेकिन न इतना चाहिए हम जो कहना चाहते हैं क्या कहें आप कह लीजे जो कहना चाहिए बात चाहे बे-सलीक़ा हो 'कलीम' बात कहने का सलीक़ा चाहिए

Kaleem Aajiz

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