ghazalKuch Alfaaz

मुझे इस का कोई गिला नहीं कि बहार ने मुझे क्या दिया तिरी आरज़ू तो निकाल दी तिरा हौसला तो बढ़ा दिया गो सितम ने तेरे हर इक तरह मुझे ना-उमीद बना दिया ये मिरी वफ़ा का कमाल है कि निबाह कर के दिखा दिया कोई बज़्म हो कोई अंजुमन ये शिआ'र अपना क़दीम है जहाँ रौशनी की कमी मिली वहीं इक चराग़ जला दिया तुझे अब भी मेरे ख़ुलूस का न यक़ीन आए तो क्या करूँँ तिरे गेसुओं को सँवार कर तुझे आइना भी दिखा दिया मेरी शाइ'री में तिरे सिवा कोई माजरा है न मुद्दआ' जो तिरी नज़र का फ़साना था वो मिरी ग़ज़ल ने सुना दिया ये ग़रीब 'आजिज़'-ए-बे-वतन ये ग़ुबार-ए-ख़ातिर-ए-अंजुमन ये ख़राब जिस के लिए हुआ उसी बे-वफ़ा ने भुला दिया

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मेरे बस में नहीं वरना क़ुदरत का लिखा हुआ काटता तेरे हिस्से में आए बुरे दिन कोई दूसरा काटता लारियों से ज़्यादा बहाव था तेरे हर इक लफ्ज़ में मैं इशारा नहीं काट सकता तेरी बात क्या काटता मैं ने भी ज़िंदगी और शब ए हिज्र काटी है सबकी तरह वैसे बेहतर तो ये था के मैं कम से कम कुछ नया काटता तेरे होते हुए मोमबत्ती बुझाई किसी और ने क्या ख़ुशी रह गई थी जन्मदिन की, मैं केक क्या काटता कोई भी तो नहीं जो मेरे भूखे रहने पे नाराज़ हो जेल में तेरी तस्वीर होती तो हँसकर सज़ा काटता

Tehzeeb Hafi

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ये ग़म क्या दिल की आदत है नहीं तो किसी से कुछ शिकायत है नहीं तो है वो इक ख़्वाब-ए-बे-ताबीर उस को भुला देने की निय्यत है नहीं तो किसी के बिन किसी की याद के बिन जिए जाने की हिम्मत है नहीं तो किसी सूरत भी दिल लगता नहीं हाँ तो कुछ दिन से ये हालत है नहीं तो तेरे इस हाल पर है सब को हैरत तुझे भी इस पे हैरत है नहीं तो हम-आहंगी नहीं दुनिया से तेरी तुझे इस पर नदामत है नहीं तो हुआ जो कुछ यही मक़्सूम था क्या यही सारी हिकायत है नहीं तो अज़िय्यत-नाक उम्मीदों से तुझ को अमाँ पाने की हसरत है नहीं तो तू रहता है ख़याल-ओ-ख़्वाब में गुम तो इस की वज्ह फ़ुर्सत है नहीं तो सबब जो इस जुदाई का बना है वो मुझ सेे ख़ूब-सूरत है नहीं तो

Jaun Elia

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क्यूँँ डरें ज़िन्दगी में क्या होगा कुछ न होगा तो तजरबा होगा हँसती आँखों में झाँक कर देखो कोई आँसू कहीं छुपा होगा इन दिनों ना-उमीद सा हूँ मैं शायद उस ने भी ये सुना होगा देख कर तुम को सोचता हूँ मैं क्या किसी ने तुम्हें छुआ होगा

Javed Akhtar

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चादर की इज़्ज़त करता हूँ और पर्दे को मानता हूँ हर पर्दा पर्दा नहीं होता इतना मैं भी जानता हूँ सारे मर्द एक जैसे हैं तुम ने कैसे कह डाला मैं भी तो एक मर्द हूँ तुम को ख़ुद से बेहतर मानता हूँ मैं ने उस सेे प्यार किया है मिल्कियत का दावा नहीं वो जिस के भी साथ है मैं उस को भी अपना मानता हूँ चादर की इज़्ज़त करता हूँ और पर्दे को मानता हूँ हर पर्दा पर्दा नहीं होता इतना मैं भी जानता हूँ

Ali Zaryoun

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तुम हक़ीक़त नहीं हो हसरत हो जो मिले ख़्वाब में वो दौलत हो तुम हो ख़ुशबू के ख़्वाब की ख़ुशबू और इतने ही बेमुरव्वत हो किस तरह छोड़ दूँ तुम्हें जानाँ तुम मेरी ज़िन्दगी की आदत हो किसलिए देखते हो आईना तुम तो ख़ुद से भी ख़ूब-सूरत हो दास्ताँ ख़त्म होने वाली है तुम मेरी आख़िरी मुहब्बत हो

Jaun Elia

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मेरी सुब्ह-ए-ग़म बला से कभी शाम तक न पहुंचे मुझे डर ये है बुराई तेरे नाम तक न पहुंचे मेरे पास क्या वो आते मेरा दर्द क्या मिटाते मेरा हाल देखने को लब-ए-बाम तक न पहुंचे हो किसी का मुझ पे एहसांये नहीं पसंद मुझ को तेरी सुब्ह की तजल्ली मेरी शाम तक न पहुंचे तेरी बेरुख़ी पे ज़ालिम मेरा जी ये चाहता है कि वफ़ा का मेरे लब पर कभी नाम तक न पहुंचे मैं फ़ुग़ान-ए-बे-असर का कभी मोतरिफ़ नहीं हूँ वो सदा ही क्या जो उन के दर-ओ-बाम तक न पहुंचे वो सनम बिगड़ के मुझ से मेरा क्या बिगाड़ लेगा कभी राज़ खोल दूँ मैं तो सलाम तक न पहुंचे मुझे लज़्ज़त-ए-असीरी का सबक़ पढ़ा रहे हैं जो निकल के आशियांसे कभी दाम तक न पहुंचे उन्हें मेहरबांसमझ लें मुझे क्या ग़रज़ पड़ी है वो करम का हाथ ही क्या जो अवाम तक न पहुंचे हुए फ़ैज़-ए-मय-कदास सभी फ़ैज़याब लेकिन जो ग़रीब तिश्ना-लब थे वही जाम तक न पहुंचे जिसे मैं ने जगमगाया उसी अंजुमन में साक़ी मेरा ज़िक्र तक न आए मेरा नाम तक न पहुंचे तुम्हें याद ही न आऊंये है और बात वर्ना मैं नहीं हूंदूर इतना कि सलाम तक न पहुंचे

Kaleem Aajiz

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धड़कता जाता है दिल मुस्कुराने वालों का उठा नहीं है अभी ए'तिबार नालों का ये मुख़्तसर सी है रूदाद-ए-सुब्ह-ए-मय-ख़ाना ज़मीं पे ढेर था टूटे हुए पियालों का ये ख़ौफ़ है कि सबा लड़खड़ा के गिर न पड़े पयाम ले के चली है शिकस्ता-हालों का न आएँ अहल-ए-ख़िरद वादी-ए-जुनूँ की तरफ़ यहाँ गुज़र नहीं दामन बचाने वालों का लिपट लिपट के गले मिल रहे थे ख़ंजर से बड़े ग़ज़ब का कलेजा था मरने वालों का

Kaleem Aajiz

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शाने का बहुत ख़ून-ए-जिगर जाए है प्यारे तब ज़ुल्फ़ कहीं ता-ब-कमर जाए है प्यारे जिस दिन कोई ग़म मुझ पे गुज़र जाए है प्यारे चेहरा तिरा उस रोज़ निखर जाए है प्यारे इक घर भी सलामत नहीं अब शहर-ए-वफ़ा में तू आग लगाने को किधर जाए है प्यारे रहने दे जफ़ाओं की कड़ी धूप में मुझ को साए में तो हर शख़्स ठहर जाए है प्यारे वो बात ज़रा सी जिसे कहते हैं ग़म-ए-दिल समझाने में इक उम्र गुज़र जाए है प्यारे हर-चंद कोई नाम नहीं मेरी ग़ज़ल में तेरी ही तरफ़ सब की नज़र जाए प्यारे

Kaleem Aajiz

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मिरी शाएरी में न रक़्स-ए-जाम न मय की रंग-फ़िशानियाँ वही दुख-भरों की हिकायतें वही दिल-जलों की कहानियाँ ये जो आह-ओ-नाला-ओ-दर्द हैं किसी बे-वफ़ा की निशानियाँ यही मेरे दिन के रफ़ीक़ हैं यही मेरी रात की रानियाँ ये मिरी ज़बाँ पे ग़ज़ल नहीं मैं सुना रहा हूँ कहानियाँ कि किसी के अहद-ए-शबाब पर मिटीं कैसी कैसी जवानियाँ कभी आँसुओं को सुखा गईं मिरे सोज़-ए-दिल की हरारतें कभी दिल की नाव डुबो गईं मिरे आँसुओं की रवानियाँ अभी उस को इस की ख़बर कहाँ कि क़दम कहाँ है नज़र कहाँ अभी मस्लहत का गुज़र कहाँ कि नई नई हैं जवानियाँ ये बयान-ए-हाल ये गुफ़्तुगू है मिरा निचोड़ा हुआ लहू अभी सुन लो मुझ से कि फिर कभू न सुनोगे ऐसी कहानियाँ

Kaleem Aajiz

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ये दीवाने कभी पाबंदियों का ग़म नहीं लेंगे गरेबाँ चाक जब तक कर न लेंगे दम नहीं लेंगे लहू देंगे तो लेंगे प्यार मोती हम नहीं लेंगे हमें फूलों के बदले फूल दो शबनम नहीं लेंगे ये ग़म किस ने दिया है पूछ मत ऐ हम-नशीं हम से ज़माना ले रहा है नाम उस का हम नहीं लेंगे मोहब्बत करने वाले भी अजब ख़ुद्दार होते हैं जिगर पर ज़ख़्म लेंगे ज़ख़्म पर मरहम नहीं लेंगे ग़म-ए-दिल ही के मारों को ग़म-ए-अय्याम भी दे दो ग़म इतना लेने वाले क्या अब इतना ग़म नहीं लेंगे सँवारे जा रहे हैं हम उलझती जाती हैं ज़ुल्फ़ें तुम अपने ज़िम्मा लो अब ये बखेड़ा हम नहीं लेंगे शिकायत उन से करना गो मुसीबत मोल लेना है मगर 'आजिज़' ग़ज़ल हम बे-सुनाए दम नहीं लेंगे

Kaleem Aajiz

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