ghazalKuch Alfaaz

ये दीवाने कभी पाबंदियों का ग़म नहीं लेंगे गरेबाँ चाक जब तक कर न लेंगे दम नहीं लेंगे लहू देंगे तो लेंगे प्यार मोती हम नहीं लेंगे हमें फूलों के बदले फूल दो शबनम नहीं लेंगे ये ग़म किस ने दिया है पूछ मत ऐ हम-नशीं हम से ज़माना ले रहा है नाम उस का हम नहीं लेंगे मोहब्बत करने वाले भी अजब ख़ुद्दार होते हैं जिगर पर ज़ख़्म लेंगे ज़ख़्म पर मरहम नहीं लेंगे ग़म-ए-दिल ही के मारों को ग़म-ए-अय्याम भी दे दो ग़म इतना लेने वाले क्या अब इतना ग़म नहीं लेंगे सँवारे जा रहे हैं हम उलझती जाती हैं ज़ुल्फ़ें तुम अपने ज़िम्मा लो अब ये बखेड़ा हम नहीं लेंगे शिकायत उन से करना गो मुसीबत मोल लेना है मगर 'आजिज़' ग़ज़ल हम बे-सुनाए दम नहीं लेंगे

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चादर की इज़्ज़त करता हूँ और पर्दे को मानता हूँ हर पर्दा पर्दा नहीं होता इतना मैं भी जानता हूँ सारे मर्द एक जैसे हैं तुम ने कैसे कह डाला मैं भी तो एक मर्द हूँ तुम को ख़ुद से बेहतर मानता हूँ मैं ने उस सेे प्यार किया है मिल्कियत का दावा नहीं वो जिस के भी साथ है मैं उस को भी अपना मानता हूँ चादर की इज़्ज़त करता हूँ और पर्दे को मानता हूँ हर पर्दा पर्दा नहीं होता इतना मैं भी जानता हूँ

Ali Zaryoun

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ग़ज़ल तो सब को मीठी लग रही थी मगर नातिक को मिर्ची लग रही थी तुम्हारे लब नहीं चू में थे जब तक मुझे हर चीज़ कड़वी लग रही थी मैं जिस दिन छोड़ने वाला था उस को वो उस दिन सब सेे प्यारी लग रही थी

Zubair Ali Tabish

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तेरे पीछे होगी दुनिया पागल बन क्या बोला मैं ने कुछ समझा? पागल बन सहरा में भी ढूँढ़ ले दरिया पागल बन वरना मर जाएगा प्यासा पागल बन आधा दाना आधा पागल नइँ नइँ नइँ उस को पाना है तो पूरा पागल बन दानाई दिखलाने से कुछ हासिल नहीं पागल खाना है ये दुनिया पागल बन देखें तुझ को लोग तो पागल हो जाएँ इतना उम्दा इतना आला पागल बन लोगों से डर लगता है तो घर में बैठ जिगरा है तो मेरे जैसा पागल बन

Varun Anand

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पूछ लेते वो बस मिज़ाज मिरा कितना आसान था इलाज मिरा चारा-गर की नज़र बताती है हाल अच्छा नहीं है आज मिरा मैं तो रहता हूँ दश्त में मसरूफ़ क़ैस करता है काम-काज मिरा कोई कासा मदद को भेज अल्लाह मेरे बस में नहीं है ताज मिरा मैं मोहब्बत की बादशाहत हूँ मुझ पे चलता नहीं है राज मिरा

Fahmi Badayuni

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अपनी आँखों में भर कर ले जाने हैं मुझ को उस के आँसू काम में लाने है देखो हम कोई वहशी नइँ दीवाने हैं तुम सेे बटन खुलवाने नइँ लगवाने हैं हम तुम इक दूजे की सीढ़ी है जानाँ बाक़ी दुनिया तो साँपों के ख़ाने हैं पाक़ीज़ा चीज़ों को पाक़ीज़ा लिखो मत लिक्खो उस की आँखें मय-ख़ाने हैं

Varun Anand

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मेरी सुब्ह-ए-ग़म बला से कभी शाम तक न पहुंचे मुझे डर ये है बुराई तेरे नाम तक न पहुंचे मेरे पास क्या वो आते मेरा दर्द क्या मिटाते मेरा हाल देखने को लब-ए-बाम तक न पहुंचे हो किसी का मुझ पे एहसांये नहीं पसंद मुझ को तेरी सुब्ह की तजल्ली मेरी शाम तक न पहुंचे तेरी बेरुख़ी पे ज़ालिम मेरा जी ये चाहता है कि वफ़ा का मेरे लब पर कभी नाम तक न पहुंचे मैं फ़ुग़ान-ए-बे-असर का कभी मोतरिफ़ नहीं हूँ वो सदा ही क्या जो उन के दर-ओ-बाम तक न पहुंचे वो सनम बिगड़ के मुझ से मेरा क्या बिगाड़ लेगा कभी राज़ खोल दूँ मैं तो सलाम तक न पहुंचे मुझे लज़्ज़त-ए-असीरी का सबक़ पढ़ा रहे हैं जो निकल के आशियांसे कभी दाम तक न पहुंचे उन्हें मेहरबांसमझ लें मुझे क्या ग़रज़ पड़ी है वो करम का हाथ ही क्या जो अवाम तक न पहुंचे हुए फ़ैज़-ए-मय-कदास सभी फ़ैज़याब लेकिन जो ग़रीब तिश्ना-लब थे वही जाम तक न पहुंचे जिसे मैं ने जगमगाया उसी अंजुमन में साक़ी मेरा ज़िक्र तक न आए मेरा नाम तक न पहुंचे तुम्हें याद ही न आऊंये है और बात वर्ना मैं नहीं हूंदूर इतना कि सलाम तक न पहुंचे

Kaleem Aajiz

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धड़कता जाता है दिल मुस्कुराने वालों का उठा नहीं है अभी ए'तिबार नालों का ये मुख़्तसर सी है रूदाद-ए-सुब्ह-ए-मय-ख़ाना ज़मीं पे ढेर था टूटे हुए पियालों का ये ख़ौफ़ है कि सबा लड़खड़ा के गिर न पड़े पयाम ले के चली है शिकस्ता-हालों का न आएँ अहल-ए-ख़िरद वादी-ए-जुनूँ की तरफ़ यहाँ गुज़र नहीं दामन बचाने वालों का लिपट लिपट के गले मिल रहे थे ख़ंजर से बड़े ग़ज़ब का कलेजा था मरने वालों का

Kaleem Aajiz

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मिरी शाएरी में न रक़्स-ए-जाम न मय की रंग-फ़िशानियाँ वही दुख-भरों की हिकायतें वही दिल-जलों की कहानियाँ ये जो आह-ओ-नाला-ओ-दर्द हैं किसी बे-वफ़ा की निशानियाँ यही मेरे दिन के रफ़ीक़ हैं यही मेरी रात की रानियाँ ये मिरी ज़बाँ पे ग़ज़ल नहीं मैं सुना रहा हूँ कहानियाँ कि किसी के अहद-ए-शबाब पर मिटीं कैसी कैसी जवानियाँ कभी आँसुओं को सुखा गईं मिरे सोज़-ए-दिल की हरारतें कभी दिल की नाव डुबो गईं मिरे आँसुओं की रवानियाँ अभी उस को इस की ख़बर कहाँ कि क़दम कहाँ है नज़र कहाँ अभी मस्लहत का गुज़र कहाँ कि नई नई हैं जवानियाँ ये बयान-ए-हाल ये गुफ़्तुगू है मिरा निचोड़ा हुआ लहू अभी सुन लो मुझ से कि फिर कभू न सुनोगे ऐसी कहानियाँ

Kaleem Aajiz

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किस तरह कोई धूप में पिघले है जले है ये बात वो क्या जाने जो साए में पले है दिल दर्द की भट्टी में कई बार जले है तब एक ग़ज़ल हुस्न के साँचे में ढले है क्या दिल है कि इक साँस भी आराम न ले है महफ़िल से जो निकले है तो ख़ल्वत में जले है भूली हुई याद आ के कलेजे को मले है जब शाम गुज़र जाए है जब रात ढले है हाँ देख ज़रा क्या तिरे क़दमों के तले है ठोकर भी वो खाए है जो इतरा के चले है

Kaleem Aajiz

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मिरी सुब्ह-ए-ग़म बला से कभी शाम तक न पहुँचे मुझे डर ये है बुराई तिरे नाम तक न पहुँचे मिरे पास क्या वो आते मिरा दर्द क्या मिटाते मिरा हाल देखने को लब-ए-बाम तक न पहुँचे हो किसी का मुझ पे एहसाँ ये नहीं पसंद मुझ को तिरी सुब्ह की तजल्ली मिरी शाम तक न पहुँचे तिरी बे-रुख़ी पे ज़ालिम मिरा जी ये चाहता है कि वफ़ा का मेरे लब पर कभी नाम तक न पहुँचे मैं फ़ुग़ान-ए-बे-असर का कभी मो'तरिफ़ नहीं हूँ वो सदा ही क्या जो उन के दर-ओ-बाम तक न पहुँचे वो सनम बिगड़ के मुझ से मिरा क्या बिगाड़ लेगा कभी राज़ खोल दूँ मैं तो सलाम तक न पहुँचे मुझे लज़्ज़त-ए-असीरी का सबक़ पढ़ा रहे हैं जो निकल के आशियाँ से कभी दाम तक न पहुँचे उन्हें मेहरबाँ समझ लें मुझे क्या ग़रज़ पड़ी है वो करम का हाथ ही क्या जो अवाम तक न पहुँचे हुए फ़ैज़-ए-मय-कदास सभी फ़ैज़याब लेकिन जो ग़रीब तिश्ना-लब थे वही जाम तक न पहुँचे जिसे मैं ने जगमगाया उसी अंजुमन में साक़ी मिरा ज़िक्र तक न आए मिरा नाम तक न पहुँचे तुम्हें याद ही न आऊँ ये है और बात वर्ना मैं नहीं हूँ दूर इतना कि सलाम तक न पहुँचे

Kaleem Aajiz

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