किस तरह कोई धूप में पिघले है जले है ये बात वो क्या जाने जो साए में पले है दिल दर्द की भट्टी में कई बार जले है तब एक ग़ज़ल हुस्न के साँचे में ढले है क्या दिल है कि इक साँस भी आराम न ले है महफ़िल से जो निकले है तो ख़ल्वत में जले है भूली हुई याद आ के कलेजे को मले है जब शाम गुज़र जाए है जब रात ढले है हाँ देख ज़रा क्या तिरे क़दमों के तले है ठोकर भी वो खाए है जो इतरा के चले है
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यही अपनी कहानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले वो लड़की जाँ हमारी थी, मियाँ पहले बहुत पहले वहम मुझ को ये भाता है,अभी मेरी दिवानी है मगर मेरी दिवानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले रक़ीब आ कर बताते हैं यहाँ तिल है, वहाँ तिल है हमें ये जानकारी थी मियाँ पहले, बहुत पहले अदब से माँग कर माफ़ी भरी महफ़िल ये कहता हूँ वो लड़की ख़ानदानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले
Anand Raj Singh
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क्यूँँ डरें ज़िन्दगी में क्या होगा कुछ न होगा तो तजरबा होगा हँसती आँखों में झाँक कर देखो कोई आँसू कहीं छुपा होगा इन दिनों ना-उमीद सा हूँ मैं शायद उस ने भी ये सुना होगा देख कर तुम को सोचता हूँ मैं क्या किसी ने तुम्हें छुआ होगा
Javed Akhtar
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ये ग़म क्या दिल की आदत है नहीं तो किसी से कुछ शिकायत है नहीं तो है वो इक ख़्वाब-ए-बे-ताबीर उस को भुला देने की निय्यत है नहीं तो किसी के बिन किसी की याद के बिन जिए जाने की हिम्मत है नहीं तो किसी सूरत भी दिल लगता नहीं हाँ तो कुछ दिन से ये हालत है नहीं तो तेरे इस हाल पर है सब को हैरत तुझे भी इस पे हैरत है नहीं तो हम-आहंगी नहीं दुनिया से तेरी तुझे इस पर नदामत है नहीं तो हुआ जो कुछ यही मक़्सूम था क्या यही सारी हिकायत है नहीं तो अज़िय्यत-नाक उम्मीदों से तुझ को अमाँ पाने की हसरत है नहीं तो तू रहता है ख़याल-ओ-ख़्वाब में गुम तो इस की वज्ह फ़ुर्सत है नहीं तो सबब जो इस जुदाई का बना है वो मुझ सेे ख़ूब-सूरत है नहीं तो
Jaun Elia
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उसी जगह पर जहाँ कई रास्ते मिलेंगे पलट के आए तो सब सेे पहले तुझे मिलेंगे अगर कभी तेरे नाम पर जंग हो गई तो हम ऐसे बुज़दिल भी पहली सफ़ में खड़े मिलेंगे तुझे ये सड़कें मेरे तवस्सुत से जानती हैं तुझे हमेशा ये सब इशारे खुले मिलेंगे
Tehzeeb Hafi
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वो बे-वफ़ा है तो क्या मत कहो बुरा उस को कि जो हुआ सो हुआ ख़ुश रखे ख़ुदा उस को नज़र न आए तो उस की तलाश में रहना कहीं मिले तो पलट कर न देखना उस को वो सादा-ख़ू था ज़माने के ख़म समझता क्या हवा के साथ चला ले उड़ी हवा उस को वो अपने बारे में कितना है ख़ुश-गुमाँ देखो जब उस को मैं भी न देखूँ तो देखना उस को अभी से जाना भी क्या उस की कम-ख़याली पर अभी तो और बहुत होगा सोचना उस को उसे ये धुन कि मुझे कम से कम उदास रखे मिरी दु'आ कि ख़ुदा दे ये हौसला उस को पनाह ढूँढ़ रही है शब-ए-गिरफ़्ता-दिलाँ कोई बताओ मिरे घर का रास्ता उस को ग़ज़ल में तज़्किरा उस का न कर 'नसीर' कि अब भुला चुका वो तुझे तू भी भूल जा उस को
Naseer Turabi
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धड़कता जाता है दिल मुस्कुराने वालों का उठा नहीं है अभी ए'तिबार नालों का ये मुख़्तसर सी है रूदाद-ए-सुब्ह-ए-मय-ख़ाना ज़मीं पे ढेर था टूटे हुए पियालों का ये ख़ौफ़ है कि सबा लड़खड़ा के गिर न पड़े पयाम ले के चली है शिकस्ता-हालों का न आएँ अहल-ए-ख़िरद वादी-ए-जुनूँ की तरफ़ यहाँ गुज़र नहीं दामन बचाने वालों का लिपट लिपट के गले मिल रहे थे ख़ंजर से बड़े ग़ज़ब का कलेजा था मरने वालों का
Kaleem Aajiz
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मेरी सुब्ह-ए-ग़म बला से कभी शाम तक न पहुंचे मुझे डर ये है बुराई तेरे नाम तक न पहुंचे मेरे पास क्या वो आते मेरा दर्द क्या मिटाते मेरा हाल देखने को लब-ए-बाम तक न पहुंचे हो किसी का मुझ पे एहसांये नहीं पसंद मुझ को तेरी सुब्ह की तजल्ली मेरी शाम तक न पहुंचे तेरी बेरुख़ी पे ज़ालिम मेरा जी ये चाहता है कि वफ़ा का मेरे लब पर कभी नाम तक न पहुंचे मैं फ़ुग़ान-ए-बे-असर का कभी मोतरिफ़ नहीं हूँ वो सदा ही क्या जो उन के दर-ओ-बाम तक न पहुंचे वो सनम बिगड़ के मुझ से मेरा क्या बिगाड़ लेगा कभी राज़ खोल दूँ मैं तो सलाम तक न पहुंचे मुझे लज़्ज़त-ए-असीरी का सबक़ पढ़ा रहे हैं जो निकल के आशियांसे कभी दाम तक न पहुंचे उन्हें मेहरबांसमझ लें मुझे क्या ग़रज़ पड़ी है वो करम का हाथ ही क्या जो अवाम तक न पहुंचे हुए फ़ैज़-ए-मय-कदास सभी फ़ैज़याब लेकिन जो ग़रीब तिश्ना-लब थे वही जाम तक न पहुंचे जिसे मैं ने जगमगाया उसी अंजुमन में साक़ी मेरा ज़िक्र तक न आए मेरा नाम तक न पहुंचे तुम्हें याद ही न आऊंये है और बात वर्ना मैं नहीं हूंदूर इतना कि सलाम तक न पहुंचे
Kaleem Aajiz
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मुझे इस का कोई गिला नहीं कि बहार ने मुझे क्या दिया तिरी आरज़ू तो निकाल दी तिरा हौसला तो बढ़ा दिया गो सितम ने तेरे हर इक तरह मुझे ना-उमीद बना दिया ये मिरी वफ़ा का कमाल है कि निबाह कर के दिखा दिया कोई बज़्म हो कोई अंजुमन ये शिआ'र अपना क़दीम है जहाँ रौशनी की कमी मिली वहीं इक चराग़ जला दिया तुझे अब भी मेरे ख़ुलूस का न यक़ीन आए तो क्या करूँँ तिरे गेसुओं को सँवार कर तुझे आइना भी दिखा दिया मेरी शाइ'री में तिरे सिवा कोई माजरा है न मुद्दआ' जो तिरी नज़र का फ़साना था वो मिरी ग़ज़ल ने सुना दिया ये ग़रीब 'आजिज़'-ए-बे-वतन ये ग़ुबार-ए-ख़ातिर-ए-अंजुमन ये ख़राब जिस के लिए हुआ उसी बे-वफ़ा ने भुला दिया
Kaleem Aajiz
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शाने का बहुत ख़ून-ए-जिगर जाए है प्यारे तब ज़ुल्फ़ कहीं ता-ब-कमर जाए है प्यारे जिस दिन कोई ग़म मुझ पे गुज़र जाए है प्यारे चेहरा तिरा उस रोज़ निखर जाए है प्यारे इक घर भी सलामत नहीं अब शहर-ए-वफ़ा में तू आग लगाने को किधर जाए है प्यारे रहने दे जफ़ाओं की कड़ी धूप में मुझ को साए में तो हर शख़्स ठहर जाए है प्यारे वो बात ज़रा सी जिसे कहते हैं ग़म-ए-दिल समझाने में इक उम्र गुज़र जाए है प्यारे हर-चंद कोई नाम नहीं मेरी ग़ज़ल में तेरी ही तरफ़ सब की नज़र जाए प्यारे
Kaleem Aajiz
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मुँह फ़क़ीरों से न फेरा चाहिए ये तो पूछा चाहिए क्या चाहिए चाह का मेआ'र ऊँचा चाहिए जो न चाहें उन को चाहा चाहिए कौन चाहे है किसी को बे-ग़रज़ चाहने वालों से भागा चाहिए हम तो कुछ चाहे हैं तुम चाहो हो कुछ वक़्त क्या चाहे है देखा चाहिए चाहते हैं तेरे ही दामन की ख़ैर हम हैं दीवाने हमें क्या चाहिए बे-रुख़ी भी नाज़ भी अंदाज़ भी चाहिए लेकिन न इतना चाहिए हम जो कहना चाहते हैं क्या कहें आप कह लीजे जो कहना चाहिए बात चाहे बे-सलीक़ा हो 'कलीम' बात कहने का सलीक़ा चाहिए
Kaleem Aajiz
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