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har ek shakl men surat nai malal ki hai hamare charon taraf raushni malal ki hai ham apne hijr men tera visal dekhte hain yahi khushi ki hai saat, yahi malal ki hai hamare khana-e-dil men nahin hai kya kya kuchh ye aur baat ki har shai isi malal ki hai abhi se shauq ki azurdagi ka ranj na kar ki dil ko taab khushi ki na thi malal ki hai kisi ka ranj ho, apna samajhne lagte hain vabal-e-jan ye kushada-dili malal ki hai nahin hai khvahish-e-asudgi-e-vasl hamen javaz-e-ishq to bas tishnagi malal ki hai guzishta raat kai baar dil ne ham se kaha ki ho na ho ye ghutan akhiri malal ki hai ragon men chikhta phirta hai ek sail-e-junun agarche lahje men shaistagi malal ki hai ajiib hota hai ehsas ka talavvun bhi abhi khushi ki khushi thii, abhi malal ki hai ye kis umiid pe chalne lagi hai bad-e-murad? khabar nahin hai use, ye ghadi malal ki hai dua karo ki rahe darmiyan ye be-sukhani ki guftugu men to be-pardagi malal ki hai tiri ghhazal men ajab kaif hai magar 'irfan' darun-e-ramz-o-kinaya kami malal ki hai har ek shakl mein surat nai malal ki hai hamare chaaron taraf raushni malal ki hai hum apne hijr mein tera visal dekhte hain yahi khushi ki hai saat, yahi malal ki hai hamare khana-e-dil mein nahin hai kya kya kuchh ye aur baat ki har shai isi malal ki hai abhi se shauq ki aazurdagi ka ranj na kar ki dil ko tab khushi ki na thi malal ki hai kisi ka ranj ho, apna samajhne lagte hain wabaal-e-jaan ye kushada-dili malal ki hai nahin hai khwahish-e-asudgi-e-wasl hamein jawaz-e-ishq to bas tishnagi malal ki hai guzishta raat kai bar dil ne hum se kaha ki ho na ho ye ghutan aakhiri malal ki hai ragon mein chikhta phirta hai ek sail-e-junun agarche lahje mein shaistagi malal ki hai ajib hota hai ehsas ka talawwun bhi abhi khushi ki khushi thi, abhi malal ki hai ye kis umid pe chalne lagi hai baad-e-murad? khabar nahin hai use, ye ghadi malal ki hai dua karo ki rahe darmiyan ye be-sukhani ki guftugu mein to be-pardagi malal ki hai teri ghazal mein ajab kaif hai magar 'irfan' darun-e-ramz-o-kinaya kami malal ki hai

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तुम्हें बस ये बताना चाहता हूँ मैं तुम से क्या छुपाना चाहता हूँ कभी मुझ से भी कोई झूठ बोलो मैं हाँ में हाँ मिलाना चाहता हूँ ये जो खिड़की है नक़्शे में तुम्हारे यहाँ मैं दर बनाना चाहता हूँ अदाकारी बहुत दुख दे रही है मैं सच-मुच मुस्कुराना चाहता हूँ परों में तीर है पंजों में तिनके मैं ये चिड़िया उड़ाना चाहता हूँ लिए बैठा हूँ घुँघरू फूल मोती तिरा हँसना बनाना चाहता हूँ अमीरी इश्क़ की तुम को मुबारक मैं बस खाना-कमाना चाहता हूँ मैं सारे शहर की बैसाखियों को तिरे दर पर नचाना चाहता हूँ मुझे तुम सेे बिछड़ना ही पड़ेगा मैं तुम को याद आना चाहता हूँ

Fahmi Badayuni

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बैठे हैं चैन से कहीं जाना तो है नहीं हम बे-घरों का कोई ठिकाना तो है नहीं तुम भी हो बीते वक़्त के मानिंद हू-ब-हू तुम ने भी याद आना है आना तो है नहीं अहद-ए-वफ़ा से किस लिए ख़ाइफ़ हो मेरी जान कर लो कि तुम ने अहद निभाना तो है नहीं वो जो हमें अज़ीज़ है कैसा है कौन है क्यूँँ पूछते हो हम ने बताना तो है नहीं दुनिया हम अहल-ए-इश्क़ पे क्यूँँ फेंकती है जाल हम ने तिरे फ़रेब में आना तो है नहीं वो इश्क़ तो करेगा मगर देख भाल के 'फ़ारिस' वो तेरे जैसा दिवाना तो है नहीं

Rehman Faris

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ज़बाँ तो खोल नज़र तो मिला जवाब तो दे मैं कितनी बार लुटा हूँ मुझे हिसाब तो दे तेरे बदन की लिखावट में है उतार चढ़ाव मैं तुझे कैसे पढूँगा मुझे किताब तो दे तेरा सवाल है साक़ी कि ज़िंदगी क्या है? जवाब देता हूँ पहले मुझे शराब तो दे

Rahat Indori

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सितम ढाते हुए सोचा करोगे हमारे साथ तुम ऐसा करोगे? अँगूठी तो मुझे लौटा रहे हो अँगूठी के निशाँ का क्या करोगे? मैं तुम सेे अब झगड़ता भी नहीं हूँ तो क्या इस बात पर झगड़ा करोगे? मेरा दामन तुम्हीं था में हुए हो मेरा दामन तुम्हीं मैला करोगे बताओ वा'दा कर के आओगे ना? के पिछली बार के जैसा करोगे? वो दुल्हन बन के रुख़्सत हो गई है कहाँ तक कार का पीछा करोगे? मुझे बस यूँँ ही तुम सेे पूछना था अगर मैं मर गया तो क्या करोगे?

Zubair Ali Tabish

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इक पल में इक सदी का मज़ा हम से पूछिए दो दिन की ज़िंदगी का मज़ा हम से पूछिए भूले हैं रफ़्ता रफ़्ता उन्हें मुद्दतों में हम क़िस्तों में ख़ुद-कुशी का मज़ा हम से पूछिए आग़ाज़-ए-आशिक़ी का मज़ा आप जानिए अंजाम-ए-आशिक़ी का मज़ा हम से पूछिए जलते दियों में जलते घरों जैसी ज़ौ कहाँ सरकार रौशनी का मज़ा हम से पूछिए वो जान ही गए कि हमें उन सेे प्यार है आँखों की मुख़बिरी का मज़ा हम सेे पूछिए हँसने का शौक़ हम को भी था आप की तरह हँसिए मगर हँसी का मज़ा हम से पूछिए हम तौबा कर के मर गए बे-मौत ऐ 'ख़ुमार' तौहीन-ए-मय-कशी का मज़ा हम से पूछिए

Khumar Barabankvi

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कोई मिला तो किसी और की कमी हुई है सो दिल ने बे-तलबी इख़्तियार की हुई है जहाँ से दिल की तरफ़ ज़िंदगी उतरती थी निगाह अब भी उसी बाम पर जमी हुई है है इंतिज़ार उसे भी तुम्हारी ख़ुश-बू का हवा गली में बहुत देर से रुकी हुई है तुम आ गए हो तो अब आईना भी देखेंगे अभी अभी तो निगाहों में रौशनी हुई है हमारा इल्म तो मरहून-ए-लौह-ए-दिल है मियाँ किताब-ए-अक़्ल तो बस ताक़ पर धरी हुई है बनाओ साए हरारत बदन में जज़्ब करो कि धूप सेहन में कब से यूँँही पड़ी हुई है नहीं नहीं मैं बहुत ख़ुश रहा हूँ तेरे बग़ैर यक़ीन कर कि ये हालत अभी अभी हुई है वो गुफ़्तुगू जो मिरी सिर्फ़ अपने-आप से थी तिरी निगाह को पहुँची तो शा'इरी हुई है

Irfan Sattar

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मुझे क्या ख़बर थी मुझे दूसरों ने बताया मैं कैसा हूँ क्या आदमी हूँ ये सब सुन के मुझ को भी लगने लगा है कि मैं वाक़ई इक बुरा आदमी हूँ किसी को सरोकार क्या मुझ में फैली हुई इस क़यामत की बेचारगी से अगर कोई मुझ सेे तअल्लुक़ भी रखता है तो यूँँ कि मैं काम का आदमी हूँ तुम्हें ये गिला है कि मैं वो नहीं जिस से तुम ने मोहब्बत के पैमा किए थे मुझे भी ये महसूस होने लगा है कि मैं वो नहीं दूसरा आदमी हूँ सभी हस्ब-ए-ख़्वाहिश ब-क़द्र-ए-ज़रूरत मुझे जानते हैं मुझे छानते हैं किसी को कहाँ इतनी फ़ुर्सत जो देखे कि मैं कितना टूटा हुआ आदमी हूँ मैं अपनी हक़ीक़त को संदूक़ में बंद कर के हर एक सुब्ह जाता हूँ दफ़्तर कभी शाम के बा'द देखो कि मैं कैसा पुर-हाल पुर-माजरा आदमी हूँ मैं सच बोलता हूँ कभी टोकता हूँ तो क्यूँँ आप ऐसे बुरा मानते हैं अज़ीज़ान-ए-मन आप समझे तो मुझ को कि मैं असल में आप का आदमी हूँ मैं इक़्लीम के और तक़्वीम के किस ग़लत रास्ते से यहाँ आ गया था मैं इस दौर में जी रहा हूँ तो बस ये समझ लो कि मैं मोजिज़ा आदमी हूँ अँधेरा तहय्युर ख़मोशी उदासी मुजर्रद हयूले जुनूँ बे-क़रारी ये तफ़सील सुन कर समझ तो गए हो कि मैं दिन नहीं रात का आदमी हूँ ये क्या ज़िंदगी है ये कैसा तमाशा है मैं इस तमाशे में क्या कर रहा हूँ मैं रोज़-ए-अज़ल से कुछ ऐसे सवालों की तकलीफ़ में मुब्तला आदमी हूँ मेरी बद-दिमाग़ी मुनाफ़िक़ रवय्यों से महफ़ूज़ रहने का है इक तरीक़ा मेरे पास आओ मेरे पास बैठो कि मैं तो सरापा दुआ आदमी हूँ मैं अपने तसव्वुर में तख़्लीक़ करता हूँ इक ऐसी दुनिया जो है मेरी दुनिया मेरी अपनी मर्ज़ी की एक ज़िंदगी है मैं तन्हाइयों में ख़ुदा आदमी हूँ मेरा क्या त'अर्रुफ़ मेरा नाम 'इरफ़ान' है और मेरी है इतनी कहानी मैं हर दौर का वाक़ि'आ आदमी हूँ मैं हर अहद का सानिहा आदमी हूँ

Irfan Sattar

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