ghazalKuch Alfaaz

कोई मिला तो किसी और की कमी हुई है सो दिल ने बे-तलबी इख़्तियार की हुई है जहाँ से दिल की तरफ़ ज़िंदगी उतरती थी निगाह अब भी उसी बाम पर जमी हुई है है इंतिज़ार उसे भी तुम्हारी ख़ुश-बू का हवा गली में बहुत देर से रुकी हुई है तुम आ गए हो तो अब आईना भी देखेंगे अभी अभी तो निगाहों में रौशनी हुई है हमारा इल्म तो मरहून-ए-लौह-ए-दिल है मियाँ किताब-ए-अक़्ल तो बस ताक़ पर धरी हुई है बनाओ साए हरारत बदन में जज़्ब करो कि धूप सेहन में कब से यूँँही पड़ी हुई है नहीं नहीं मैं बहुत ख़ुश रहा हूँ तेरे बग़ैर यक़ीन कर कि ये हालत अभी अभी हुई है वो गुफ़्तुगू जो मिरी सिर्फ़ अपने-आप से थी तिरी निगाह को पहुँची तो शा'इरी हुई है

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वो बे-वफ़ा है तो क्या मत कहो बुरा उस को कि जो हुआ सो हुआ ख़ुश रखे ख़ुदा उस को नज़र न आए तो उस की तलाश में रहना कहीं मिले तो पलट कर न देखना उस को वो सादा-ख़ू था ज़माने के ख़म समझता क्या हवा के साथ चला ले उड़ी हवा उस को वो अपने बारे में कितना है ख़ुश-गुमाँ देखो जब उस को मैं भी न देखूँ तो देखना उस को अभी से जाना भी क्या उस की कम-ख़याली पर अभी तो और बहुत होगा सोचना उस को उसे ये धुन कि मुझे कम से कम उदास रखे मिरी दु'आ कि ख़ुदा दे ये हौसला उस को पनाह ढूँढ़ रही है शब-ए-गिरफ़्ता-दिलाँ कोई बताओ मिरे घर का रास्ता उस को ग़ज़ल में तज़्किरा उस का न कर 'नसीर' कि अब भुला चुका वो तुझे तू भी भूल जा उस को

Naseer Turabi

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ख़ामोश लब हैं झुकी हैं पलकें, दिलों में उल्फ़त नई नई है अभी तक़ल्लुफ़ है गुफ़्तगू में, अभी मोहब्बत नई नई है अभी न आएँगी नींद तुम को, अभी न हम को सुकूँ मिलेगा अभी तो धड़केगा दिल ज़ियादा, अभी मुहब्बत नई नई है बहार का आज पहला दिन है, चलो चमन में टहल के आएँ फ़ज़ा में ख़ुशबू नई नई है गुलों में रंगत नई नई है जो ख़ानदानी रईस हैं वो मिज़ाज रखते हैं नर्म अपना तुम्हारा लहजा बता रहा है, तुम्हारी दौलत नई नई है ज़रा सा क़ुदरत ने क्या नवाज़ा के आके बैठे हो पहली सफ़ में अभी क्यूँ उड़ने लगे हवा में अभी तो शोहरत नई नई है बमों की बरसात हो रही है, पुराने जांबाज़ सो रहे हैं ग़ुलाम दुनिया को कर रहा है वो जिस की ताक़त नई नई है

Shabeena Adeeb

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कैसे उस ने ये सब कुछ मुझ सेे छुप कर बदला चेहरा बदला रस्ता बदला बा'द में घर बदला मैं उस के बारे में ये कहता था लोगों से मेरा नाम बदल देना वो शख़्स अगर बदला वो भी ख़ुश था उस ने दिल देकर दिल माँगा है मैं भी ख़ुश हूँ मैं ने पत्थर से पत्थर बदला मैं ने कहा क्या मेरी ख़ातिर ख़ुद को बदलोगे और फिर उस ने नज़रें बदलीं और नंबर बदला

Tehzeeb Hafi

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ज़ने हसीन थी और फूल चुन कर लाती थी मैं शे'र कहता था, वो दास्ताँ सुनाती थी अरब लहू था रगों में, बदन सुनहरा था वो मुस्कुराती नहीं थी, दीए जलाती थी "अली से दूर रहो", लोग उस सेे कहते थे "वो मेरा सच है", बहुत चीख कर बताती थी "अली ये लोग तुम्हें जानते नहीं हैं अभी" गले लगाकर मेरा हौसला बढ़ाती थी ये फूल देख रहे हो, ये उस का लहजा था ये झील देख रहे हो, यहाँ वो आती थी मैं उस के बा'द कभी ठीक से नहीं जागा वो मुझ को ख़्वाब नहीं नींद से जगाती थी उसे किसी से मोहब्बत थी और वो मैं नहीं था ये बात मुझ सेे ज़्यादा उसे रूलाती थी मैं कुछ बता नहीं सकता वो मेरी क्या थी "अली" कि उस को देख कर बस अपनी याद आती थी

Ali Zaryoun

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ये मैं ने कब कहा कि मेरे हक़ में फ़ैसला करे अगर वो मुझ से ख़ुश नहीं है तो मुझे जुदा करे मैं उस के साथ जिस तरह गुज़ारता हूँ ज़िंदगी उसे तो चाहिए कि मेरा शुक्रिया अदा करे मेरी दुआ है और इक तरह से बद-दुआ भी है ख़ुदा तुम्हें तुम्हारे जैसी बेटियाँ अता करे बना चुका हूँ मैं मोहब्बतों के दर्द की दवा अगर किसी को चाहिए तो मुझ सेे राब्ता करे

Tehzeeb Hafi

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मुझे क्या ख़बर थी मुझे दूसरों ने बताया मैं कैसा हूँ क्या आदमी हूँ ये सब सुन के मुझ को भी लगने लगा है कि मैं वाक़ई इक बुरा आदमी हूँ किसी को सरोकार क्या मुझ में फैली हुई इस क़यामत की बेचारगी से अगर कोई मुझ सेे तअल्लुक़ भी रखता है तो यूँँ कि मैं काम का आदमी हूँ तुम्हें ये गिला है कि मैं वो नहीं जिस से तुम ने मोहब्बत के पैमा किए थे मुझे भी ये महसूस होने लगा है कि मैं वो नहीं दूसरा आदमी हूँ सभी हस्ब-ए-ख़्वाहिश ब-क़द्र-ए-ज़रूरत मुझे जानते हैं मुझे छानते हैं किसी को कहाँ इतनी फ़ुर्सत जो देखे कि मैं कितना टूटा हुआ आदमी हूँ मैं अपनी हक़ीक़त को संदूक़ में बंद कर के हर एक सुब्ह जाता हूँ दफ़्तर कभी शाम के बा'द देखो कि मैं कैसा पुर-हाल पुर-माजरा आदमी हूँ मैं सच बोलता हूँ कभी टोकता हूँ तो क्यूँँ आप ऐसे बुरा मानते हैं अज़ीज़ान-ए-मन आप समझे तो मुझ को कि मैं असल में आप का आदमी हूँ मैं इक़्लीम के और तक़्वीम के किस ग़लत रास्ते से यहाँ आ गया था मैं इस दौर में जी रहा हूँ तो बस ये समझ लो कि मैं मोजिज़ा आदमी हूँ अँधेरा तहय्युर ख़मोशी उदासी मुजर्रद हयूले जुनूँ बे-क़रारी ये तफ़सील सुन कर समझ तो गए हो कि मैं दिन नहीं रात का आदमी हूँ ये क्या ज़िंदगी है ये कैसा तमाशा है मैं इस तमाशे में क्या कर रहा हूँ मैं रोज़-ए-अज़ल से कुछ ऐसे सवालों की तकलीफ़ में मुब्तला आदमी हूँ मेरी बद-दिमाग़ी मुनाफ़िक़ रवय्यों से महफ़ूज़ रहने का है इक तरीक़ा मेरे पास आओ मेरे पास बैठो कि मैं तो सरापा दुआ आदमी हूँ मैं अपने तसव्वुर में तख़्लीक़ करता हूँ इक ऐसी दुनिया जो है मेरी दुनिया मेरी अपनी मर्ज़ी की एक ज़िंदगी है मैं तन्हाइयों में ख़ुदा आदमी हूँ मेरा क्या त'अर्रुफ़ मेरा नाम 'इरफ़ान' है और मेरी है इतनी कहानी मैं हर दौर का वाक़ि'आ आदमी हूँ मैं हर अहद का सानिहा आदमी हूँ

Irfan Sattar

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