हर कदम पर जो इतना रोते हो किस तमन्ना का बोझ ढोते हो हर किसी से गुरेज क्या मतलब आज कल किस हवा में होते हो इस का मतलब है देख ली दुनिया बात करने से पहले रोते हो चाँद पर जा बसोगे क्या तुम सब नफ़रतें इस क़दर जो बोते हो ये ख़ुदाई सिफ़त भी है तुम में दूर रह कर क़रीब होते हो तुम अज़ीयत पसंद हो 'खालिद' अपने अश्कों से ज़ख़्म धोते ही
Related Ghazal
क्यूँँ डरें ज़िन्दगी में क्या होगा कुछ न होगा तो तजरबा होगा हँसती आँखों में झाँक कर देखो कोई आँसू कहीं छुपा होगा इन दिनों ना-उमीद सा हूँ मैं शायद उस ने भी ये सुना होगा देख कर तुम को सोचता हूँ मैं क्या किसी ने तुम्हें छुआ होगा
Javed Akhtar
371 likes
बैठे हैं चैन से कहीं जाना तो है नहीं हम बे-घरों का कोई ठिकाना तो है नहीं तुम भी हो बीते वक़्त के मानिंद हू-ब-हू तुम ने भी याद आना है आना तो है नहीं अहद-ए-वफ़ा से किस लिए ख़ाइफ़ हो मेरी जान कर लो कि तुम ने अहद निभाना तो है नहीं वो जो हमें अज़ीज़ है कैसा है कौन है क्यूँँ पूछते हो हम ने बताना तो है नहीं दुनिया हम अहल-ए-इश्क़ पे क्यूँँ फेंकती है जाल हम ने तिरे फ़रेब में आना तो है नहीं वो इश्क़ तो करेगा मगर देख भाल के 'फ़ारिस' वो तेरे जैसा दिवाना तो है नहीं
Rehman Faris
196 likes
मेरे बस में नहीं वरना क़ुदरत का लिखा हुआ काटता तेरे हिस्से में आए बुरे दिन कोई दूसरा काटता लारियों से ज़्यादा बहाव था तेरे हर इक लफ्ज़ में मैं इशारा नहीं काट सकता तेरी बात क्या काटता मैं ने भी ज़िंदगी और शब ए हिज्र काटी है सबकी तरह वैसे बेहतर तो ये था के मैं कम से कम कुछ नया काटता तेरे होते हुए मोमबत्ती बुझाई किसी और ने क्या ख़ुशी रह गई थी जन्मदिन की, मैं केक क्या काटता कोई भी तो नहीं जो मेरे भूखे रहने पे नाराज़ हो जेल में तेरी तस्वीर होती तो हँसकर सज़ा काटता
Tehzeeb Hafi
456 likes
ये ग़म क्या दिल की आदत है नहीं तो किसी से कुछ शिकायत है नहीं तो है वो इक ख़्वाब-ए-बे-ताबीर उस को भुला देने की निय्यत है नहीं तो किसी के बिन किसी की याद के बिन जिए जाने की हिम्मत है नहीं तो किसी सूरत भी दिल लगता नहीं हाँ तो कुछ दिन से ये हालत है नहीं तो तेरे इस हाल पर है सब को हैरत तुझे भी इस पे हैरत है नहीं तो हम-आहंगी नहीं दुनिया से तेरी तुझे इस पर नदामत है नहीं तो हुआ जो कुछ यही मक़्सूम था क्या यही सारी हिकायत है नहीं तो अज़िय्यत-नाक उम्मीदों से तुझ को अमाँ पाने की हसरत है नहीं तो तू रहता है ख़याल-ओ-ख़्वाब में गुम तो इस की वज्ह फ़ुर्सत है नहीं तो सबब जो इस जुदाई का बना है वो मुझ सेे ख़ूब-सूरत है नहीं तो
Jaun Elia
355 likes
अब के हम बिछड़े तो शायद कभी ख़्वाबों में मिलें जिस तरह सूखे हुए फूल किताबों में मिलें ढूँढ़ उजड़े हुए लोगों में वफ़ा के मोती ये ख़ज़ाने तुझे मुमकिन है ख़राबों में मिलें ग़म-ए-दुनिया भी ग़म-ए-यार में शामिल कर लो नशा बढ़ता है शराबें जो शराबों में मिलें तू ख़ुदा है न मिरा इश्क़ फ़रिश्तों जैसा दोनों इंसाँ हैं तो क्यूँँ इतने हिजाबों में मिलें आज हम दार पे खींचे गए जिन बातों पर क्या अजब कल वो ज़माने को निसाबों में मिलें अब न वो मैं न वो तू है न वो माज़ी है 'फ़राज़' जैसे दो शख़्स तमन्ना के सराबों में मिलें
Ahmad Faraz
130 likes
More from Khalid Nadeem Shani
ज़िंदगानी से झूठ बोलते हो बिटिया रानी से झूठ बोलते हो तुम तरक्की करोगे तेज़ी से तुम रवानी से झूठ बोलते हो पढ़ते रहते हो जॉन को फिर भी यार जानी से झूठ बोलते हो सारी दुनिया का दुख नहीं मुझ को तुम भी शानी से झूठ बोलते हो
Khalid Nadeem Shani
14 likes
दयार ए ख़्वाब था तुम थे तमाम दुनिया थी किसी ने आ के जगाया तो मैं अकेला था कोई हुसैनी न निकला मेरे रफ़ीको में दिया बुझा के जलाया तो मैं अकेला था तुम्हारा हाथ नहीं था वो मौज ए गिर्या थी मेरी समझ में जब आया तो मैं अकेला था दयार ए गैर गया था मैं ख़ुशियाँ लाने को पलट के गाँव जब आया तो मैं अकेला था कहाँ से आई है आख़िर तेरी तलब मुझ में मुझे ख़ुदा ने बनाया तो मैं अकेला था
Khalid Nadeem Shani
6 likes
Similar Writers
Our suggestions based on Khalid Nadeem Shani.
Similar Moods
More moods that pair well with Khalid Nadeem Shani's ghazal.







