ghazalKuch Alfaaz

ज़िंदगानी से झूठ बोलते हो बिटिया रानी से झूठ बोलते हो तुम तरक्की करोगे तेज़ी से तुम रवानी से झूठ बोलते हो पढ़ते रहते हो जॉन को फिर भी यार जानी से झूठ बोलते हो सारी दुनिया का दुख नहीं मुझ को तुम भी शानी से झूठ बोलते हो

Related Ghazal

क्यूँँ डरें ज़िन्दगी में क्या होगा कुछ न होगा तो तजरबा होगा हँसती आँखों में झाँक कर देखो कोई आँसू कहीं छुपा होगा इन दिनों ना-उमीद सा हूँ मैं शायद उस ने भी ये सुना होगा देख कर तुम को सोचता हूँ मैं क्या किसी ने तुम्हें छुआ होगा

Javed Akhtar

371 likes

तुम हक़ीक़त नहीं हो हसरत हो जो मिले ख़्वाब में वो दौलत हो तुम हो ख़ुशबू के ख़्वाब की ख़ुशबू और इतने ही बेमुरव्वत हो किस तरह छोड़ दूँ तुम्हें जानाँ तुम मेरी ज़िन्दगी की आदत हो किसलिए देखते हो आईना तुम तो ख़ुद से भी ख़ूब-सूरत हो दास्ताँ ख़त्म होने वाली है तुम मेरी आख़िरी मुहब्बत हो

Jaun Elia

315 likes

इतना मजबूर न कर बात बनाने लग जाएँ हम तेरे सर की क़सम झूठ ही खाने लग जाएँ इतने सन्नाटे पिए मेरी समा'अत ने कि अब सिर्फ़ आवाज़ पे चाहूँ तो निशाने लग जाएँ चलिए कुछ और नहीं आह-शुमारी ही सही हम किसी काम तो इस दिल के बहाने लग जाएँ हम वो गुम-गश्त-ए-मोहब्बत हैं कि तुम तो क्या हो ख़ुद को हम ढूँडने निकलें तो ज़माने लग जाएँ ख़्वाब कुछ ऐसे दिखाए हैं फ़क़ीरी ने मुझे जिन की ता'बीर में शाहों के ख़ज़ाने लग जाएँ मैं अगर अपनी जवानी के सुना दूँ क़िस्से ये जो लौंडे हैं मिरे पाँव दबाने लग जाएँ

Mehshar Afridi

173 likes

चला है सिलसिला कैसा ये रातों को मनाने का तुम्हें हक़ दे दिया किस ने दियों के दिल दुखाने का इरादा छोड़िए अपनी हदों से दूर जाने का ज़माना है ज़माने की निगाहों में न आने का कहाँ की दोस्ती किन दोस्तों की बात करते हो मियाँ दुश्मन नहीं मिलता कोई अब तो ठिकाने का निगाहों में कोई भी दूसरा चेहरा नहीं आया भरोसा ही कुछ ऐसा था तुम्हारे लौट आने का ये मैं ही था बचा के ख़ुद को ले आया किनारे तक समुंदर ने बहुत मौक़ा' दिया था डूब जाने का

Waseem Barelvi

103 likes

तुम्हें बस ये बताना चाहता हूँ मैं तुम से क्या छुपाना चाहता हूँ कभी मुझ से भी कोई झूठ बोलो मैं हाँ में हाँ मिलाना चाहता हूँ ये जो खिड़की है नक़्शे में तुम्हारे यहाँ मैं दर बनाना चाहता हूँ अदाकारी बहुत दुख दे रही है मैं सच-मुच मुस्कुराना चाहता हूँ परों में तीर है पंजों में तिनके मैं ये चिड़िया उड़ाना चाहता हूँ लिए बैठा हूँ घुँघरू फूल मोती तिरा हँसना बनाना चाहता हूँ अमीरी इश्क़ की तुम को मुबारक मैं बस खाना-कमाना चाहता हूँ मैं सारे शहर की बैसाखियों को तिरे दर पर नचाना चाहता हूँ मुझे तुम सेे बिछड़ना ही पड़ेगा मैं तुम को याद आना चाहता हूँ

Fahmi Badayuni

249 likes

More from Khalid Nadeem Shani

हर कदम पर जो इतना रोते हो किस तमन्ना का बोझ ढोते हो हर किसी से गुरेज क्या मतलब आज कल किस हवा में होते हो इस का मतलब है देख ली दुनिया बात करने से पहले रोते हो चाँद पर जा बसोगे क्या तुम सब नफ़रतें इस क़दर जो बोते हो ये ख़ुदाई सिफ़त भी है तुम में दूर रह कर क़रीब होते हो तुम अज़ीयत पसंद हो 'खालिद' अपने अश्कों से ज़ख़्म धोते ही

Khalid Nadeem Shani

14 likes

दयार ए ख़्वाब था तुम थे तमाम दुनिया थी किसी ने आ के जगाया तो मैं अकेला था कोई हुसैनी न निकला मेरे रफ़ीको में दिया बुझा के जलाया तो मैं अकेला था तुम्हारा हाथ नहीं था वो मौज ए गिर्या थी मेरी समझ में जब आया तो मैं अकेला था दयार ए गैर गया था मैं ख़ुशियाँ लाने को पलट के गाँव जब आया तो मैं अकेला था कहाँ से आई है आख़िर तेरी तलब मुझ में मुझे ख़ुदा ने बनाया तो मैं अकेला था

Khalid Nadeem Shani

6 likes

Similar Writers

View All ›

Our suggestions based on Khalid Nadeem Shani.

Similar Moods

View All ›

More moods that pair well with Khalid Nadeem Shani's ghazal.